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किसानों के लिए आनेवाले दिन बहुत भारी- देविंदर शर्मा

भारतीय मॉनसून के लिए अल नीनो, एक विलेन की तरह माना जाता है. अल नीनो की मार से ऑस्ट्रेलिया और भारत सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं. अल नीनो से सामान्य मॉनसून की हालत बिगड़ने का अंदेशा है, जिससे बारिश कम होने की आशंका जतायी जा रही है. देश के मौसम विभाग ने इस वर्ष अल नीनो के आने की 70 फीसदी तक उम्मीद जतायी है.

दरअसल, मॉनसून के सबसे बीचवाले समय यानी अगस्त में खरीफ की फसलें पकने के कगार पर होती हैं. ऐसे में यदि अल नीनो खरीफ फसलों को नुकसान पहुंचाता है, तो पैदावार पर इसका असर पड़ सकता है. दूसरी ओर, इसकी सबसे ज्यादा मार किसानों पर पड़ेगी. खेती हमारे देश की इकॉनोमी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, इसलिए यदि खेती-किसानी प्रभावित होगी, तो अर्थव्यवस्था पर भी इसका असर पड़ना तय है.

आज हमारे पास 62 मिलियन टन अनाज का स्टॉक मौजूद है. खाद्य सुरक्षा विधेयक के तहत सभी जरूरतमंदों को इसे मुहैया कराने के लिए इतना अनाज तो पर्याप्त है. अनाज खाद्य सुरक्षा के तहत आनेवाले परिवारों को पांच किलो के हिसाब से बांटने के लिए इतना अनाज पर्याप्त है, लेकिन सवाल खड़ा होता है कि शेष जनता के लिए अनाज कहां से आयेंगे? प्रकृति का कोप हो या और किसी तरह की आपदा, देश में कृषि व्यवस्था के प्रभावित होने का अर्थ है अनाज की पैदावार में निश्चित तौर पर कमी होना. यदि अनाज कम उपजेगा, तो  अन्य उपभोक्ता वस्तुओं के निर्माण पर भी इसका असर पड़ेगा. उद्योग-धंधे प्रभावित होंगे. यानी महंगाई बढ़ जायेगी.

महंगाई की चपेट में आनेवाला देश का एक बड़ा तबका, जिसे मध्यवर्ग कहा जाता है, उसके लिए आत्महत्या की नौबत तक आ जाती है. दूसरी ओर, देश के किसानों का एक बड़ा तबका आत्महत्या के लिए मजबूर हो रहा है. बीते फरवरी-मार्च में महाराष्ट्र के एक बड़े इलाके में किसानों ने ओले की मार झेली थी, जिसके चलते फसलों का व्यापक नुकसान हुआ था. किसानों को अब अल नीनो की दोहरी मार झेलनी पड़ सकती है. किसान परेशान और हम महंगाई और मुद्रास्फीति का रोना रोते हुए हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते हैं. देश में तकरीबन 60 करोड़ लोग कृषि पर निर्भर हैं. ऐसे में यदि कृषि प्रभावित होगी, तो हमारी अर्थव्यवस्था की क्या स्थित होगी? लेकिन हम खेती-किसानी के बारे में गंभीरता से सोचने के बजाय, सिर्फ औद्योगिक विकास के बारे में ही सोचते हैं. जब तक हम खेती-किसानी के बारे में नहीं सोचेंगे, हमारी अर्थव्यवस्था भी मजबूत नहीं हो पायेगी.                                                            (बातचीत: वसीम अकरम)

किसानी पर मॉनसून का कहर

अविनाश कुमार चंचल

सामाजिक कार्यकर्ता

जिस साल पूर्वी प्रशांत महासागर में पानी का तापमान सामान्य से ऊपर रहता है, उस साल अल नीनो का प्रभाव रहता है. यह जून से अगस्त के बीच रहता है. अल नीनो के कारण दुनिया में वर्षा, हवाओं, तूफान आदि के रुख में परिवर्तन देखा जाता है.

