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किशोर दुनिया के तकाजे-- कुलीना कुमारी

कहा जाता है कि व्यक्ति का भविष्य बचपन और उस दौरान आत्मसात किए गए मूल्यों पर आधारित होता है। 2011 की जनगणना के अनुसार, देश में करीब 41 फीसद आबादी 20 साल से कम उम्र की है। रूसो ने बच्चों को तीन अवस्थाओं में वर्गीकृत किया था- पांच वर्ष की आयु तक चलने वाली शैशवावस्था, पांच से बारह वर्ष तक बाल्यावस्था और बारह से बीस वर्ष तक किशोरावस्था। हालांकि वयस्क होने की उम्र हर देश की अपनी-अपनी प्रकृति-संस्कृति के अनुसार थोड़ी भिन्न हो सकती है। हमारे देश में बालिग होने की उम्र लड़की के लिए अठारह साल और लड़के के लिए इक्कीस साल तय की गई है। सभी जानते हैं कि किशोरावस्था हर किसी के लिए विभिन्न परिवर्तन लेकर आती है। खासतौर पर इस उम्र में लड़कियों में होने वाले बदलाव का महत्त्व और बढ़ जाता है। इस दौर में उनमें होने वाले तमाम परिवर्तनों की जानकारी घर में बड़े और खासतौर पर मां को देनी चाहिए। दूसरे से मिली गलत या अधूरी जानकारी किशोरी के लिए नुकसानदेह हो सकती है। इस दौरान जबर्दस्त मानसिक और भावनात्मक बदलाव भी होता है। लड़की चाहती है कि अब उसे बच्चा न समझा जाए, बल्कि बराबरी और सम्मानजनक ढंग से उसके साथ पेश आया जाए। इस समय वह जिद््दी दिखने लगती है, नए-नए सपने उसके अंदर सजने लगते हैं। बहुत-सी नई चीजें वह अपने अंदर महसूस करने लगती है। दूसरे को दिखाने और सजने-संवरने की चाह भी बढ़ती है और बड़ों की तरह वह भी अपने हिसाब से निर्णय लेने की इच्छा रखने लगती है। किसी बात पर पलटकर जवाब देना इसी अवस्था का परिणाम समझा जा सकता है। इस उम्र में होने वाला एक बड़ा परिवर्तन यह होता है कि मन के भीतर विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण पनपने लगता है। संपर्क होने पर वे एक-दूसरे को स्वाभाविक रूप से जानने-समझने की कोशिश करते हैं।


इस उम्र में बच्चों की दुनिया बढ़ रही होती है, स्कूल आने-जाने के साथ नए-नए सहपाठी और शिक्षकों से भी बच्चे प्रभावित होते हैं। ऐसे में मां-पिता की भूमिका बढ़ जाती है। इस संदर्भ में कुछ समय पहले दिल्ली से सटे गुरुग्राम में रेयान स्कूल में एक बच्चे की हुई हत्या को याद किया जा सकता है। वह घटना अभिभावकों को सचेत करती है कि वे अपने बच्चे के प्रति अधिक से अधिक गंभीर रहें, बाहर की किसी भी आपत्तिजनक चीज पर बच्चों के साथ बातचीत की जाए। मगर यह तब हो सकता है, जब अभिभावक बच्चों पर विश्वास करें और उसकी गलतियों को भी माफ करने के लिए तैयार रहें।ऐसे में सुरक्षा का सवाल महत्त्वपूर्ण हो जाता है। राष्ट्रीय अपराध रेकार्ड ब्यूरो के मुताबिक बलात्कार के साठ प्रतिशत मामलों में पीड़ित बच्चियां होती हैं। ऐसा शायद इसीलिए भी होता होगा कि माताएं और घर के बड़े-बुजुर्ग अपनी बच्चियों को इस तरह शिक्षित नहीं कर पाते हैं कि वे उन खतरों को समय रहते पहचान जाएं और उनसे अपना बचाव कर पाएं। इसलिए अभिभावकों के सामने यह एक बड़ी चुनौती है कि किशोरावस्था में बेटियों का किस तरह का शिक्षण-प्रशिक्षण हो कि वे सुरक्षित रह पाएं, समय से पहले मुरझाएं नहीं, दोस्ती और दूसरे संबंध का फर्क उन्हें पता हो, ताकि वे जीवन में निडर होकर अपने रास्ते पर आगे बढ़ पाएं। दरअसल, यह अवधि माता-पिता के लिए बड़ी परीक्षा की होती है, जब वे बच्चे की मानसिक अवस्था को समझते हुए, तार्किकता के साथ, उचित तरीके से उसे मार्गदर्शन कर सकें। बड़े-बुजुर्गों ने शायद इन्हीं बातों को ध्यान में रख कर कहा होगा कि जब बच्चा कंधे के बराबर हो जाए तो उसके साथ संतान नहीं, बल्कि मित्र की तरह पेश आना चाहिए।


आजकल बच्चों की दुनिया फैलने के मद््देनजर इनके लिए भी एक बड़ा बाजार तंत्र खड़ा हो गया है। बड़ी-बड़ी कंपनियां बच्चों के लिए विभिन्न तरह की ललचाने वाली चीजें, वीडियो या फिर इंटरनेट गेम बनाने में लगी हैं। इस उम्र में बिना सोचे-समझे कुछ भी करने की चाह बच्चों में अधिक रहती है, और इसी का फायदा बाजार उठाता है। ब्लू ह्वेल और अन्य विभिन्न तरह के हिंसक गेम बच्चों को अपने आप में सिमटने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। दूसरी ओर, कई वजहों से कामकाजी माता-पिता अपने काम में व्यस्त रहते हैं और बच्चों को पर्याप्त समय नहीं दे पाते हैं। ऐसे में बच्चे अपना सहारा मोबाइल या कंप्यूटर में खोजते हैं और जोखिम भरे खेलों के जाल में फंस जाते हैं।इसलिए अभिभावकों के सामने यह बड़ी चुनौती है कि बच्चों के पास जरूरत के मुताबिक मोबाइल जैसे इलेक्ट्रॉनिक सामान रहें, लेकिन वे उनका आवश्यकता से अधिक उपयोग न करें। कुछ शोधों में ये तथ्य सामने आए हैं कि समय की बर्बादी के अलावा मोबाइल या कंप्यूटर के अधिक इस्तेमाल से बच्चों में चिड़चिड़ापन और कई तरह के तनाव में वृद्धि होती है। जाहिर है, बुद्धिमान वही जो बीमारी से दूर रहे, ताकि दवा की जरूरत न पड़े। बच्चों के एकाकी जीवन के विकल्प के तौर पर अभिभावकों को दूसरे बच्चों के साथ अपने बच्चे को खेलने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए, ताकि वे शरीर से सशक्त हों और उनके भीतर सामाजिकता का विकास भी हो।


यों स्मार्टफोन और कंप्यूटर का यह पहलू भी गौरतलब है कि जहां इंटरनेट गेम नुकसानदेह हैं, वहीं कई तरह की ज्ञानपरक वेबसाइटें भी मौजूद हैं। चूंकि इस उम्र में दसवीं-बारहवीं बोर्ड सहित प्रतियोगिता परीक्षा में बढ़िया करने का बड़ा लक्ष्य शामिल रहता है, तो ऐसे में अध्ययन सामग्री से जुड़ी वेबसाइटें बच्चों के लिए उपयोगी हो सकती हैं। माता-पिता और शिक्षक बच्चों को इस दिशा में सक्रिय कर सकते हैं। हालांकि आजकल अध्ययन भी पैसे के तराजू पर तौला जाने लगा है। महंगे कोचिंग संस्थान, विभिन्न प्रकाशकों की किताबें, कॉपियां, और भी कितना कुछ। चाहे अभिभावक की कैसी भी स्थिति क्यों न हो, अपने बच्चों को पढ़ाई के लिए उपयुक्त माहौल प्रदान करना और अध्ययन से जुड़ी तमाम सहूलियतें जुटाना जरूरी हैं, ताकि बच्चे अपनी किताबों को अच्छे से समझ सकें और सकारात्मक परीक्षा परिणाम पाएं। यह याद रखना चाहिए कि हर साल कई बच्चे असफलता से उपजे तनाव के चलते जान दे देते हैं। इस स्थिति से बचने के लिए बच्चों के साथ हर बात पर सहज चर्चा की जाए और उनके भीतर तनाव पैदा होने न दिया जाए।
इसके अलावा, देश के दूरदराज के इलाकों में आज भी लड़कियों की शिक्षा-दीक्षा और उनके व्यक्तित्व-विकास पर बहुत ध्यान नहीं दिया जाता है। फलस्वरूप लड़कियां केवल उन्हीं इलाकों में सबल बन पा रही हैं जहां माता-पिता बेटियों पर विश्वास करते हैं और उनके कॅरियर को भी प्रमुखता देते हैं। बेटी को पराई समझ कर किसी तरह शादी करके अपने घर से बेदखल करना जिनका उद्देश्य नहीं होता। लेकिन हर जगह ऐसी मानसिकता वाले अभिभावक नहीं हैं। एक अध्ययन के मुताबिक पचास प्रतिशत लड़कियां पंद्रह साल की होते-होते सामाजिक कारणों के चलते स्कूल से बाहर हो जाती हैं।किशोरावस्था में बच्चों में बहुत ऊर्जा होती है। ऐसे में उनको सही दिशा मिले तो वे बहुत कुछ कर सकते हैं। अच्छी योग्यता अर्जित कर सकते हैं और अपनी पसंद के क्षेत्र में सफलता हासिल कर अपने घर-परिवार का नाम रोशन कर सकते हैं। इन तमाम बातों को ध्यान रखते हुए अभिभावकों को अब अपना नजरिया बदलने की जरूरत है।