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ऐसे तो नहीं खत्म होगा प्रदूषण- प्रार्थना बोराह

दिल्ली-एनसीआर की हवा के बेहद खतरनाक स्तर पर पहुंचते ही सरकार हरकत में आ गई है। कहा गया है कि अगर वायु गुणवत्ता सूचकांक इसी हद तक खतरनाक बना रहा, तो निजी गाड़ियों पर प्रतिबंध और निर्माण-कार्यों पर पूरी तरह रोक लगाई जा सकती है। इस तरह के आपात उपायों की हमें जरूरत भी है, क्योंकि हमारे आसपास की आबोहवा विषैली बन चुकी है और हर कोई सांस की समस्या, गले की घरघराहट और खांसी की शिकायत कर रहा है। सब जानते हैं कि हवा के बिना मानव जीवन संभव नहीं और यह भी कि विषैली हवा हमें बीमार कर रही है। ऐसे में, सवाल यह है कि आखिर अक्तूबर में ही हमें वायु प्रदूषण के खिलाफ जंग की याद क्यों आती है, जबकि इसकी आहट हम काफी पहले से सुन रहे होते हैं? अक्तूबर का इंतजार करने की बजाय अब तक तो हमें एक सुव्यवस्थित वायु गुणवत्ता प्रबंधन रणनीति बना लेनी चाहिए थी, जो हमारी राष्ट्रीय नीति का हिस्सा होती।


वायु गुणवत्ता प्रबंधन दरअसल वही सारे कदम हैं, जो संबंधित नियामक संगठन वायु प्रदूषण के जानलेवा प्रभावों से मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण को बचाने के लिए उठाता है। इसमें सबसे पहले वायु की सेहत, प्रदूषण के स्रोत, कार्बन उत्सर्जन की फेहरिस्त, वायु गुणवत्ता निगरानी उपकरण जैसे सभी पहलुओं को आंककर लक्ष्य तय किए जाते हैं, और फिर वायु प्रदूषण को रोकने और उत्सर्जन को नियंत्रित करने वाली तकनीकों को अपनाया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में राजनेता, राष्ट्रीय एजेंसियां, औद्योगिक इकाइयां, वैज्ञानिक, पर्यावरण को लेकर काम करने वाले समूह, आम लोग, सभी शामिल किए जाते हैं।


पिछले दो वर्षों में ‘क्लीन एयर एशिया' ने दिल्ली समेत कई शहरों की वायु गुणवत्ता प्रबंधन प्रणाली का अध्ययन किया है। अन्य शहरों की तुलना में बेहतर निगरानी प्रणाली और लोगों की जागरूकता के कारण दिल्ली इस मामले में दूसरे राज्यों से जरूर आगे दिखती है, पर देश के कई शहर ऐसे भी हैं, जहां निगरानी प्रणाली का अभाव है और वहां की वायु गुणवत्ता का हमें कोई इल्म ही नहीं। इससे समझा जा सकता है कि वायु प्रदूषण से लड़ने को लेकर हमारा तंत्र किस हद तक गंभीर है? हकीकत का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि तमाम वजहों का पता होने के बाद भी हम दिल्ली को आज तक प्रदूषण मुक्त नहीं कर सके हैं?


दिल्ली को लेकर तर्क दिए जा सकते हैं कि कुछ मामलों में इसके हाथ बंधे हैं। मसलन, जब तक हरियाणा और पंजाब की सरकारें नहीं चाहेंगी, पराली का धुआं दिल्ली का दम घोंटता रहेगा। इसके अलावा राष्ट्रीय राजधानी चारों तरफ से दूसरे राज्यों से भी घिरी हुई है, जिसके कारण इसकी ‘लैंड लॉक्ड' परिस्थिति यहां की विषैली हवाओं के बाहर निकलने के मौके सीमित कर देती है। मगर इस तथ्य से तो शायद ही कोई इनकार करे कि यह खराब आबोहवा हमारे अनियोजित विकास की देन है। दिल्ली के आसपास ही 300 किलोमीटर के दायरे में 13 कोयला-आधारित बिजली संयंत्र दिन-रात धुआं उगलते रहते हैं। ऐसे में, यदि अब भी नीतिगत प्रयास नहीं हुए, तो वे दिन दूर नहीं, जब देश के कई दूसरे शहर भी दिल्ली की गति प्राप्त करेंगे। हमें समझना चाहिए कि वायु प्रदूषण के


