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एससी/एसटी छात्रों की शिक्षा के लिए बजट में कटौतीः दलित एवं आदिवासी अधिकार समूह

नई दिल्लीः दलित एवं आदिवासी अधिकार समूहों का कहना है कि अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के छात्रों की माध्यमिक और उच्च शिक्षा के लिए बजट 2019 में कटौती की गई है.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, दलित आर्थिक अधिकार आंदोलन की बीना पल्लीकल का कहना है कि एससी छात्रों के लिए पोस्ट मैट्रिक छात्रवृत्ति के लिए बजट में कटौती की गई है और इसके लिए इस साल बजट में 2,926 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं, जबकि पिछले साल यह रकम 3,000 करोड़ रुपये थी.

पल्लीकल ने कहा, ‘2018-2019 के लिए संशोधित बजट 6,000 करोड़ रुपये था, जिसमें बकाया छात्रवृत्ति की राशि भी शामिल है. इस साल बजट में कटौती के बावजूद बकाया बचा हुआ है.'

इसी तरह अनुसूचित छात्रों के लिए पोस्ट मैट्रिक छात्रवृत्ति में भी कटौती की गई है. 2018-2019 में इसके लिए 1,643 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे जबकि इस साल इसके लिए 1,613 करोड़ रुपये ही आवंटित किए गए हैं.

संगठनों का कहना है कि बजट में पोस्ट डॉक्टरेट पाठ्यक्रमों और पीएचडी के लिए फेलोशिप और छात्रवृत्तियों में 2014-2015 से ही कटौती जारी है.

2019-2020 के बजट में इन पाठ्यक्रमों में अनुसूचित जाति के छात्रों के लिए यह रकम 602 करोड़ रुपये से घटाकर 283 करोड़ रुपये कर दी गई है जबकि अनुसूचित जनजाति के छात्रों के लिए यह रकम 439 करोड़ रुपये से घटाकर 135 करोड़ रुपये कर दी गई है.

इसी तरह एससी और एसटी छात्रों के लिए यूजीसी और इग्नू में इसमें 23 फीसदी और 50 फीसदी की कटौती की गई है.

नेशनल कैम्पेन ऑन दलित ह्यूमन राइट्स द्वारा जारी बयान के मुताबिक, सामाजिक न्याय एवं आधिकारिता मंत्रालय के लिए आवंटन में पिछले साल की तुलना में बहुत अधिक कटौती की गई है.

इसके अलावा अनुसूचित जाति के विकास के लिए जिन मंत्रालयों में इस बार बजट में कटौती की गई है, उनमें ग्रामीण विकास, सूक्ष्म, लघु एवं मध्य उद्योग और पेयजल एवं स्वच्छता हैं.

वहीं, अनुसूचित जनजाति के विकास की बात करें तो बजट में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग और पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालयों में सर्वाधिक कटौती की गई है. जनजातिय मामलों के मंत्रालय के लिए बजट में मामूली बढ़ोतरी की गई है.

नेशनल कैम्पेन ऑन दलित ह्यूमन राइट्स के अभय ने कहा कि अत्याचार निवारण अधिनियम और मैनुअल स्कैवेंजर्स के रूप में रोजगार का निषेध और उनके पुनर्वास अधिनियम 2013 जैसे कानूनों के लिए बजट में पर्याप्त मात्रा में धनराशि आवंटित की जाती है लेकिन वन अधिकार अधिनियम के क्रियान्वयन के लिए बजट में किसी तरह का कोई आवंटन नहीं है.