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कृषि अर्थशास्त्र मानसून से आगे-- देविन्दर शर्मा

सबसे पहले अच्छी खबरें। लगातार तीसरे साल मानसून के सामान्य रहने की संभावना है। ‘भारतीय मौसम विज्ञान विभाग' ने यह भविष्यवाणी की है कि आने वाले दिनों में चौतरफा अच्छी बारिश होगी और पूरे मानसून सीजन में 97 फीसदी बारिश होगी।

 

लेकिन बात यहीं पूरी नहीं हो जाती। हमें मौसम विज्ञानियों पर भरोसा है, मगर कई स्वाभाविक कारणों से सामान्य से कम वर्षा की 44 प्रतिशत आशंकाएं भी हैं। पिछले साल भी मौसम विज्ञान विभाग ने मानसून सीजन में औसतन 96 फीसदी बारिश होने का अनुमान जताया था, लेकिन देश के लगभग 240 जिलों में सूखे जैसी स्थिति पैदा हो गई। दूसरी तरफ, ठीक उसी दौरान कुछ इलाकों में न सिर्फ बारिश हुई, बल्कि मूसलाधार बारिश हुई। देश के लगभग 15 फीसदी भूभाग को बाढ़ का सामना करना पड़ा। डाउन टु अर्थ पत्रिका के मुताबिक, ‘पिछले साल मानसून और चाहे जो हो, सामान्य तो कतई न था। कई हफ्तों और महीनों तक वर्षा न होने की कमी को चंद घंटों की जोरदार बारिश ने पूरी कर दी थी। यह वर्षा जल के सामयिक वितरण में भारी विषमता की ओर इशारा करता है।'

 

इसलिए हमें बेहतर मानसून की कामना करनी चाहिए। कुछ इलाकों में घनघोर वर्षा और दूसरे क्षेत्र में कम बारिश की बिना पर औसत आकलन तो कर लिया जाता है, लेकिन देखा यह गया है कि अक्सर ये आकलन भ्रामक ही साबित हुए। बहरहाल, मानसून की अगली भविष्यवाणी 15 मई के आसपास की जाएगी और वह भविष्यवाणी हमें बरसात के आरंभ होने व जून-जुलाई में वर्षा के फैलाव की साफ तस्वीर दे पाएगी। लेकिन इसमें कोई दोराय नहीं हो सकती कि अच्छे मानसून की भविष्यवाणी अर्थव्यवस्था को एक फीलगुड फैक्टर तो देती ही है। समय से बुआई और वक्त पर कटाई ऐसी चीज है, जिसकी हर किसान बाट जोहता है। इस साल का अनुमान है कि बारिश पूरे मौसम में चौतरफा बरसेगी, खासकर जून और सितंबर के महीनों में। गरमी की ज्यादातर फसलों की बुआई अमूमन जुलाई-अगस्त में होती है, उस दौरान हालांकि कुछ कम वर्षा का अनुमान लगाया गया है, मगर इस कमी के भी सामान्य के आसपास रहने की ही भविष्यवाणी की गई है। अगर जुलाई-अगस्त में बारिश में देरी हुई, तो फिर बुआई में भी देरी होगी और इस देरी का मतलब है उत्पादन में गिरावट की आशंका।

 