मामले में कभी आगे रहने वाला चीन महज आंकड़े प्रकाशित करके या लोगों की मांग के कारण अपने लक्ष्य को नहीं पा सका है, बल्कि वायु गुणवत्ता प्रबंधन वहां की सरकार की प्राथमिकताओं में है और उसकी राष्ट्रीय योजना में संजीदगी से शामिल है।
आखिर हमारी रणनीति क्या होनी चाहिए? इसके लिए जरूरी है कि जब हम विकास-कार्यों से जुड़ी नीतियों की सोचें या उससे जुड़ी योजनाएं बनाएं या उन्हें लागू करें, तो उनका एक महत्वपूर्ण घटक सेहतमंद हवा भी हो। हमें वायु गुणवत्ता के मुद्दे को युक्तिपूर्वक सतत विकास के लक्ष्यों में शामिल करना होगा। इसे नीति-निर्माण प्रक्रिया के उन शुरुआती चरणों में रखना होगा, जहां विकासमूलक कार्यों की चुनौतियों की चर्चा की जाती है और उनसे निपटने के लिए योजनाएं तैयार की जाती हैं। इसे इस तरह से भी परिभाषित कर सकते हैं कि पारंपरिक पर्यावरण क्षेत्र से इतर ऐसी रणनीति बनाई जानी चाहिए, ताकि पर्यावरण की दृष्टि से सतत विकास को मदद मिल सके। यहां सतत विकास का मतलब प्राकृतिक व पर्यावरणीय संसाधनों की दीर्घकालिक क्षमता का इस्तेमाल करना है, ताकि भविष्य में मानव जीवन को सुगम और सुरक्षित बनाया जा सके। फिर चाहे वह हवा या पानी जैसे बुनियादी संसाधन ही क्यों न हों! हमें आज इनका कुशलतापूर्वक इस्तेमाल करने और भविष्य के लिए इन्हें संरक्षित रखने के बारे में सोचना ही होगा।


जाहिर है, खराब आबोहवा को सुधारने का लक्ष्य तभी हासिल किया जा सकता है, जब विकास कार्यक्रम और नीतियों का आकलन पारिस्थितिकी तंत्र के मुताबिक होगा, किसी राजनीतिक या भौगोलिक चश्मे से नहीं। जैसे कि अभी राज्य और भौगोलिक सीमा से परे
जाकर वायु प्रदूषण के उपायों पर गौर किए जाने की जरूरत है। और, यह राष्ट्रीय लक्ष्य महज निर्देश जारी करके या किसी तरह का लचीला रुख अपनाकर हासिल नहीं किया जा सकता। कृषि और औद्योगिक इकाइयां स्थापित करने वालों को भी इसी शर्त पर अनुमति मिलनी चाहिए कि उनकी तकनीक औद्योगिक क्षेत्र के आसपास की आबोहवा के लिए मुफीद होगी। उनसे होने वाले प्रदूषकों का उत्सर्जन मानकों के अनुरूप हो या कृषि अपशिष्ट के उचित निपटान में वे किसानों की मदद करें। इससे दिल्ली का दम घोंटने वाली जहरीली हवा का समाधान भी शीत की शुरुआत में ही हो सकता है।


सच तो यह है कि हमें शहर-दर-शहर इस समस्या से लड़ना होगा। एक व्यापक कार्ययोजना के बिना हम वायु प्रदूषण से कतई पार नहीं पा सकते। हमें इस कवायद में इससे जुड़े तमाम पक्षों को शामिल करना होगा। राष्ट्रीय स्तर की नीति-निर्माण प्रक्रिया को भी ऐसा रूप देना होगा, जो नई सोच वाली अभिनव योजनाओं को प्रोत्साहित करते हुए समग्र विकास की बात करे। अक्तूबर और नवंबर के महीने में इस मसले को राजनीतिक या धार्मिक बनाने से हमें कुछ हासिल नहीं होने वाला।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)