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कोरोना वायरसः क्या सामान्य ज़िंदगी जीने के दिन लौट आए?

-बीबीसी,

सरकार और मीडिया क्या कोरोना वायरस को लेकर ज़रूरत से ज़्यादा गंभीरता दिखा रहे हैं? क्या अब हमें आगे एक सामान्य जीवन की ओर बढ़ जाना चाहिए? - ये बड़े सवाल हैं.

अर्थव्यवस्था की बुरी हालत को देखते हुए इस पर कुछ गौर करने की ज़रूरत है. यहां कुछ सकारात्मक बातें करते हैं. इससे कोविड-19 ख़त्म हो चुका है- जैसी सोशल मीडिया पर आजकल खूब दिखने वाले वाली राय को प्रोत्साहित करने में मदद मिल सकती है.

मौतों और गंभीर रूप से बीमार होने वालों के ट्रेंड में लगातार गिरावट आ रही है.

महीनों से अस्पताल में आने वाले कोविड-19 संक्रमितों की संख्या में गिरावट दर्ज की जा रही है.

यूके में जिस वक्त कोरोना वायरस अपने चरम पर था तब वहां रोज़ाना क़रीब 20,000 मरीज आ रहे थे. अब यह आंकड़ा घटकर महज 800 रह गया है.

एक वक्त पर पूरी इंटेंसिव केयर यूनिट्स कोविड-19 मरीजों से भरी हुई थीं. इनमें से कई मरीजों को हफ़्तों तक वेंटीलेटर्स पर रहना पड़ा था.

इसी तरह से वेंटीलेटर्स पर आने वाले मरीजों की संख्या भी लगातार गिर रही है और यह 3,300 से घटकर 64 पर आ गई है.

कोविड से होने वाली मौतों को गिनने के कई तरीके हैं. लेकिन, इन सभी से पता चलता है कि अप्रैल में यह दर सबसे अधिक थी और तब से इसमें गिरावट आ रही है.

अगर हम कोरोना वायरस टेस्ट में पॉजिटिव आने के 28 दिनों के भीतर मरने वालों का आंकड़ा देखें तो यह औसतन 1,000 लोग रोज़ाना से 99 फ़ीसदी गिरकर 10 से भी कम रह गया है.

इसके मुकाबले प्रोस्टेट कैंसर से हर दिन औसतन 30 आदमियों की मौत होती है, जबकि ब्रेस्ट कैंसर से रोज़ाना 30 महिलाएं मर जाती हैं. कोरोना से उलट इनमें से कोई भी ख़बर रोज़ाना रात को टीवी पर नहीं आती है.

हालांकि, गुजरे कुछ महीनों से कोरोना वायरस के मामलों में बढ़ोतरी हो रही है, लेकिन इसकी बड़े तौर पर वजह टेस्टिंग में इज़ाफ़ा होना है.

जुलाई की शुरुआत से ही स्वाब टेस्ट को दोगुना किया गया है. नाक और गले के ज़्यादा स्वाब टेस्ट की वजह से वायरस का ज़्यादा पता चला है. लेकिन, इससे हॉस्पिटल में भर्ती होने वाले मरीजों की संख्या नहीं बढ़ रही है.

हालिया ओएनएस इनफेक्शन सर्वे से पता चला है कि इंग्लैंड में रोज़ाना 2,200 संक्रमण के मामले आ रहे हैं. जुलाई में मामूली इज़ाफ़े के बाद पिछले पूरे महीने यह आंकड़ा स्थिर रहा है.

ऐसे में यूके में कोरोना के फ़ैलने के बाद से चीज़ों में बड़ा बदलाव आया है.

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के एविडेंस-बेस्ड मेडिसिन के प्रोफेसर कार्ल हेनेघन कहते हैं, "अगर आप मार्च और अप्रैल की बात करें तो अतिसंवेदनशील लोगों का एक बड़ा पूल था जिसमें केयर होम्स में एक हफ़्ते में 1,000 कोरोना केस आ रहे थे. अब कहीं ज़्यादा युवा लोग संक्रमण की चपेट में आ रहे हैं और इन पर इसका ज़्यादा असर नहीं हो रहा है."

"दूसरा, वायरस के फ़ैलने की दर भी घटी है. सामाजिक दूरी के पालन के साथ लोग इससे बचने में सफल हो रहे हैं. इनका संपर्क वायरस की कम मात्रा से हो रहा है और इस वजह से ये कम गंभीर बीमार हो रहे हैं."

अगर आपको हॉस्पिटल में जाना पड़ता है तो आपके कोविड-19 से जीवित बचने के आसार काफी मजबूत होते हैं. मेडिकल टीमों के पास अब इस बात की अच्छी समझ है कि इस वायरस से कैसे लड़ना है और वे ज़्यादा प्रभावी डेक्सामेथेसोन जैसी दवाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं.

मैं बीबीसी का मेडिकल एडिटर हूं. 2004 से ही मैं कैंसर, जेनेटिक्स, मलेरिया और एचआईवी जैसे कई विषयों पर ख़बरें करता रहा हूं. इसके अलावा, मैंने मेडिकल साइंसेज में आए बदलावों पर भी लिखा है.

मैंने बर्ड फ्लू, सार्स और मर्स जैसे महामारी के ख़तरों को भी देखा है. अब मैं कोविड-19 और इसके दुनिया पर हो रहे भयंकर परिणामों को भी देख रहा हूं.

दुनिया भर में कोविड-19 के संक्रमण के मामले 2.4 करोड़ से ऊपर जा चुके हैं और इनमें हर चार दिनों में क़रीब 10 मामलों का इज़ाफ़ा हो रहा है.

इस महामारी की शुरुआत के बाद से 8 लाख से ज़्यादा मौतें हो चुकी हैं. लेकिन, यह टीबी जैसी दूसरी संक्रामक बीमारियों के मुक़ाबले अभी भी काफी कम है.

हवा में मौजूद बैक्टीरिया के संक्रमण से होने वाली टीबी से हर साल क़रीब 15 लाख लोगों की मौत होती है. इनमें से ज़्यादातर लोग विकासशील देशों में मारे जाते हैं. यह बीमारी मोटे तौर पर ग़रीबी और कुपोषण से जुड़ी हुई है. यह ऐसे लोगों को होती है जिनका इम्युनिटी सिस्टम कमज़ोर होता है.

कोविड के उलट इसे एंटीबायोटिक्स से ठीक किया जा सकता है. हालांकि, दवाइयों से बड़े पैमाने पर बेअसर टीबी के मामलों में गंभीर उछाल देखा गया है.

लेकिन, फिर से अपने मूल सवाल पर वापस लौटते हैः क्या ज़िंदगी को सामान्य रूप से चलाने का वक्त आ गया है?

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