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किसानों को मिले दीर्घकालिक हल-- आशुतोष चतुर्वेदी

मोदी सरकार की ओर से पेश किया गया अंतरिम बजट वैसे तो समाज के हर वर्ग को साधने वाला है, लेकिन यह छोटे किसानों पर विशेष मेहरबान है. अंतरिम वित्त मंत्री पीयूष गोयल ने बजट में किसानों, मजदूरों और मध्य वर्ग को ध्यान में रखते हुए कई घोषणाओं का एलान किया.

यह मौजूदा सरकार का अंतिम बजट था. वैसे तो अंतरिम बजट में अगली सरकार चुने जाने तक के खर्च की योजना और लेखा-जोखा होता है, लेकिन इस बजट में उससे कहीं अधिक है. इस साल अप्रैल-मई में लोकसभा चुनाव होने की उम्मीद है और मई के अंत तक नयी सरकार सत्ता संभाल लेगी.

जैसी कि उम्मीद की जा रही थी, लोकसभा चुनाव का असर इस बजट में स्पष्ट देखने को मिला. प्रधानमंत्री मोदी हर अवसर का लाभ उठाने में माहिर हैं और उन्होंने इस बार भी इस मौके को यूं ही जाने नहीं दिया. मोदी सरकार ने बजट के जरिये उन सभी तबकों को साधने की कोशिश की, जो चुनाव नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं. वित्त मंत्री ने दो हेक्टेयर तक खेती करने वाले छोटे किसानों को सालाना 6000 रुपये की मदद देने की घोषणा की है.

यह रकम 2-2 हजार रुपये की तीन किस्तों में सीधे किसान के खाते में जायेगी. साथ ही पांच लाख रुपये तक सालाना आय वाले मध्य वर्ग के लोगों को कर के दायरे से बाहर कर दिया. इतना ही नहीं, उन्होंने असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए पेंशन योजना भी शुरू करने की घोषणा की है, जिसके तहत 60 साल की उम्र के बाद उन्हें हर महीने तीन हजार रुपये की पेंशन मिलेगी. किसानों के लिए बजट में कई घोषणाएं की गयी हैं. बजट में कहा गया है कि मछली पालन के लिए अलग विभाग बनाया जायेगा, मछुआरों को क्रेडिट कार्ड से कर्ज पर दो फीसद तथा प्राकृतिक आपदा में किसानों को दो फीसद ब्याज की छूट दी जायेगी और समय से कर्ज लौटाने पर तीन फीसद अतिरिक्त ब्याज माफ किया जायेगा, लेकिन किसानों को हर साल छह हजार रुपये की मदद ज्यादा चर्चा में है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि पहले किसान योजनाओं का लाभ केवल 2-3 करोड़ किसानों को मिलता था, लेकिन अब 12 करोड़ किसानों को मिलेगा. प्रधानमंत्री ने इसे किसानों को मजबूती देने वाला बजट बताया है. एक भारतीय परिवार में औसतन पांच सदस्य होते हैं. इस हिसाब से देखा जाए, तो इस योजना से लगभग 60 करोड़ लोग प्रभावित होंगे. चुनाव की दृष्टि से यह वोट देने वाली आबादी का एक बड़ा हिस्सा है.
दिलचस्प तथ्य है कि यह योजना एक दिसंबर, 2018 से लागू मानी जायेगी और इसके तहत मिलने वाले दो हजार रुपये की पहली किस्त किसानों को 31 मार्च, 2019 से पहले दे दी जायेगी. विपक्षी नेता और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इसे किसानों के साथ मजाक बताया है.

हालांकि पिछले सप्ताह ही राहुल गांधी ने सत्ता में आने पर एक न्यूनतम आय गारंटी योजना लाने का वादा किया था. मेरा मानना है कि किसानों को लोकसभा चुनावों की दृष्टि से ही सही, यदि कुछ मदद मिल जाए, तो इसमें कोई बुराई नहीं है. अमेरिका से लेकर यूरोप तक, सभी देशों की सरकारें अपने किसानों का ख्याल रखती हैं और सब्सिडी के माध्यम से किसानों की भारी मदद करती हैं, पर यह तथ्य भी है कि छह हजार हजार रुपये की आर्थिक सहायता किसानों को तात्कालिक मदद तो प्रदान कर सकती है, लेकिन यह किसानों की समस्याओं का दीर्घकालिक हल नहीं है.