चूंकि हमारे देश का 60 फीसदी बुआई क्षेत्र मानसूनी बारिश पर निर्भर है, ऐसे में सामान्य वर्षा वाले मानसून की भविष्यवाणी ने निश्चय ही खुशी का माहौल बनाया है। यह देश के कुल 640 जिलों में से उन 240 जिलों के लिए खास राहत भरी खबर है, जिन्हें पिछले साल सूखे का सामना करना पड़ा था। इस सूखे से सबसे बुरी तरह प्रभावित कुछ जिले बुंदेलखंड और झारखंड के हैं, तो वहीं महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश व तेलंगाना के कुछ इलाके पिछले कई वर्षों से लगातार सूखा झेल रहे हैं। जल संकट का आलम यह था कि पिछले वर्ष छत्तीसगढ़ व गुजरात के कुछ इलाकों के किसानों से यह कहा गया कि वे धान की फसल न उगाएं। अगर कृषि क्षेत्र का प्रदर्शन अच्छा होता है, तो पूरी अर्थव्यवस्था पर उसका दूरगामी प्रभाव पड़ता है। अच्छी पैदावार खाद्यान्न महंगाई दर को काबू में रखती है। अच्छे मानसून का सुखद असर यह भी होता है कि इसके कारण भूजल स्तर के रीचार्ज होने से सिंचाई के साथ-साथ पेयजल की उपलब्धता बढ़ जाती है, और बारिश का पानी देश के 81 बड़े जलाशयों को लबालब भर देता है। उच्च कृषि विकास दर का सीधा असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। ग्रामीण क्षेत्र की क्रय शक्ति के बढ़ने से मैन्युफैक्चरिंग व औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि होती है। इसलिए चुनावी साल में अच्छा मानसून सत्तारूढ़ पार्टी के लिए भी सुखद साबित होता है, क्योंकि जनता की आम धारणा पर इन सभी का असर पड़ता है।

 

हम सभी जानते हैं कि बारिश, अनाज के उत्पादन और आर्थिक विकास का सकारात्मक पारस्परिक संबंध है। लगातार दो सूखे वाले वित्तीय वर्ष 2014-15 और 2015-16 में देश में अनाज के उत्पादन में गिरावट आई थी, जिसके कारण उस दौरान कृषि विकास दर क्रमश: -0.8 और -0.1 प्रतिशत रही। लेकिन जब 2016-17 में मानसूनी बारिश सामान्य हुई, तो कृषि विकास दर उछलकर 6.8 प्रतिशत पर पहुंच गई। इस साल इसके तीन प्रतिशत रहने का अनुमान है। लेकिन पिछले दो वर्षों से अच्छे मानसून और रिकॉर्ड कृषि उपज के बावजूद किसानों की स्थिति क्या है? चारों तरफ, कृषि उत्पादों के दाम धराशाई हो गए। किसान उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की 15 से 40 फीसदी कम कीमत पर बेचने को मजबूर हुए। ऐसे तमाम वाकये देखने-पढ़ने को मिले, जब टमाटर, आलू और प्याज जैसी कृषि उपजों को किसानों ने सड़कों पर फेंक दिया। कपास, सोयाबीन, दालों, सूरजमुखी, जौ, यहां तक कि गेंहू व चावल के दाम भी कम ही थे।

 

अतिरिक्त उत्पादन किसानों के लिए स्वाभाविक रूप से अच्छी कीमत लेकर सामने नहीं आया। इसलिए, लगातार तीसरे साल अच्छे मानसून की भविष्यवाणी इस बात की गारंटी नहीं है कि यह कृषि आय में कोई स्थिरता लाएगी। पिछले कई वर्षों से किसानों की वास्तविक आय में सालाना महज 0.44 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो रही है और मुझे इसमें किसी बड़े बदलाव की कोई सूरत नहीं दिखती। अनेक अध्ययनों ने यह दिखाया है कि मानसून सामान्य रहे या कमजोर, वास्तविक कृषि आय में जड़ता बनी रहेगी। इसकी मुख्य वजह यह है कि खाद्यान्न महंगाई को काबू में रखने का सारा भार किसानों के कंधे पर डाल दिया गया है। कृषि को जान-बूझकर साधनहीन बनाया जा रहा है। इसलिए हमारे नीति-नियंताओं के सामने यह बड़ी चुनौती है कि वे कृषि आय को बढ़ाने के लिए फौरन वाजिब कदम उठाएं। यह वक्त ‘दाम नीति' से आगे ‘आय नीति' की तरफ बढ़ने का है। मानसून अच्छा रहे या कमजोर, किसानों की जरूरत एक सुनिश्चित मासिक आमदनी है। उन्हें अब इंद्र देवता के भरोसे और ज्यादा नहीं छोड़ा जा