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कश्मीरी पुलिस अधिकारी दविंदर सिंह के टेरर लिंक पर एनएसए अजीत डोभाल से कुछ सवाल

इस बात में कोई शक नहीं है कि जम्मू कश्मीर पुलिस के डीएसपी दविंदर सिंह का श्रीनगर-जम्मू हाईवे पर दिल्ली के रास्ते में दो संदिग्ध आतंकियों के साथ गिरफ्तार होना बीते कुछ समय में हुई राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी बड़ी घटनाओं में से एक है. और मुझे यकीन है कि अजीत डोभाल, ऐसे व्यक्ति होने के बतौर, जो राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में प्रधानमंत्री को सलाह देते हैं, बीते कुछ दिनों में इसके अलावा और कुछ नहीं सोच पाए होंगे.

सिंह को बीते शनिवार हिजबुल मुजाहिद्दीन के नवीद बाबा और अल्ताफ के साथ गिरफ्तार किया गया था. उनके साथ गाड़ी में मौजूद चौथा शख्स एक वकील है, जो जम्मू कश्मीर पुलिस के अनुसार आतंकियों का सहयोगी है, और मुख्यधारा में रहकर काम करता है.

पुलिस का कहना है कि उन्हें सिंह की गाड़ी से हथियार मिले थे; इसके बाद उन्होंने सिंह से जुड़े कुछ ठिकानों पर छापे मारकर और हथियार बरामद किए.

रविवार को हुई एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कश्मीर के आईजी विजय कुमार ने बताया कि सिंह के साथ किसी आतंकी की तरह ही बर्ताव किया जा रहा है और उन पर गैर क़ानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत मामला दर्ज  किया जाएगा.

अब बताया जा रहा है कि मामले की जांच केंद्र के मुख्य आतंकवाद निरोधी इकाई यानी राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को सौंपी जानी है.

मेरे लिए दविंदर सिंह की गिरफ्तारी को महत्वपूर्ण मानने की वजह यह है कि उनके वांटेड आतंकियों के साथ गाड़ी में मौजूद होने की कोई अनुकूल वजह नहीं है.

इस बात में कोई संदेह नहीं है कि लंबे समय की सड़ांध सामने आई है- बस लोगों के मन में अब यह सवाल है कि यह कितने गहरे तक फैली हुई है.

खराब व्यक्ति या खराब व्यवस्था

हर संस्थान में कुछ गलत लोग होते हैं और यह हम सब जानते हैं कि भारत के पुलिस फोर्स में ऐसे लोगों की कोई कमी नहीं है. जैसी उम्मीद थी, सिंह की गिरफ्तारी के बाद जम्मू कश्मीर पुलिस समेत तमाम सुरक्षा और खुफिया संस्थानों इसी बात को दोहरा रहे हैं.

ऐसे ‘बेईमान तत्व’ पर उंगली उठाना, उस संस्थागत व्यवस्था, जिसने उसे पैदा किया और दशकों तक पनपने दिया, के बारे में उठते सवालों के जवाब देने से ज्यादा आसान है.

दविंदर सिंह की गिरफ्तारी ने सुरक्षा एजेंसियों को चौंका दिया है और इसकी वजह है कि यह पहली बार नहीं है कि सिंह का नाम किसी आतंकवादी से जुड़ा है.

20 साल पहले साल 2000 में जब सिंह जम्मू कश्मीर पुलिस के स्पेशल ऑपरेशन्स ग्रुप (जिसे स्पेशल टास्क फोर्स भी कहा जाता है) में जूनियर अफसर थे- उनके द्वारा एक पूर्व आतंकी अफजल गुरु को प्रताड़ित किया गया था, उससे वसूली की गयी और उससे एक छोटा काम करवाया गया.

यह वही अफजल था, जिसे साल 2013 में भारतीय संसद पर दिसंबर 2001 में हुए हमले की साजिश का हिस्सा होने के चलते फांसी दी गयी थी.

अफजल ने तिहाड़ जेल से अपने एक वकील को बिना तारीख का एक पत्र भेजा था, जिसमें उसने कहा था कि दविंदर सिंह और एक अन्य अफसर डीएसपी विनय गुप्ता ने उसे श्रीनगर के हुमहमा स्थित एसटीएफ कैंप में उसे प्रताड़ित किया था. उस समय गुरु ने उन्हें 80 हजार रुपये और अपना स्कूटर दिया था. लेकिन 2001 के आखिरी महीनों में वह दविंदर से फिर मिला.

