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कानून से ही नहीं रुकेगी क्रूर कायरता-- विभूति नारायण राय

राम मनोहर लोहिया ने भारतीय भीड़ के व्यवहार के लिए एक बड़े मौजूं शब्द का इस्तेमाल किया है- क्रूर कायरता। औसत भारतीय जब भीड़ का अंग होता है, तो उसका व्यवहार एक खास तरह की क्रूरता से भरपूर होता है, जो कई मौकों पर तो बर्बरता की हदें पार कर जाती है। भीड़ किसी जेबकतरे को बस से उतारकर पीट-पीट कर मार डालती है। कभी कोई नकबजन हत्थे चढ़ जाए, तो उसका भी यही हश्र हो सकता है, पर मोहल्ले के गुंडे के आगे एक आम नागरिक की घिग्घी बंध जाएगी। पिछले कुछ दिनों में देश के विभिन्न हिस्सों से भीड़ की हिंसा के जैसे किस्से सामने आए, उनसे एक ऐसी ही क्रूर कायरता की छवि उभरती है, जिसमें निहत्थे व्यक्ति या व्यक्तियों पर बच्चा उठाने, डायन होने या गो हत्या जैसे आरोप लगाकर भीड़ द्वारा मार दिया गया।

भीड़ द्वारा दंड कोई नई भारतीय परंपरा नहीं है। मौखिक और लिखित साक्ष्य ऐसी घटनाओं से भरे हुए हैं। अंतर सिर्फ इतना हुआ है कि एक पुराने रिवाज को नए औजार मिल गए हैं। अब यह दंड अधिक त्वरित और खौफनाक हो गया है। वाट्सएप जैसी सुविधाएं भीड़ की हिंसा के लिए अफवाहों को फैलाने में मदद करती हैं। कर्नाटक के बीदर में चार नौजवानों ने बच्चों को दोस्ताना अंदाज में चॉकलेट देने की कोशिश की, तो अफवाह फैल गई कि वे बच्चे उठाने वाले गिरोह के सदस्य हैं। जब उन्होंने खतरा भांपकर निकल भागने की कोशिश की, तो उनकी कार की तस्वीरें वाट्सएप पर भेज दी गईं। अगले ही गांव में वे एक भीड़ के हत्थे चढ़ गए। नतीजतन, उनमें से एक मारा गया और तीन बुरी तरह घायल हुए। विडंबना यह है कि मृतक खुद सूचनाओं के तेज प्रसारक गूगल के लिए काम करता था। ऐसी ही विडंबना त्रिपुरा में हुई, जब एक ऐसा व्यक्ति भीड़ के हाथों मारा गया, जिसे सरकार ने ही अफवाहों पर विश्वास न करने का संदेश लोगों तक पहुंचाने का काम सौंप रखा था। आरोप है कि वहां अफवाह फैलाने का काम एक मंत्री ही कर रहा था। मंत्री के भाषण से भीड़ का विश्वास पुख्ता हो गया कि कुछ लोग किडनी निकालने के लिए बच्चों का अपहरण और हत्या कर रहे हैं। जिस बच्चे की हत्या से मामला शुरू हुआ, उसके पोस्टमार्टम से पता चला कि उसके शरीर से कोई अंग गायब नहीं हुआ था। उत्तर प्रदेश और राजस्थान में मवेशी व्यापारियों के बारे में अफवाहें फैलाकर उन्हें भीड़ के त्वरित न्याय का शिकार बनाने की खबरें तो अक्सर पढ़ने को मिल जाती हैं।