यह एक सामान्य मान्यता है कि भारत एक कृषि प्रधान देश है. कुल घरेलू उत्पादन में कृषि की हिस्सेदारी को कम करने के लक्ष्य के बावजूद अभी भी देश की 60 फीसदी आबादी इसी क्षेत्र पर निर्भर है. कहा जाता है कि भारत में खेती मॉनसून के साथ जुआ है. जून बीत रहा है. यह समय भारत के कई इलाकों में मॉनसून के आने का है, लेकिन भारतीय मौसम विभाग की मानें, तो अब तक केवल 20 फीसदी हिस्से में ही सामान्य बारिश हुई है. ऐसे में देश में महंगाई, खाद्य संकट और कमजोर अर्थव्यवस्था की आंशकाएं बढ़ गयी हैं.

आकड़ों में मॉनसून की कमी

मौसम विभाग मॉनसून को लेकर नये-नये आकलन कर रहा है. मॉनसून भी इन आकलनों को झूठा साबित करते हुए कहीं सामान्य से कम, तो कहीं देरी से पहुंच रहा है. एक से 22 जून तक अधिकांश इलाकों में सामान्य से 36 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गयी है. एक से 17 जून के भीतर अकेले झारखंड में 86 फीसदी कम (77.6 मिमी के बजाय केवल 11.1 मिमी), पूर्वी उत्तर प्रदेश में 80 फीसदी कम (36.2 मिमी के बजाय केवल 7.3 मिमी), पंजाब में 81 फीसदी कम (15.5 मिमी के बजाय केवल 2.9 मिमी), गुजरात में 80 फीसदी कम (43.1 के बजाय केवल 8.7 मिमी) बारिश हुई. हालांकि, सामान्य तौर पर जून तक मॉनसून गुजरात, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, ओड़िशा समेत पूरे महाराष्ट्र में पहुंच जाता है, लेकिन इस साल इनमें से अधिकतर राज्यों में मॉनसून नहीं पहुंच पाया है.

अलनीनो का भयावह प्रकोप

वर्ष 2014 को अल नीनो के प्रकोपवाला साल माना जा रहा है. मॉनसून में कमी की सबसे बड़ी वजह इसे ही ठहराया जा रहा है. अमेरिका की नेशनल ओशेनिक एंड एटमोस्फेरिक एडमिनेस्ट्रेशन ने वर्ष की शुरुआत में ही यह आशंका जाहिर की थी. इसके अनुसार, जून-जुलाई तक उत्तरी गोलार्ध में अल नीनो की अवस्था बन सकती है. यदि यह साल अल नीनो के प्रभाववाला होगा, तो यह पूरे एशिया के लिए चिंता का विषय है. जिस साल पूर्वी प्रशांत महासागर में पानी का तापमान सामान्य से ऊपर रहता है, उस साल अल नीनो का प्रभाव रहता है. यह अधिकांशत: जून से अगस्त माह के बीच रहता है. अल नीनो के कारण पूरी दुनिया में वर्षा, हवाओं, तूफान आदि के रुख में परिवर्तन देखा जाता है. उदाहरण के लिए, इससे जहां पेरू और अमेरिका आदि  देशों में अतिवर्षा की आशंका होती है, वहीं भारत और ऑस्ट्रेलिया आदि देशों में सूखे की आशंका बढ़ जाती है. अल नीनो के प्रभाव के चलते समूचे दक्षिण-पूर्वी एशिया में मॉनसून सामान्य से कम रहता है.