अगर गुरु की बात पर विश्वास किया जाए, तो यह एक ऐसी मुलाकात थी, जिसकी कीमत गुरु ने अपनी जान देकर चुकाई. अफजल ने लिखा था:

‘डी.एस ने मुझे कहा कि मुझे उसके लिए एक छोटा-सा काम करना होगा, जो था कि मुझे एक आदमी को दिल्ली लेकर जाना था क्योंकि मैं दिल्ली से अच्छी तरह वाकिफ था और उस आदमी के लिए किराये का घर ढूंढना था. मैं इस आदमी को नहीं जानता था लेकिन मुझे शक है कि वह कश्मीरी नहीं था क्योंकि वह कश्मीरी नहीं बोल रहा था, लेकिन दविंदर ने जो कहा था मैं वो करने को बेबस था.

मैं उस व्यक्ति को दिल्ली ले गया. एक दिन उसने मुझसे कहा कि वह एक कार खरीदना चाहता है. तो मैं उसे करोल बाग ले गया. उसने गाड़ी खरीदी. तब दिल्ली में वो अलग-अलग लोगों से मिलता था और हमें- मोहम्मद और मुझे दोनों को दविंदर से अलग-अलग फोन कॉल आया करते थे.’

अफजल के अनुसार, जिस ‘मोहम्मद’ को दविंदर ने उसे दिल्ली लाने को कहा था, वह उन पांच आतंकियों में से एक था, जो 13 दिसंबर 2001 को संसद पर हमले के दौरान मारा गया था, और मारे जाने के पहले उसने नौ लोगों को मारा था.

वह जांच जो कभी नहीं हुई

अब हमारे पास अफजल ने जो लिखा उसकी सत्यता को परखने का कोई तरीका नहीं है और यह भी एक पहलू है कि कोई दोषी ठहराया गया व्यक्ति अपनी जिंदगी बचाने की कोशिश में क्या कह सकता है, इस पर भरोसा करने की कोई वजह नहीं है.

जिन जज ने अफजल को दोषी ठहराया था, अब उनका कहना है कि अगर यह आरोप सही भी होते, तब भी उनका दिया गया फैसला नहीं बदलता. लेकिन खुफिया एजेंसियों से इस तरह से काम करने की उम्मीद नहीं की जाती.

मिसाल के तौर पर इजराइल के मोसाद को देखिए. मोसाद में ‘टेंथ मैन स्ट्रेटेजी’ का पालन किया जाता है, यानी अगर एजेंसी में 9 लोग किसी एक कहानी पर विश्वास कर रहे हैं, तो यह दसवें व्यक्ति का फर्ज है कि वह कोशिश करे और इसको गलत साबित करे.

अब, जब कश्मीर की एसटीएफ भ्रष्ट होने के लिए कुख्यात है, ऐसे में भारतीय खुफिया समुदाय में से किसी को खड़े होकर इसके खिलाफ बोलना चाहिए था, ‘रुकिए, अफजल ने दविंदर सिंह के बारे में कुछ खतरनाक बातें कही हैं. हमें उसे जांचना चाहिए.’

दुख है कि किसी ने कुछ नहीं किया. क्या इसकी वजह सामान्य भारतीय अक्षमता है या निष्क्रियता? लेकिन हम देश के सबसे बड़े आतंकी हमले की बात कर रहे हैं जो देश की राजधानी में हुआ था. निश्चित तौर पर सिस्टम ने इसे हल्के में नहीं लिया होगा.

तो क्या ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि एसटीएफ कश्मीर में आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में सबसे आगे रहा और एक डीएसपी पर उंगली उठाना या यहां तक कि सवाल पूछने से भी सुरक्षा बलों के ‘मनोबल’ पर कोई प्रभाव पड़ता? शायद.

या फिर ऐसा था कि इंटेलिजेंस और सुरक्षा एजेंसियों के उच्च अधिकारी जानते थे कि दविंदर इसमें अकेला नहीं है और यह कुछ चंद रुपयों के लिए नहीं किया गया है- और वह किसी बड़े ऑपरेशन का हिस्सा था, जो स्पष्ट रूप से गड़बड़ हो गया था और उसे छिपाने की जरूरत थी?
 
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