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कहां कितना भ्रष्टाचार- आंकड़ों के आईने में...

क्या आप जानते हैं कि साल 2000 से 2009 के बीच महाराष्ट्र में भ्रष्टाचार के सर्वाधिक मामले (4566) और  पश्चिम बंगाल में भ्रष्टाचार के सबसे कम मामले (केवल 9) दर्ज हुए। क्या आप यह भी जानना चाहते हैं कि गुजरे दस सालों में देश के अलग-अलग सूबों में भ्रष्टाचारियों से कितनी रकम वापस हासिल की गई। भ्रष्टाचार के मामलों पर विधिवत नजर रखनी हो तो कहां जायें। कैसे पता चले कि केंद्र और राज्यों में कितने नौकरशाह या राजनेता भ्रष्टाचार के आरोपी हैं।

मीडिया, जनचेतस नागरिक, सर्व-साधारण और उन सब लोगों के लिए जो भारत की प्रगति के क्रम में भ्रष्टाचार की चुकायी जा रही कीमत को लेकर चिन्तित हैं, इन बातों को आसान बनाने के लिए कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइटस् इनिशिएटिव(सीएचआरआई) ने एक व्यापक डेटाबैंक तैयार किया है। यह डेटाबैंक बस माऊस के एक क्लिक पर आपके लिए हाजिर है।. (साल 2000 से 2009 तक के भ्रष्टाचार से संबंधित आंकड़ों के लिए इस लिंक को चटकायें-http://bit.ly/eDES7S). ये आंकड़े बड़े परिश्रमपूर्वक पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च, नेशनल क्राईम रिकार्ड ब्यूरो और भारत सरकार के विविध मंत्रालयों( इसमें कार्मिक मंत्रालय भी शामिल है जिसको पारदर्शिता का जिम्मा दिया गया है) और कई अन्य महत्वपूर्ण स्रोतों  से जुटाये गए हैं। 

सीएचआरआई में कार्यरत वेंकेटेश नायक द्वारा जारी एक रिलीज के अनुसार डेटाबैंक में प्रस्तुत आंकड़ों को राज्यवार पंजीयन, वर्षवार अभियोजन और जब्त या वसूली गई रकम के खानों के हिसाब से दिया गया है। भ्रष्टाचार पर निगाह रखने और जन लोकपाल बिल को लेकर चल रही बहस में तथ्यसम्मत रीति से शामिल होने के इच्छुक पाठकों के लिए इन्कलूसिव मीडिया फॉर चेंज की टोली की तरफ से यहां वेंकटेश नायक की चिट्ठी का संक्षिप्त अनुवाद प्रस्तुत किया जा रहा है। 

दोस्तो,

हम फिलहाल इस बात पर बहस में मुब्तिला हैं कि प्रस्तावित लोकपाल नामक संस्था का स्वरुप कैसा होना चाहिए और इस बहस के बीच भ्रष्टाचार-निरोधी मौजूदा व्यवस्था भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए कुछ ना कुछ कर रही है। आमतौर पर यह शिकायत सुनने में आती है कि भ्रष्टाचार के मामले में संतोषजनक समयसीमा के भीतर किसी फैसले पर नहीं पहुंचते। पंजीयन और जांच में देरी और अभियुक्त पर मुकदमा चलाने के मामले में सरकार द्वारा देरी से फैसला लेना- दो ऐसी बड़ी वजहें हैं जिससे भ्रष्टाचार से संबंधित मामलों का निस्तारण चटपट नहीं हो पाता। देश के विभिन्न राज्यों में भ्रष्टाचार-निरोधी अमला अलग-अलग गति और प्रभाव के साथ भ्रष्टाचार के मामलों पर सक्रिय है। चाहे हम इसके परिणामों से खुश हों या नहीं लेकिन इतना जरुर कहा जा सकता है कि भ्रष्टाचार के सारे मामले फैसले के अंतहीन इंतजार के ब्लैकहोल में नहीं दाखिल हो रहे। देश का नेशनल क्राईम रिकार्ड ब्यूरो सालाना आधार पर अपराध के अन्य आंकड़ों के साथ-साथ भ्रष्टाचार के मामलों पर भी आंकड़े प्रकाशित करता है।

 

पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च ने नेशनल क्राईम रिकार्ड ब्यूरो के इन आंकड़ों का इस्तेमाल वर्ष 2000-2009 की अवधि के लिए किया है ताकि भ्रष्टाचार से संबंधित मामलों के बारे में विविध जानकारियां राज्यवार जानी जा सकें।

 

