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किसानों से अब भी दूर है फसल बीमा योजना-- के सी त्यागी

पिछले साल की तरह इस साल भी अप्रैल की बेमौसम बारिश, ओलावृष्टि और तेज हवाओं ने रबी की फसल व बागवानी को काफी नुकसान पहुंचाया। इस प्राकृतिक आपदा ने पहले से बदहाल किसानों की परेशानियां बढ़ा दी हैं। उत्तर भारत में जम्मू-कश्मीर, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और मध्य भारत में विदर्भ के किसान इससे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। अब लाखों किसान सरकारी कार्यालयों और बीमा कंपनियों के चक्कर काटने को विवश हैं।

 

 

किसानों की फसली अनिश्चितताएं दूर करने के लिए केंद्र सरकार ने 13 जनवरी, 2016 को प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना मंजूर की थी, जो जून, 2016 से लागू भी हो गई। योजना के तहत बहुत कम प्रीमियम पर फसलों का बीमा होना था। प्राकृतिक आपदा, कीट-रोगों की स्थिति में किसानों को पर्याप्त बीमा कवरेज और वित्तीय सहायता मिलनी थी। यानी इसके लक्ष्य अच्छे थे।

 

 

योजना लागू हुए एक साल से ज्यादा हो गया है। अब तो इसकी खामियां भी उजागर होने लगी हैं। हालांकि यह खेती को मुनाफे का सौदा बनाने व गांवों की अर्थव्यवस्था में निवेश के लिए सही दिशा में उठाया गया कदम था, पर कुछ निजी कॉरपोरेट कंपनियों द्वारा इसे कमाई का साधन बना लेने से किसानों को सही लाभ नहीं मिल पा रहा। योजना बनाते समय सरकार ने निजी बीमा कंपनियों पर अतिरिक्त भरोसा जताया, जो अब योजना के क्रियान्वयन में सबसे बड़ी बाधा है। न जाने क्यों सरकारी बीमा कंपनियों को इससे दूर रखा गया है?

 

 

बीते दिनों प्राकृतिक आपदा से 45 बीघा फसल के नुकसान के बाद पटवार, मध्य प्रदेश के एक किसान को फसल बीमा लेने के लिए आमरण अनशन करना पड़ा था। इसके बाद भी उसे लाभ नहीं मिला, क्योंकि विभाग ने खेत को इकाई न मानते हुए पूरे हलके को इकाई मानकर उसके नुकसान का आकलन नहीं किया। दरअसल, किसानों को लाभ पहुंचाने वाली ज्यादातर योजनाएं अक्सर नियमों की विसंगतियों के कारण कारगर साबित नहीं हो पातीं। इस मामले में भी ऐसा ही है।

 

 

योजना के तहत खरीफ के लिए पंजीकरण की अंतिम तारीख 31 जुलाई के आस-पास होती है। तब तक मानसून का रुझान साफ हो चुका होता है। ऐसे में, इस साल कमजोर मानसून का पूर्वानुमान रहने पर बीमा कंपनियों को भारी दावों का सामना करना पड़ सकता है। पिछले खरीफ सत्र में महाराष्ट्र से करीब 4,000 करोड़ रुपये का प्रीमियम जमा हुआ था, जबकि दावा 2,000 करोड़ रुपये का था। यानी पिछले वर्ष बीमा कंपनियों ने मोटा मुनाफा कमाया, मगर गरीब किसान की स्थिति नहीं बदली। ताजा रिपोर्ट बताती है कि इस साल कमजोर मानसून के पूर्वानुमान के चलते कई निजी बीमा कंपनियां पहले ही महाराष्ट्र से पलायन के चक्कर में हैं। दरअसल, कंपनियों के लिए यह योजना महज लूट का माध्यम है। कंपनियों को फसल कटाई व नुकसान के आकलन के लिए कर्मचारी रखने समेत बुनियादी ढांचा तैयार करने पर कोई प्रारंभिक निवेश नहीं करना पड़ा है। पहले से ही अत्यधिक बोझ से दबे कृषि विभाग के कर्मचारियों द्वारा आकलन में लगाई गई मेहनत का भी फायदा ये कंपनियां उठा रही हैं। हरियाणा, राजस्थान जैसे कई राज्यों में किसानों के खातों से प्रीमियम राशि जबर्दस्ती काटे जाने की शिकायतें मिली हैं। राजस्थान में तो किसानों की खाली पड़ी जमीन का भी प्रीमियम काट लिया गया। औसतन जहां किसानों ने पांच से सात सौ रुपये तक प्रीमियम दिया, वहीं पूरी फसल खराब होने के बाद भी उन्हें मुआवजे के तौर पर 13 से 20 रुपये मिले।

 

 

निस्संदेह, इस योजना की कुछ खामियां दूर कर ली जाएं, तो इसके अच्छे परिणाम मिल सकते हैं। सबसे पहले तो बीमा कंपनियों की मनमानी रोकनी होगी। हर आपदा अपने साथ बेहतरी का अवसर भी लाती है। हाल ही में हुई ओला वृष्टि और असमय बारिश का जो असर किसानों पर पड़ा है, वह नीति में सुधार करने का एक ऐसा ही मौका है। केंद्र व राज्य सरकारों को कृषि विकास के लिए साझा सतत और टिकाऊ नीति बनानी चाहिए। भारतीय कृषि और किसानों के लिए एक ऐसी व्यवस्था जरूरी है, जो भविष्य में किसानों को फसल क्षति की स्थिति में उचित मुआवजा और बीमा राशि बिना किसी अड़चन के दिला सके।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)