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कानून नहीं जानता फेक न्यूज क्या है--- पवन दुग्गल

फर्जी खबरें यानी फेक न्यूज अब हर तरफ दिखने लगी हैं। फर्जी खबर वह सूचना है, जो तथ्यात्मक रूप से गलत होती है, पर उसका प्रसार इतनी कुशलता से किया जाता है कि वह बखूबी लक्षित समूह को गलत सूचना देने और उसकी धारणा व सोच को प्रभावित करने में सफल होती है। आज हम एक ऐसा देश हैं, जहां इंटरनेट का उपयोग करने वाली दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी बसती है। मगर तेजी से बढ़ रहे डिजिटल अंधानुकरण भी हमारी सच्चाई बनती जा रही है। अब हम इलेक्ट्रॉनिक सूचनाओं के साथ अधिक से अधिक प्रयोग करते दिखने लगे हैं। ‘फेक न्यूज' प्रिंट माध्यम में भी रही है, पर इसकी पहुंच अपेक्षाकृत काफी सीमित थी। इंटरनेट के आगमन ने पूरा पासा पलट दिया। डिजिटल क्रांति से न सिर्फ भौगोलिक इतिहास बदल गया, बल्कि इसने हर यूजर को वैश्विक लेखक, वैश्विक प्रसारक और वैश्विक प्रेषक बना दिया है। रही-सही कसर सोशल मीडिया ने पूरी कर दी। यह लोगों को अपने विचारों को तुरंत प्रकाशित और प्रसारित करने की आजादी देता है। इससे अवसर के नए दरवाजे तो खुले, पर गलत प्रवृत्ति भी बढ़ी। अब लोग न सिर्फ हर तरह की सामग्री सोशल साइट्स पर परोसने लगे हैं, बल्कि अपनी पोस्ट को लेकर वे लापरवाह भी दिखते हैं। वे सूचनाओं की प्रामाणिकता, सच्चाई व विश्वसनीयता को जांचे बिना दूसरे लोगों के साथ उसे साझा करने, फॉरवर्ड करने और फिर से पोस्ट करने में लगे हैं। इस प्रवृत्ति ने फर्जी खबरों में अच्छी-खासी तेजी ला दी है।


ऐसा नहीं है कि सर्विस देने वाली कंपनियां या विभिन्न संस्थाएं फर्जी खबरों से निपटने के लिए अपने तईं प्रयास नहीं कर रहीं। कुछ ने तो फर्जी खबरों के खिलाफ अभियान भी चलाया है। मगर ऐसे प्रयासों का अब तक सार्थक नतीजा नहीं निकल सका है। भारत में फर्जी खबरों से निपटना अब तक इसलिए संभव नहीं हो सका है, क्योंकि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 में ऐसी किसी स्थिति का जिक्र ही नहीं है। यह वही अधिनियम है, जिसे भारत में इलेक्ट्रॉनिक माध्यम के डाटा और सूचनाओं से निपटने का ‘मूल कानून' माना जाता है। यह एक खास तरह का कानून है और इसके प्रावधान मौजूदा समय में लागू इस विषय से संबंधित अन्य कानूनों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं। साल 2000 में यह अधिनियम पारित हुआ था और अब तक सिर्फ एक बार 2008 में इसमें संशोधन किया गया है, पर ‘फेक न्यूज' से निपटने का कोई प्रत्यक्ष प्रावधान इसमें दर्ज नहीं किया जा सका। हां, ऐसी खबरों से निपटने का एक उपाय जरूर है। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 पारित करके भारतीय दंड संहिता 1860 में भी रद्दोबदल किया गया था और उसमें धारा 468 और 469 के तहत इलेक्ट्रॉनिक सूचनाओं की जालसाजी जैसे नए अपराध शामिल किए गए थे। लिहाजा फेक न्यूज को भारतीय दंड संहिता 1860 के तहत अपराध के दायरे में लाया जा सकता है, क्योंकि जब कोई फर्जी खबर गढ़ता है, तो वह एक
फर्जी इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेज भी है, और वह दस्तावेज एक ऐसा फर्जी ‘कंटेट' होता है, जिसे आमतौर पर सच या प्रामाणिक सूचना के तौर पर पेश किया जाता है।


