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कहां है हमारी डिजिटल संप्रभुता?-- संदीप मानुधने

सत्रह वर्ष पहले पाकिस्तानी घुसपैठियों ने कारगिल क्षेत्र में आक्रमण किया था. वह भारत के लिए एक चुनौती थी, जिसे हमारी सेना ने मुंहतोड़ जवाब देकर खत्म कर दिया था. उस युद्ध से एक अच्छी सीख हमें मिली थी. जब युद्ध चरम पर था, तब उपग्रह प्रणाली के जरिये हमने दुश्मन के कोऑर्डिनेट्स (स्थल पहचान चिह्न) पता करने के लिए अमेरिका से जीपीएस डाटा (जीपीएस अमेरिकी सिस्टम है) मांगा था. पाकिस्तान से संबंध खराब न हों, इसलिए अमेरिका ने हमें इनकार कर दिया.

यह भारत सरकार के लिए एक झटका था, जिसने हमें यह सिखाया कि रणनीतिक हथियार (युद्ध मामले में उपग्रह प्रणाली) हमें खुद ही विकसित करनी पड़ेगी. नतीजा, इसरो द्वारा पूर्णतः देशी उपग्रह प्रणाली (जीपीएस का विकल्प) विकसित कर कक्षा में स्थित कर दी गयी. मैं बात कर रहा हूं हमारे अपने जीपीएस, अर्थात् आइआरएनएसएस की, जिसे मोदीजी ने ‘नाविक' नाम दिया है. हमारे सात उपग्रह संपूर्ण दक्षिण एशिया और मध्य-पूर्व में रियल-टाइम में नजर गड़ाये हुए हैं. अब हमें किसी की मदद की जरूरत नहीं है. 

यह गर्व की बात है. लेकिन, जैसे ही हम नजर घुमा कर डिजिटल दुनिया का विश्लेषण करते हैं, हम अचानक पाते हैं कि डिजिटल दुनिया में भारतीय सेवा-प्रदाताओं और ब्रांड्स की उपस्थिति लगभग शून्य के बराबर है, जबकि उपयोगकर्ताओं (यूजर्स) की संख्या दिन-दूनी रात-चौगुनी बढ़ती जा रही है. 

क्यों महत्वपूर्ण है यह विषय? आइए समझें. आनेवाले कल में लगभग हर सेवा, चाहे सरकारी हो या निजी, हमें डिजिटल रूप में मिलने लगेगी. व्यापक डाटा स्टोरेज, सोशल मीडिया, इमेल, मेसेजिंग, विडियो स्ट्रीमिंग, शिक्षण-वेबसाइट्स, ऑनलाइन बुकिंग्स, इ-कॉमर्स, ड्राइवर-विहीन वाहनों और कृत्रिम बुद्धिमता, सब कुछ डिजिटल अधोसंरचना पर ही आधारित होंगे. अब जाहिर सी बात है कि जो देश और कंपनियां इन सब पर नियंत्रण करेंगी, वही दुनिया पर राज करेंगी.

आज जिस गति से हम भारतीय इंटरनेट से जुड़ रहे हैं, अगले पांच वर्षों में शायद हम चीन के यूजर-बेस को पीछे छोड़ देंगे, अमेरिका की तो गिनती ही नहीं. ऊपरी तौर पर लग सकता है कि भारत व चीन आनेवाले डिजिटल युग में सिरमौर बन सकते हैं. 

बिलकुल गलत. आज की स्थिति देखें, तो भारतीय परिप्रेक्ष्य में केवल निराशा हाथ लगती है. लगभग सभी बड़े सेवा-प्रदाता या प्रोडक्ट्स बेचनेवाले या तो अमेरिकी हैं या चीनी हैं. फेसबुक, गूगल, यूट्यूब और जीमेल- अमेरिका के हैं. एप्पल, ट्विटर और अमेजन भी अमेरिका के हैं. सैमसंग- कोरिया का है. अलीबाबा और अली-पे- चीन के हैं. व्हाॅट्सएप्प और वर्डप्रेस भी अमेरिका के हैं. बताइये कहां हैं भारतीय ब्रांड्स? 

हम अपना सारा डाटा विदेशी कंपनियों को देते चले जा रहे हैं. देखते ही देखते, ऑटोमेशन के जरिये इन विदेशी कंपनियों को भारतीयों के बारे में जितना पता होगा, उतना खुद भारत की सरकारों को भी पता नहीं होगा! आनेवाले कल में जिस देश के हाथ में डाटा होगा, वह हर कमर्शियल लड़ाई आसानी से जीत लेगा. हम केवल यूजर्स बन कर रह जायेंगे, और इन्हें कमाने का मौका देते रहेंगे. बहुत होगा तो हम इनके वेंडर बन जायेंगे, लेकिन मुख्य ब्रांड्स नहीं बन पायेंगे.

