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कृषि-भूमि और विदेशी निवेश- के पी सिंह

जनसत्ता  : शहरी विकास मंत्रालय का प्रस्ताव है कि विदेशी कंपनियों को कृषि-भूमि खरीदने की अनुमति दी जाए ताकि शहरीकरण की प्रक्रिया में विदेशी निवेश हो और विकास रफ्तार पकड़ सके। मंत्रालय की दलील है कि शहरी आवास परियोजनाओं के लिए पहले से ही कृषि-भूमि का अधिग्रहण किया जा रहा है, इसलिए विदेशी कंपनियों को भी इस उद््देश्य के लिए कृषि-भूमि खरीदने की अनुमति देने में कोई हर्ज नहीं है। सरकार ने इस प्रस्ताव पर गौर करने के लिए तीन सदस्यीय मंत्रिमंडलीय समिति का गठन किया है, जिसमें शहरी विकास मंत्री कमलनाथ, वित्तमंत्री पी चिदंबरम और वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा शामिल हैं। इस समिति की सिफारिशों पर मंत्रिमंडल में विचार-विमर्श के बाद ही कोई निर्णय किया जाएगा।

विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम के अनुसार कृषि-भूमि खरीदने के लिए भारत में विदेशी निवेश वर्जित है। यही नहीं, भारतीय बैंकों के नियमों के अनुसार घरेलू निवेशकों को भी खेती की जमीन खरीदने के लिए ऋण नहीं दिया जा सकता। केवल बहुत बड़ी परियोजनाओं को इस नियम का अपवाद बनाया गया है, जिनसे राजस्व की प्राप्ति होती हो। ऐसा इसलिए किया गया है कि खेती की जमीन को जमाखोरों और सटोरियों के दांव-पेच से बचाया जा सके और अधिक से अधिक भूमि कृषि-कार्यों के लिए वास्तविक कृषकों को उपलब्ध रहे।

किसानों, भारतीय निवेशकों, आम नागरिकों और राष्ट्रीय हित के कई जटिल मुद््दे कृषि-भूमि में विदेशी निवेश से सीधे जुड़े हुए हैं। केवल शहरीकरण की जरूरतों को ध्यान में रख कर इतने महत्त्वपूर्ण मसले पर जल्दबाजी में कोई निर्णय लेना ठीक नहीं होगा। इस विषय पर विस्तृत सार्वजनिक बहस होनी चाहिए।

देश की खाद्य-सुरक्षा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण मसला है। अतीत में खाद्यान्न के लिए अमेरिका, रूस और कुछ अन्य देशों पर निर्भरता के कारण हमारे राष्ट्रीय स्वाभिमान को जब-तब ठेस पहुंचती रही। साठ के दशक में शुरू हुई हरित क्रांति के फलस्वरूप खाद्य उत्पादन में आई आत्मनिर्भरता ने भारत को अंतरराष्ट्रीय मंच पर बेबाकी के साथ अपनी आवाज मुखर करने का साहस प्रदान किया है। आज की परिस्थितियों में जब भारत अनेक देशों के साथ आर्थिक, राजनीतिक, कूटनीतिक और तकनीकी क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा कर रहा है, खाद्यान्न-सुरक्षा एक कवच की तरह है। कृषि-भूमि में विदेशी निवेश का रास्ता साफ कर देने से खाद्य सुरक्षा पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है। इससे देश में खेती की जमीन का रकबा घटेगा। ऐसे में अनाज की पैदावार अप्रत्याशित रूप से घट जाने का खतरा है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

