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कहर ना बन जाए कुदरत की सौगात - मृणाल पांडे

भरपूर मानसून का आना शहर और गांव हर कहीं खुशी का माहौल रचता है। पर इधर जब से नगर, महानगर में और कुछ चुनिंदा शहर स्मार्ट सिटी में बदलने शुरू हुए हैं, बरसात की खुली झड़ी हर शहर, हर कस्बे पर एक आफत बनकर बरसती है। सड़कों पर उफनते नालों-सीवरों का भलभलाकर उलट आना, भारीभरकम जाम, घरों के भीतर घुसे पानी से जान-माल की तबाही, यह हमने गए सालों में चेन्न्ई से घाटी तक और गुड़गांव (क्षमा करें, गुरुग्राम) से कोलकाता, गुवाहाटी तक से देखा-सुना। कोई बढ़ती आबादी को कोस रहा है तो कोई सरकारी और बिल्डर दस्तों के समवेत भ्रष्टाचार को। टीवी पर आबादी विशेषज्ञ, वित्तशास्त्री व पर्यावरणविद दिल दहलाने वाली उपमा देकर कहते हैं कि गरीब और विकासशील देशों की बेलगाम आबादी एक खतरनाक टिकटिकाता बम है। इसे तुरंत निरस्त न किया गया तो उसके विस्फोट से जल्द ही दुनियाभर में साफ हवा, पानी, ऊर्जा, अन्न्, आवास यानी जीवनयापन हेतु हर जरूरी तत्व की भारी किल्लत हो जाएगी।

असल सच आज भी वही है, जिसे गांधीजी ने तब भी बार-बार रेखांकित किया था। पृथ्वी पर मौजूद संसाधन सबकी सामान्य जरूरतें तो पूरी कर सकते हैं, लेकिन किसी के असीमित लालच को तृप्त करने के लिए वे अपर्याप्त हैं। विश्व बैंक के अनुसार दुनिया की कुल आबादी का एक छोटा-सा हिस्सा ऐसे अतिसमृद्ध लोग हैं, जिन्होंने दुनिया के तीन चौथाई संसाधनों पर कब्जा कर रखा है। 'लिव लाइफ किंग साइज" जीवनशैली का पक्षधर दुनिया की आबादी का यह सिर्फ पांचवां हिस्सा हर देश में सब कुछ अपने लिए समेटने की भूख से पीड़ित है। एशियाई तेल के कुएं, अफ्रीका और भारत की खदानों से लेकर जंगलों तक सब मिट गए और ऊर्जा के गैरजरूरी इस्तेमाल से बनी घातक ग्रीनहाउस गैसें लगातार पर्यावरण में छेद करती रहीं। आज दुनिया जिस कुदरती कहर को चक्रवाती तूफानों, सुनामियों, बाढ़, सुखाड़ और भूकंप के रूप में बार-बार झेल रही है, उसके मूल दोषी कुदरती संसाधनों के लापरवाह दोहन को उकसावा देते रहे यही रईस हैं, जो अब खुद उसके कारण अरबों की संपदा खो रहे हैं। गरीबों की आबादी भले उनसे पांच गुना बड़ी हो, पर दो जून की दाल-रोटी जुटाने की सीमित इच्छा से दुनिया तबाह नहीं होती। बड़ी जरूरत तो कुदरती संपदा के उस अनावश्यक उपभोग को रोकने की है, जो आज भारत, चीन या ब्राजील जैसे विकासशील देशों के नवधनिकों की जीवनशैली का हिस्सा बन गया है।

हम बहुत खुशी से कहते हैं कि हमारी सकल राष्ट्रीय आय दुनिया में सबसे बड़ी होने जा रही है। पर रुकें। इस आय का वितरण इतना विषम क्यों? क्यों औद्योगिक तरक्की की डगर पर बढ़ते देशों में मेहनती और महत्वाकांक्षी मध्यवर्ग की जेब में छेद करने को हर कहीं अपना माल बेचने को आतुर बाहरी कंपनियां विकासशील देशों की सरकार को चटपट तरक्की का फॉर्मूला देकर तमाम छूटें पाते हुए खरीदो-खरीदो चिल्लाती फिर रही हैं? भारत में कभी इसी प्रक्रिया के तहत एफ वन फॉर्मूला रेस की जगर-मगर शुरुआत होती है तो कभी बुलेट ट्रेन के लिए खास ट्रैक की। वाहनों की बढ़ती तादाद के कारण जिस देश के शहर सुबह से शाम तक भयावह प्रदूषण और ट्रैफिक जाम झेलने को मजबूर हैं और दुर्घटनाएं व रोड रेज में मारपीट आम नजारे हैं, वहीं हर बरस पेट्रोल को पानी की तरह पीने वाली सुपर महंगी फर्राटा कारों की नुमाइश और दौड़ का जश्न शैंपेन की बोतलों के झाग में सराबोर होकर मनाया जाता है। जो मीडिया इस चूहादौड़ को 'अबस देखिए देखन जोगू" के अंदाज में लगातार दिखाता और पर्यटकों को न्योतता है, उसे शायद ऐसे विरोधाभास रेखांकित करना जरूरी नहीं लगता कि उसी समय उसी शहर के सरकारी अस्पतालों में गरीब लोगों के दर्जनों नवजात बच्चों की अकाल मौत हो गई। या कि वहां एक ही दिन में सरकारी गोशाला की सैकड़ों गायें चारा न मिलने से मर गईं। अब उनकी लाशें सड़ रही हैं क्योंकि तथाकथित गोरक्षकों के डर से दलित यह काम छोड़ रहे हैं।