खाद्यान्न किल्लत की गहराती आशंका

संयुक्त राष्ट्र की एक ताजा रिपोर्ट ने मॉनसून में कमी को पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन से जोड़ कर देखने की कोशिश की है. यूएन के जलवायु परिवर्तन के लिए बने अंतर सरकारी पैनल (आइपीसीसी) ने जलवायु परिवर्तन पर रिपोर्ट जारी की है. आइपीसीसी द्वारा जारी दूसरी रिपोर्ट में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन से भविष्य में खाद्य सुरक्षा को लेकर संकट की स्थिति उत्पन्न न्हो जायेगी. इससे अर्थव्यवस्था के विकास की गति मंद होगी और प्राकृतिक आपदाओं व बीमारियों में बेतहाशा वृद्धि होगी. जलवायु परिवर्तन का सबसे ज्यादा असर एशिया के विकासशील देशों पर पड़ने की आशंका व्यक्त की जा रही है.

अल नीनो से अन्य प्रकार के खतरे

अल नीनो और दूसरे कारणों से हो रहे जलवायु परिवर्तन से होनेवाले खराब मौसम से कृषि उत्पादन और खाद्य सुरक्षा ही प्रभावित नहीं होगी, बल्कि पानी की कमी और बाढ़ के पानी के फैलने से भारत समेत कई विकासशील देशों में डायरिया और मलेरिया जैसे रोगों का प्रकोप भी बढ़ेगा. जलवायु परिवर्तन की वजह से गेहूं और चावल की पैदावार में कमी दर्ज की जा रही है. इन कारणों से आनेवाले समय में सुरक्षा का संकट उत्पन्न हो सकता है. मसलन, भूमि विवाद, कीमतों में वृद्धि, खाद्य संकट आदि मुद्दे हिंसा और अपराध को बढ़ाने का काम करेंगे. विशेषज्ञों ने यह भी आशंका व्यक्त की है कि भारत सहित दूसरे विकासशील देशों को ऊर्जा, ट्रांसपोर्ट, खेती, पर्यटन जैसे मजबूत अर्थव्यवस्थावाले क्षेत्र में भारी संकट का सामना करना पड़ सकता है.

अपनानी होंगी ठोस नीतियां

साल-दर-साल मॉनसून और पर्यावरण को लेकर विकराल होती स्थिति से निबटने के लिए सरकार को ठोस नीति अपनानी होगी. हर साल पर्यावरण संरक्षण के नाम पर करोड़ों-अरबों रुपये खर्च करने की बजाय ठोस वैकल्पिक आर्थिक नीतियों पर जोर देना होगा. प्राकृतिक संसाधनों और पर्यावरण को नुकसान पहुंचानेवाली आर्थिक नीतियों को बंद करना होगा. सरकार प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित उद्योग को बढ़ावा देती रही है. देश की ज्यादातर आबादी जल-जंगल-जमीन आधारित आजीविका के साधनों से जुड़ी हुई है. जरूरत इन प्राकृतिक संसाधनों को संरक्षित करने की है, ताकि स्थानीय गरीबों को जीविका का साधन मिल सके. मौजूदा अर्थव्यवस्था में विकास के नाम पर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाया जा रहा है, उसे नष्ट किया जा रहा है.

हरित अर्थव्यवस्था पर जोर की जरूरत

पर्यावरण पर काम करनेवाली विभिन्न संस्थाएं आइपीसीसी की रिपोर्ट आने के बाद सरकारों से हरित अर्थव्यवस्था पर जोर देने की मांग कर रही हैं. साथ ही, पर्यावरण पर ज्यादा से ज्यादा स्थानीय लोगों को अधिकार देने की मांग भी की जा रही है. सरकार और समाज पर्यावरण की गंभीर चिंताओं को सिर्फ अकादमिक-सेमिनार के बहस का मुद्दा न बनायें, बल्कि जमीनी स्तर पर ठोस कदम उठाये. जल प्रबंधन को ठीक करने की जरूरत है, ताकि कम मॉनसून की स्थिति से निबटा जा सके. अगर सिंचाई, पर्यावरण संरक्षण, जल प्रबंधन व खेती की बेहतरी के लिए कोशिशें की जायें, तो मॉनसून की अनियमितता से सूखे और अकाल की स्थिति कभी न पैदा हो. नवगठित सरकार को विकास की समावेशी नीति बनानी होगी.