आप चाहें तो सामने दी गई लिंक को चटका सकते हैं या फिर इसे कट-पेस्ट विधि से एड्रेस बॉक्स में इस्तेमाल करके 2000-2009 के बीच की अवधि भ्रष्टाचार से संबंधित जानकारियों को हासिल कर सकते हैं।: http://bit.ly/eDES7S

आंकड़ों को आप तीन खानों में बंटा हुआ देख सकते हैं-:

 a) वर्षवार विभिन्न राज्यों में भ्रष्टाचार के कितने मामले दर्ज किए गए।

 b) वर्षवार विभिन्न राज्यों में भ्रष्टाचार के कितने मामलों में फैसला आया।

c) विभिन्न राज्यों में भ्रष्टाचार के आरोपियों से कितनी रकम हासिल या जब्त की गई।

अगर आप मूल आंकड़ों का विश्लेषण स्वयं करना चाहते हैं तो कृपया निम्नलिखित लिंक का इस्तेमाल करें- : http://bit.ly/corruptioncasesinindia

क्या कहते हैं आंकड़े-?

1) दो राज्य ऐसे हैं जहां भ्रष्टाचार के मामले तो संख्या में बहुत ज्यादा दर्ज किए गए लेकिन इन राज्यों में भ्रष्टाचार के मामलों में फैसले बहुत कम सुनाये गए। महाराष्ट्र में भ्रष्टाचार के सर्वाधिक(4,566) मामले दर्ज किए गए लेकिन वहां कंविक्शन रेट 27 फीसदी का रहा।भ्रष्टाचारियों से वसूल पायी गई या जब्त की गई रकम महज. 9.1 करोड़ की रही। भ्रष्टाचार के मामलों को दर्ज करने के मामले में राजस्थान दूसरे नंबर(3,770 मामले) पर रहा। कुल एक तिहाई मामलों में फैसला आया और भ्रष्टाचारियों से वसूली या जब्त की गई रकम रही. 9.7 करोड़।

 

2) बीमारु राज्य के नाम से कुख्यात राज्यों में से कुछ ने बाकी सूबों की तुलना में भ्रष्टाचार पर अंकुश रखने के मामले में अच्छा कामकाज किया है। बिहार में भ्रष्टाचार के कुल 617 मामले दर्ज हुए और कंवीक्शन की दर रही 79 फीसदी जबकि भ्रष्टाचार के आरोपियों से कुल 14.5 करोड़ की रकम वसूली गई। साल 2005 से 2007 के बीच बिहार में कंविक्शन रेट शत-प्रतिशत की रही है। यह दर साल 2009 में गिरकर 60 फीसदी हो गई लेकिन इसी साल वसूली या जब्ती में हासिल रकम 7.8 करोड़ तक जा पहुंची जो पूरे एक दशक में सर्वाधिक है।

 

3) मध्यप्रदेश में भी कंविक्शन रेट ऊंची(50 फीसदी) रही। यहां कुल 1,257 मामले दर्ज किए गए और 36.2 करोड़ की रकम वसूल हुई।

 

4) दी गई अवधि में ओड़ीशा में भ्रष्टाचार के कुल 2,957 मामले दर्ज हुए, कंविक्शन की दर एक तिहाई रही और कुल 63 करोड़ रुपयों की वसूली हुई।

 

5) दी गई अवधि में कर्नाटक में भ्रष्टाचार के कुल 2422 मामले दर्ज हुए जबकि कंविक्शन की दर रही 14 फीसदी। बहरहाल नीची कंविक्शन दर के बावजूद कर्नाटक में भ्रष्टाचार के आरोपियों से कुल 20 करोड़ रुपये की रमक वापस वसूली गई।

 

6) सिक्किम में भ्रष्टाचार के कुल 155 मामले दर्ज किए गए लेकिन कंविक्शन रेट के मामले में 68 फीसदी के आंकड़े के साथ यह राज्य दूसरे स्थान पर है। केरल में भ्रष्टाचार के कुल 1572 मामले दर्ज किए गए। कंविक्शन रेट के मामले में यह राज्य 65 फीसदी के आंकड़े के साथ तीसरे नंबर पर है। यहां भ्रष्टाचारियों से एक पाई भी नहीं वसूल हुई।

 