सवाल यह है कि फर्जी खबरों के प्रसार का दोषी किसे माना जाए? क्या उस शख्स को, जिसने उसे गढ़ा या उस व्यक्ति को, जिसने उसे प्रसारित किया? क्या जिम्मेदारी सेवा देने वाली कंपनी की मानी जाएगी या सोशल मीडिया का मंच भी जवाबदेह होगा? कानून इन सवालों को लेकर मौन है। मगर मेरा मानना है कि फर्जी खबरों के प्रचार-प्रसार की जवाबदेही समान रूप से सभी पर होनी चाहिए। आज जरूरी यह है कि फर्जी खबरों को जो कोई भी गढ़ता हो, उस पर सख्त कार्रवाई की जाए। इसके अलावा, उन लोगों को भी पकड़ने की जरूरत है, जो ऐसी खबरें फैलाते हैं, साझा करते हैं या अपने सोशल मंच पर पोस्ट करते हैं। तर्क ये दिए जाते रहे हैं कि फर्जी खबरों को प्रसारित करने वालों पर ऐसी खबरें गढ़ने वालों की तुलना में कम आपराधिक जवाबदेही तय की जानी चाहिए। मगर यह तर्क गले नहीं उतरता। क्या फर्जी खबरों को प्रसारित करने वालों को तथ्यों की प्रामाणिकता जांचने के बाद ही ऐसी खबरें पोस्ट नहीं करनी चाहिए? इसी तरह, सेवा देने वाली कंपनियों को भी अपने दायित्वों के निर्वहन में संजीदगी दिखानी होगी। सरकार ने इस दिशा में कुछ मापदंड जरूर बनाए हैं। मगर ये मापदंड 2011 में बनाए गए थे, जो बदलते वक्त के साथ अप्रासंगिक हो गए हैं। इसके अलावा, मुश्किल यह भी है कि फर्जी खबरों के जुड़े प्रावधान सीधे तौर पर ऐसे किसी मापदंड में शामिल नहीं किए गए हैं।
अगर भारत फर्जी खबरों के खिलाफ जंग जीतना चाहता है, तो उसे अपने नजरिये में बदलाव लाना होगा। फर्जी खबरों में यह ताकत होती है कि वे लोगों के सम्मान, नजरिये और प्रतिष्ठा को मटियामेट कर दे। इतना ही नहीं, इसका इस्तेमाल साइबर मानहानि के एक औजार के रूप में होता है और ऐसी खबरें प्रसारित करके संबंधित व्यक्ति को खूब प्रताड़ित किया जाता है। साफ है, इसे रोकने के लिए हमारे नीति-नियंताओं को खासा सक्रिय होना होगा। भारतीय साइबर कानून को न सिर्फ संशोधित करना होगा, बल्कि उसमें ऐसे प्रावधान भी जोड़ने होंगे, जो फर्जी खबरों के प्रसार पर बंदिश लगा सके। जिम्मेदारी सेवा देने वाली कंपनियों की भी होनी चाहिए कि वे अपने मंच को दुष्प्रचार का माध्यम नहीं बनने दें। वक्त का तकाजा यही है कि फर्जी खबरें गढ़ने वालों को यह सख्त संदेश दिया जाए कि यदि वे ऐसी कोई हरकत करते हैं, तो इसके गंभीर नतीजे भुगतने के लिए भी तैयार रहें। ‘फेक न्यूज' एक गंभीर चुनौती है और इसे रोकने के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो हालात बदतर हो सकते हैं। अब यह सरकार के ऊपर है कि वह इस समस्या से निपटने के लिए किस तरह की कानूनी रणनीति बनाती है और उन्हें कैसे अमल में लाती है?
(ये लेखक के अपने विचार हैं)