पिछले एक दशक से अपने देश के किसानों की स्थिति बहुत खराब रही है. उन्हें उनकी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पाता है. यह हर साल का दृश्य है कि टमाटर और अन्य सब्जियों के दाम इतने कम हो जाते हैं कि किसान उन्हें सड़कों पर फेंक कर चले जाते हैं. ऐसी तस्वीरें फिर सामने आने लगी हैं.

किसानों के आंदोलन मोदी सरकार के दौरान विरोध की बड़ी आवाज बने हैं. मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों में भाजपा की हार में भी किसानों की नाराजगी एक वजह मानी जाती है. किसानों की चिंताजनक स्थिति का अंदाज इस बात से लगता है कि पिछले 10 वर्षों में देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले लगभग तीन लाख किसानों ने आत्महत्या की है. किसानों की सबसे बड़ी समस्या फसल का उचित मूल्य है. एक किसान अपनी फसल में जितना लगाता है, उसका आधा भी नहीं निकलता है. यही वजह है कि आज किसान कर्ज में डूबे हुए हैं. किसानों पर बैंक से ज्यादा साहूकारों का कर्ज है.

यह सही है कि मौजूदा केंद्र सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य में दो गुना की वृद्धि की है, लेकिन मौजूदा समय में खेती में लागत खासी बढ़ गयी है. कुछ व्यावहारिक समस्याएं भी हैं, जैसे सरकारें बहुत देर से फसल की खरीद शुरू करती हैं. तब तक किसान आढ़तियों को फसल बेच चुके होते हैं. कृषि भूमि के मालिकाना हक को लेकर भी विवाद पुराना है. जमीनों का एक बड़ा हिस्सा बड़े किसानों, महाजनों और साहूकारों के पास है, जिस पर छोटे किसान काम करते हैं. ऐसे में अगर फसल अच्छी नहीं होती, तो छोटे किसान कर्ज में डूब जाते हैं.

जब भी किसानों का आंदोलन होता है, तब स्वामीनाथन कमेटी की सिफारिशों की चर्चा जरूर होती है. दरअसल, किसानों की समस्याओं का अध्ययन करने के लिए हरित क्रांति के जनक प्रो एमएस स्वामीनाथन की अगुआई में नवंबर, 2004 में एक कमेटी बनी थी.

इस कमेटी ने अक्तूबर, 2006 में अपनी रिपोर्ट सौंपी थी, जिसमें खेती और किसानों की दशा में सुधार के लिए अनेक सिफारिशें की गयी थीं. स्वामीनाथन कमेटी की सबसे प्रमुख सिफारिश थी कृषि को राज्यों की सूची के बजाय समवर्ती सूची में लाया जाये, ताकि केंद्र व राज्य दोनों किसानों की मदद के लिए आगे आएं. स्वामीनाथन कमेटी ने बीज और फसल की कीमत को लेकर भी सुझाव दिये थे और कहा था कि किसानों को अच्छी क्वालिटी का बीज न्यूनतम मूल्य पर मुहैया कराया जाए और उन्हें फसल की लागत का पचास प्रतिशत ज्यादा दाम मिले.

कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में सिफारिश की थी कि किसानों के कर्ज की ब्याज दर 4 प्रतिशत तक लायी जाए, लेकिन किसान आज भी स्वामीनाथन कमेटी की सिफारिशों को अमल में लाने की जद्दोजहद कर रहे हैं. यह देश का दुर्भाग्य है कि दशकों से हमारा तंत्र किसानों के प्रति उदासीन रहा है. अगर आप गौर करें, तो पायेंगे कि विकास की दौड़ में हमारे गांव लगातार पिछड़ते जा रहे हैं.

बिजली-पानी, सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं शहरों में केंद्रित होकर रह गयी हैं. आजादी के 70 साल हो गये, लेकिन गांवों में बुनियादी सुविधाओं का नितांत अभाव है. गांवों का जीवनस्तर सुधरना चाहिए. विकास की प्राथमिकता के केंद्र में गांव होने चाहिए. बुनियादी सुविधा उनका हक है. हम सबको किसानों की जायज मांगों का समर्थन करना चाहिए.