7) आंध्रप्रदेश (भ्रष्टाचार के दर्ज मामले 2,686) तमिलनाडु (भ्रष्टाचार के दर्ज मामले 1,719 ) और असम (भ्रष्टाचार के दर्ज मामले 95) भी कंविक्शन रेट के मामले में(क्रमश 58%, 55% और 54 फीसदी) अच्छे कहे जा सकते हैं। आंध्रप्रेदश में भ्रष्टाचारियों से वसूली गई रकम 13.6 करोड़ की रही। तमिलनाडु में भ्रष्टचारियों से 6.9 करोड़ की रकम वसूल हुई जबकि असम में भ्रष्टाचारियों से एक पाई की वसूली नहीं हुई।

 

8) कहा जाता है कि गुजराज सबसे अच्छे प्रशासित राज्यों में है। इस राज्य में भ्रष्टाचार के के दर्ज मामलों की संख्या दी गई अवधि में कुल 1,880 थी और कुल एक तिहाई मामलों में फैसला आया। दस सालों में भ्रष्टाचारियों से वसूली गई रकम इस राज्य में 2.4 करोड़ रुपये की रही। जम्मू-कश्मीर भी कंविक्शन रेट के मामले में गुजरात के आस-पास(30 फीसदी) ही रहा। यहां भ्रष्टाचारियों से एक दशक में कुल 9.5 करोड़ की रकम वसूली गई।भ्रष्टाचार पर लगाम कसने के मामले में माओवादी हिंसा से प्रभावित छत्तीसगढ़( भ्रष्टाचार के कुल दर्ज मामले267, कंविक्शन रेट 48% , वसूली गई रकम 3.4 करोड़ रुपये) गुजरात से कही आगे रहा।

 

9) मणिपुर,  मेघालय ,मिजोरम और त्रिपुरा में भ्रष्टाचार के कुछेक मामले दर्ज जरुर हुए लेकिन यहां कंविक्शन रेट शून्य की रही। गोवा में एक दशक में भ्रष्टाचार के कुल 32 मामले दर्ज किए गए लेकिन यहां भी कंविक्शन रेट शून्य की रही।

 

10) पश्चिन बंगाल में एक दशक में भ्रष्टाचार के कुल 9 मामले दर्ज किए गए। यहां साल 2008-09 में भ्रष्टाचार का एक भी मामला दर्ज नहीं हुआ। इस राज्य में अभी चुनाव चल रहे हैं और फिलहाल वामपंथी शासन जारी है यानी मार्क्स का वह कथन अभी सच नहीं हुआ कि राज्य को एक दिन जाना है लेकिन ऐसा जान पड़ता है कि भ्रष्टाचार तो कबका जा चुका इस राज्य से। क्या पश्चिम बंगाल से संबंधित भ्रष्टाचार के आंकड़ों में कुछ गड़बड़झाला है। खैर यह बात तो विशेषज्ञ ही बतायेंगे।

 केद्र सरकार के स्तर पर भ्रष्टाचार--

इस डेटाबैंक से यह नहीं पता चलता कि केंद्र सरकार में भ्रष्टाचार-निरोध के लिए क्या किया है। कार्मिक मंत्रालय द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार सीबीआई ने भ्रष्टाचार के कुल 2276 मामले साल 2008-2011(31 मार्च) की अवधि में दर्ज किए हैं। सीबीआई ने इस अवधि में कुल 1924 मामलों में आरोपपत्र दाखिल किया। कितनी रकम भ्रष्टाचारियों से वसूली गई या फिर कितने मामलों में फैसला आया, इसकी जानकारी का आना अभी शेष है।.

मंत्रालय के जवाब की अविकल प्रति के लिए कृपया निम्नलिखित लिंक को चटकायें। : http://164.100.47.132/LssNew/psearch/QResult15.aspx?qref=103492

[Disclaimer: उपर्युक्त जानकारी एनसीआरबी,पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च, मिनिस्ट्री ऑव पर्सोनेल और लोकसभा वेबसाइट द्वारा सार्वजनिक जनपद में प्रस्तुत किए गए आंकड़ों से जुटायी गई है। सीएचआरआई इन आंकड़ों के सही और सटीक होने के बारे में जिम्मेदार नहीं है।संदेह की स्थिति में पाठक संबंधित संगठन से स्पष्टीकरण के लिए संपर्क करें।]

 

 

सधन्यवाद

वेंकटेश नायक

प्रोग्राम को-ऑर्डिनेटर

एक्सेस टू इन्फॉरमेशन प्रोग्राम

कॉमनवेल्थ ह्यूमम राइटस् इनिशिएटिव

बी-117, पहला प्लोर, सर्वोदय एन्कलेव

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दूरभाष: +91-11-43180215/ 43180200

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स्काइप: venkatesh.nayak

वेवसाइट: www.humanrightsinitiative.org