एक मिनट- भारतीय भी हैं, अवश्य हैं! गूगल को एक भारतीय चला रहे हैं- सुंदर पिचई. पर क्या वे गूगल के मालिक हैं? नहीं. क्या वे लाभ गूगल के मालिक बनेंगे- नहीं. सत्या नडेला भी माइक्रोसॉफ्ट चला रहे हैं, पर मालिक नहीं हैं. कमोबेश यही स्थिति सब बड़ी इंटरनेट कंपनियों में हैं. 

ऐसा क्यों? भारतीय प्रतिभा इन कंपनियों को चला पा रही है और विश्व-विजेता बना रही है, पर भारत में रह कर नहीं? भारतीय कंपनियां बना कर नहीं? हर भारतीय माता-पिता का अंतिम सपना है कि उनका बेटा या बेटी गूगल या फेसबुक में नौकरी कर ले, खुद का गूगल बनाये ऐसा नहीं. ऐसे में मुमकिन है कि भारत की ये प्रतिभाएं आनेवाले कल में भारत पर इन अमेरिकी ब्रांड्स को राज करवायेंगी. तो क्या गलत हो रहा है यहां? 

गलत यह है कि भारत में हम वह विजन, वह माहौल और वह सरकारी मदद हमारे उद्यमियों और विजनरीज को दे ही नहीं पा रहे हैं. 

आप मुझसे असहमत होकर कह सकते हैं कि अमेरिका और सिलिकॉन वैली से कोई भी नहीं लड़ सकता. तो फिर चीन ने गूगल, फेसबुक, अमेजन, ट्विटर और उबर को पटखनी कैसे दे दी? क्योंकि 1990 के बाद से ही चीन की कम्युनिस्ट पार्टी यह समझ गयी थी कि आनेवाले डिजिटल युग में उन्हें उनके ब्रांड्स बनाने पड़ेंगे, अन्यथा सारे चीनी नागरिक अमेरिकी ब्रांड्स से जुड़ जायेंगे (और चीन की विशिष्ट राजनीतिक स्थिति के हिसाब से यह पार्टी के लिए बिलकुल ठीक नहीं होता). इसीलिए हर क्षेत्र में चीन के अपने ब्रांड्स प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से खड़े किये गये- अमेजन के सामने अलीबाबा (ये दोनों आज भारत के ब्रांड्स को खत्म करने या खरीदने में लगे हैं, और हम भारतीय उछल-उछल कर उन्हें समर्थन दे रहे हैं!), गूगल के सामने बायडू, फेसबुक के सामने टेनसेंट, ट्विटर के सामने वाइबो, उबर के सामने डीडी चशिंग, आदि. चीन आज सीना चौड़ा करके अमेरिका को चुनौती इसीलिए दे रहा है.

मोदी जी ने महत्वाकांक्षी डिजिटल इंडिया प्रोजेक्ट के जरिये अद्भुत विजन दिखाया है. लेकिन, हम उस विजन को केवल तभी सही मायनों में भारतीय बना सकते हैं, जब अपने देश की ब्रांड्स और कंपनियां उसे मूर्त रूप दें. हाल ही में मुझे झटका लगा, जब एक वरिष्ठ मंत्रीजी ने भारत सरकार का क्लाउड (संवेदनशील सरकारी डिजिटल फाइलों को स्टोर करने का डाटा-सेंटर) विदेशी कंपनियों से बनवाने की बात की. क्या हम इतने कमजोर हो गये हैं कि अपना क्लाउड तक नहीं बना सकते? 

तब तो हमें राष्ट्रवाद की नयी परिभाषा गढ़ लेनी चाहिए. अपनी संप्रभुता हम आधिकारिक तौर से विदेशियों को सौंप दें.

अब भी वक्त है. एक राष्ट्रीय मिशन बना कर हर प्रमुख क्षेत्र में अपने लोग, अपने ब्रांड्स और अपनी टेक्नोलॉजी बनाने का समय है. नहीं तो, अगले 'कारगिल युद्ध' में, जो युद्धभूमि में नहीं, हमारे मोबाइलों पर लड़ा जायेगा, हम परास्त हो जायेंगे.