भीड़ आमतौर से हाशिये के लोगों को तुरत-फुरत न्याय देने में माहिर होती है। झारखंड के सुदूर गांव में डायन करार दी गई कोई निराश्रित बूढ़ी महिला, मुंबई के प्लेटफार्म पर मुसाफिरों की गिरफ्त में आ गया जेबकतरा, किसी गांव में चोरी करते पकड़ा गया चोर या गोकशी के आरोप में धरा गया छोटा-मोटा कारोबारी। ज्यादातर मामलों में आप असहाय गरीब-गुरबा को ही इस न्याय का शिकार होते पाएंगे। बहुत सारे मामलों में सेक्स वर्कर और किन्नर मारे गए हैं। गौर से देखें, तो अक्सर भीड़ की हिंसा के पीछे यौनिकता, संपत्ति या राजनीतिक नफे-नुकसान के मसले गुथे होते हैं। त्वरित न्याय पाए लोगों के लिंग, वर्ग या वर्ण का समाजशास्त्रीय अध्ययन हमें भारतीय समाज में दबी-ढकी हिंसा को परत-दर-परत उघाड़कर उसकी बेहतर समझ बनाने में मदद करेगा। वर्ण-व्यवस्था जैसी मनुष्य विरोधी संस्था में विश्वास करने वाला समाज निचले पायदान पर खड़े लोगों के प्रति बेहद क्रूर हो सकता है और यह क्रूरता मनसा-वाचा-कर्मणा, हर तरफ झलकती है। इसकी तुलना पश्चिमी समाजों में व्याप्त रंगभेद से की जा सकती है। रंगभेद से तो पश्चिम को काफी हद तक मुक्ति मिल गई, पर वर्ण तो अभी भी हमारे बीच मौजूद है, इसलिए उससे जुड़ी हिंसा आज भी हमारे क्रिया-कलापों का अंग है।

पिछले दिनों भीड़-हत्या के पारंपरिक कारणों में गोवंश का व्यापार सबसे बड़ा मसला बन गया है। इन घटनाओं में वृद्धि अकारण नहीं हुई है। भीड़ में शामिल लोगों को विश्वास दिला दिया गया है कि वे कोई बड़ा पवित्र काम कर रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बयान कि गो-रक्षक आपराधिक गतिविधियों में लिप्त लोग हैं, यह संदेश नीचे सूबाई स्तर तक कितना पहुंचा है, यह बहस का विषय हो सकता है। सड़कों पर कभी भी किसी को गोकशी के आरोप में मारा जा सकता है। यह भीड़ के न्याय का क्रूरतम नमूना है।

हाल में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से भीड़-हत्या को लेकर नया कानून बनाने को कहा है। कहा नहीं जा सकता कि इससे क्या फर्क पडे़गा? यहां वैसे ही बहुत कानून हैं। जरूरत किसी नए कानून से ज्यादा उन्हें लागू करने की इच्छा शक्ति की है। भारतीय दंड संहिता में ऐसे प्रावधान हैं, जिनसे भीड़-हत्या के किसी मामले में समूह के हर सदस्य की बराबर की जिम्मेदारी निर्धारित की जा सकती है और सबको दंडित किया जा सकता है। सड़क पर पगलाई भीड़ बेखौफ कानून अपने हाथ में ले रही है, तो इसमें कहीं न कहीं राज्य की भूमिका भी निर्धारित की जानी चाहिए। भारत में पीड़ित के मुआवजे का कोई व्यापक कानून नहीं है और अक्सर राजनेता या अदालतें अपने विवेक से क्षतिपूर्ति करती हैं।

यह भी हर मामले में हो, ऐसा जरूरी नहीं है। भीड़-हत्या में राज्य को अनिवार्य रूप से जान-माल की क्षतिपूर्ति करनी ही चाहिए। यदि नए कानून में मुआवाजे की कोई बाध्यकारी व्यवस्था हो, तभी कोई फर्क पड़ेगा। इस नए कानून में एक खतरा यह भी है कि राज्य सूचनाओं के प्रसारण को नियंत्रित करने का प्रयास कर सकता है। मसलन, इंटरनेट सेवाओं, मोबाइल फोन या वाट्सएप पर निगरानी रखने या उन्हें पूरी तरह बंद करने के प्रयास हो सकते हैं। अगर इच्छा शक्ति के अभाव में नया कानून भी प्रभावी ढंग से लागू नहीं हुआ, तो क्या उसका भी वही हश्र नहीं होगा, जो मौजूदा कानूनों का हो रहा है? भीड़-हिंसा के मामलों में नए कानून से ज्यादा सांस्कृतिक परिवर्तनों की जरूरत है और यह एक लंबी लड़ाई से ही संभव होगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)