इसमें शक नहीं कि चीन ने जब से सिर्फ एक बच्चा प्रति परिवार सरीखे कठोर कदम उठाकर अपनी आबादी पर काबू पाया, उसकी आर्थिक तरक्की की रफ्तार में भारी इजाफा हुआ है। और आज वह अपनी आबादी को बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं देने में सक्षम है। लेकिन यह भी गौरतलब है कि वहां लोगों ने बेटा बचाने की चाह में नवजात कन्याओं को भारी तादाद में मारकर आबादी का लिंगानुपात बुरी तरह से गड़बड़ा दिया। उधर, इकलौते बच्चों की बिगड़ैल भीड़ अपने पुरखों की तरह बूढ़ों की सेवा या मितव्ययिता को गुण मानने के बजाय उसी उपभोगवाद की तरफ ताबड़तोड़ लपक रही है जो लगातार 'अपनी ही सोचो, नया खरीदो, पुराने को फेंको" का दर्शन सिखाता है। नतीजतन चीन को एकाधिक संतान पैदा करने की छूट फिर देनी पड़ी।

उसके सरदर्द और भी हैं, जिनको हमें गौर से देखना चाहिए क्योंकि हम भी उसी अंधी दौड़ को लपक रहे हैं। दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आर्थिक ताकत बनने के साथ चीन आज दुनिया में सबसे बड़ी एकाकी वृद्ध आबादी वाला देश और विनाशकारी ग्रीनहाउस गैसों का सबसे बड़ा उत्सर्जक भी बन गया है। नई जीवनशैली तथा प्रदूषण से उपजे डायबिटीज, दमा और रक्तचाप जैसे रोग तथा भूमि की उर्वराशक्ति का क्षरण उसकी नई पीढ़ी को एक साथ अपने चंगुल में ले रहे हैं। अन्यत्र गुआटेमाला, बांग्लादेश और थाईलैंड सरीखे छोटे समुद्रतटीय देशों में पर्यावरण क्षरण से भूकंप, सुनामियां, कीचड़ की बाढ़ तथा तटीय जमीन के समंदर में समाने की घटनाओं में जो बढ़ोतरी हो रही है, उसकी भी सबसे बड़ी मार गरीब ही झेल रहे हैं। जबकि पर्यावरण विनाश का यह खतरा न्योतने वाले वहां के बिल्डर, खदान मालिक जैसे अमीर लोग कानून तोड़ने के बावजूद खूब कमाई कर रहे हैं।

तकनीकी दृष्टि से आबादी घटाने के बाबत विशेषज्ञों की चेतावनी अर्थहीन नहीं। लेकिन याद रखें जिस समय हम राज समाज में आत्मसंयम लाए बिना फोर्ब्स, या मेकेंजी की अरबपति, खरबपति सूचियों में हिंदुस्तानियों की तादाद बढ़ने पर गाल बजा रहे हैं, पर्यावरण हम सबको रसातल की ओर ले जा रहा है। यह तय है कि अरब खाड़ी या हिंद महासागर का पानी जब ध्रुव प्रदेश पिघलने से हमारे महानगरों में घुसने लगेगा तो न मुकेश अंबानी का बंगला बचेगा, न गोदरेज या अमिताभ बच्चन का। कुदरत का कानून अमीर-गरीब का भेद नहीं करता। जब हिमालयीन ग्लेशियरों के साथ गंगा च यमुना च गोदावरी सिंधु कावेरी सब की सब सरस्वती की तरह विलुप्त होने लगेंगी और सस्ते 'रिलीजस टूरिज्म" की मार से हिमालय की छाती फटकर केदारनाथ त्रासदी की पुनरावृत्ति होगी, क्या हम तभी स्वीकारेंगे कि इस अतुल्य भारत को रचने की असली कीमत क्या है?

(लेखिका वरिष्ठ साहित्यकार व स्तंभकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं)