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किसान आंदोलन का ट्रेलर --- योगेन्द्र यादव

पिछले दिनों जंतर-मंतर पर किसान की पीड़ा की परेड चल रही थी. साथ ही किसान आंदोलन के नये रूप और नये संकल्प की बानगी भी मिल रही थी. दुख, आक्रोश और नैराश्य के सागर में डूबता-उबरता मैं एक छोटी सी आशा ढूंढ रहा था. वहां पर उसकी झलक दिख गयी. किसान की दशा का नाटकीय चित्रण करने में तमिलनाडु के किसान नेता अय्याकन्नू का कोई जवाब नहीं. राज्य में पिछले एक सौ चालीस बरस का सबसे भयानक सूखा पड़ा.

सरकार को जगाने के लिए तीन महीना पहले अय्याकन्नू किसानों की एक छोटी सी टुकड़ी लेकर दिल्ली आये थे, अपने साथ मृतक किसानों की खोपड़ी और हड्डियां लेकर. उन्होंने खोपड़ियां दिखाई, नंगे बदन लेटे, आधा सिर मुंड़वाया और ना जाने क्या-क्या किया. मुख्यमंत्री ने आखिर उन्हें आश्वासन तो दिया, लेकिन तमिलनाडु जाकर फिर मुकर गये. इसलिए अय्याकन्नू फिर जंतर-मंतर पहुंच गये. प्रधानमंत्री के घर पर हंगामा कर चुके हैं. और बहुत कुछ की तैयारी. उन्हें देखते हुए मैं सोच रहा था कि क्या सत्ताधीश इसी तरह से किसान की बात को सुनेंगे? इस बीच खबर आयी कि किसानों की दुख-तकलीफ को ध्यान देने की बजाय तमिलनाडु के विधायकों ने अपने वेतन भत्ते दोगुने कर लिये. धन्य है यह देश!

वहीं हमारे बीच उत्तर प्रदेश से आलू के किसान आये हुए थे. इस बार रिकॉर्ड उत्पादन हुआ, लेकिन दाम एकदम गिर गये. बेहतर दाम की आशा में किसान ने आलू कोल्डस्टोर में डाला. अब दाम इतने गिर गये हैं कि कोल्डस्टोर को देने के पैसे भी नहीं मिले. आगरा, इटावा, मैनपुरी, फिरोजाबाद जैसे जिलों से आत्महत्या के समाचार आये. किसान आलू के बोरे सड़क पर फेंक रहे हैं. यूपी सरकार ने आलू खरीद की योजना बनायी, लेकिन एक प्रतिशत आलू भी नहीं खरीदी. अब पानी किसान की नाक से ऊपर जा रहा है. जो कहानी उत्तर प्रदेश के आलू किसान की है, वही कहानी तेलंगाना के मिर्ची किसान और देशभर के प्याज किसान की भी है.

जंतर-मंतर की असली झांकी महाराष्ट्र से आये बच्चों ने दिखाई. नासिक जिले के आधारतीर्थ आश्रम में रहनेवाले इन बच्चों से मेरी मुलाकात किसान मुक्ति यात्रा के दौरान हुई थी. इस आश्रम में सिर्फ वो बच्चे रहते हैं, जिनके किसान बाप या मां-बाप दोनों ने आत्महत्या कर ली. इन बच्चों की नाट्य प्रस्तुति किसान की पीड़ा को बयान कर रही थी. उनकी सादी प्रस्तुति में गीत ' जहर खाओ नक्का' मेरे भीतर सिहरन पैदा कर रहे थे. दरअसल उन्हें कुछ बोलने की जरूरत ही नहीं थी. उनका होना अपने आप में हमारी व्यवस्था में किसान की स्थिति को बयान करता था. डबडबाई आंखों से मैं किसान और देश का भविष्य देख रहा था.

खचाखच भरे मंच पर नयी-पुरानी दो पीढ़ियों का संगम दिख रहा था. ऐसे किसान नेता थे, जो महेंद्र सिंह टिकैत, शरद जोशी या ननजुंदास्वामी के साथ काम के चुके थे. साथ ही तमाम नयी पीढ़ी और नयी राजनीति के प्रतिनिधि भी दिखायी दिये. पुराने भूस्वामी किसान नेताओं के साथ खेत-मजदूर और आदिवासियों के नेता भी मौजूद थे. मंच पे महिलाएं कम थीं, लेकिन पुराने किसान आंदोलनों की तरह महिलाएं नदारद नहीं थीं. मंच से किसान-मजदूर एकता के नारे लग रहे थे.

दलित-आदिवासी के मुद्दों की बात हो रही थी. बैंकों के कर्जे के साथ साहूकार के कर्ज से मुक्ति की बात भी चल रही थी. फसल के पूरे दाम की मांग सिर्फ स्वामीनाथन कमीशन के मुहावरे तक सीमित नहीं थी. यहां विस्तार और बारीकी से समझाया जा रहा था कि सरकार कैसे लागत का ड्योढ़ा दाम सुनिश्चित कर सकती है. जहां खरीद ना हो सके, वहां कमी की भरपाई की व्यवस्था भी समझायी जा रही थी. मुझे लगा किसान आंदोलन अब सरकारी भाषा समझने लगा है, नारेबाजी से आगे बढ़ कर अब नीति परिवर्तन की ओर बढ़ने लगा है. मुझमें कुछ संतोष फैल रहा था.

मंच के सामने बैठे किसानों में भी एक बदलाव दिख रहा था. बड़ी संख्या में पंजाब के जट्ट किसान तो थे ही, लेकिन उनके साथ-साथ मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात के आदिवासी भी आये थे. वे अपने साथ लाये थे भूअधिकार, भूमिअधिग्रहण और वन उपज के मुद्दे. हरी टोपी और हरे झंडों के साथ लाल झंडे भी उठ रहे थे. मुझे सबसे ज्यादा सुकून इस किसान संसद में महिलाओं की उपस्थिति से मिला. खेती-किसानी में मेहनत का लगभग 70 प्रतिशत काम औरतें करती हैं. लेकिन किसान आंदोलन में महिलाएं कभी-कभार ही दिखती हैं. वहां उस किसान संसद में राजस्थान, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात से आयी महिला किसान बैठी थीं. नारों की गूंज में तनी हुई मुट्ठियों के बीच चूड़ियां भी चमक रही थीं.

हमारी किस्मत अच्छी थी कि उस दिन दिल्ली में बारिश नहीं हुई. लेकिन, भयंकर उमस थी. हर किसी का बदन भीगा था, लेकिन गला सूखा था. लेकिन, माहौल में कुछ ऐसा उत्साह था कि आत्मा तर हो गयी. मैंने लाउडस्पीकर से अपनी ही आवाज सुनी- 'ये तो अभी ट्रेलर है, पूरी फिल्म दिखाने हम दोबारा दिल्ली आयेंगे.'