इस मसले पर सार्थक बहस के लिए कृषि-क्षेत्र से जुड़ी कुछ जमीनी हकीकतों से रूबरू होना जरूरी है। भूमि सुधारों को लागू हुए लगभग पचास वर्ष होने जा रहे हैं। इस दौरान कृषि-भूमि किसानों की तीन पीढ़ियों में बंट चुकी है। इक्का-दुक्का जमींदारों या बड़े भूस्वामियों को छोड़ कर खेती की जमीन के अधिकतर मालिक अत्यंत छोटे या सीमांत किसानों की श्रेणी में आ चुके हैं। उनकी कृषि-भूमि की जोत लाभदायक नहीं रह गई है। वैकल्पिक व्यवसाय शुरू करने के लिए आवश्यक योग्यता, आर्थिक क्षमता और पेशेवर साहस की कमी के कारण वे अब भी कृषि-भूमि से जुड़े हुए हैं। उनके गुजारे का एकमात्र साधन अब भी कृषि-भूमि ही है। इसीलिए ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी तेजी से पैर पसार रही है।

गांवों में बसे मझोले और बड़े किसानों की आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं रही है कि इन छोटे-छोटे किसानों की जमीन खरीद सकें। अगर उन्हें विदेशी निवेश करने वाली कंपनियां दिखाई देंगी तो वे सारे के सारे अपनी जमीन बेचने के लिए तैयार बैठे हैं। रातोंरात जमीन बेच कर अमीर बनने का हसीन सपना उन्हें चैन से नहीं बैठने देगा।

कृषि-भूमि बेचने से ऐसे किसान एक बार तो संपन्न बन जाएंगे, लेकिन इतिहास गवाह है कि इस प्रकार मिले धन का अधिकतर भू-स्वामियों ने सदुपयोग नहीं किया है। खेती की जमीन हाथ से निकल जाने के कुछ समय बाद इन परिवारों के लिए रोजी-रोटी का संकट उत्पन्न हो सकता है। ऐसे में नवयुवकों का अपराध जगत में प्रवेश कर जाना स्वाभाविक प्रक्रिया है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र इसका सटीक उदाहरण प्रस्तुत करता है।

ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि-भूमि विदेशी कंपनियों के पास चले जाने से अतीत का भू-स्वामी अपनी ही जमीन पर मजदूरी करने के लिए बाध्य होगा। क्योंकि उसे कोई और काम करना नहीं आता। किसान से मजदूर बन जाने की त्रासदी प्रेमचंद ने ‘गोदान’ में वर्णित की है। भू-स्वामी से मजदूर बन जाने की हकीकत अनेक मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और आर्थिक उथल-पुथल को जन्म देगी, जिसका अभी अनुमान ही लगाया जा सकता है। हाल ही में सर्वोच्च अदालत ने भी किसानों की कीमत पर औद्योगीकरण की सरकारी नीति पर ऐसी ही टिप्पणी की है।

सर्वोच्च न्यायालय ने गुजरात से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा है कि देश की जनसंख्या का बहुत बड़ा हिस्सा आजीविका के लिए कृषि-भूमि पर निर्भर है। हालांकि शहरीकरण और औद्योगिकीकरण हो रहा है, पर इन क्षेत्रों में इतना विकास नहीं हो पाया है कि कृषि क्षेत्र से विस्थापित होने वाले सभी लोगों को रोजगार के पर्याप्त  अवसर उपलब्ध हो सकें। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी में भविष्य के सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन के संकेत ही नहीं बल्कि प्रबुद्ध वर्ग की वास्तविक चिंता भी छिपी हुई है। व्यवस्था के पहरेदारों और समाजशास्त्रियों को इस पर मंथन करने की जरूरत है।

भारत में कोई भी शहर या कस्बा ऐसा नहीं बचा है जिसके आसपास शहरीकरण के नाम पर बहुत अधिक मात्रा में कृषि-भूमि को अर्द्धविकसित रिहायशी कॉलोनियों में तब्दील न कर दिया गया हो। इनमें से अधिकतर कॉलोनियां अभी बसी नहीं हैं क्योंकि बाजार में इनके खरीदार नहीं हैं। ऐसा नहीं है कि भारत में नए आवासों की जरूरत नहीं है। पर ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम बची है जो इतनी महंगी जमीन और घर खरीदने की क्षमता रखते हैं। इसीलिए अकेले राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में ही लाखों की संख्या में विकसित और अर्द्धविकसित आवास उनमें रहने वालों की बाट जोह रहे हैं।

यह खोजबीन का विषय हो सकता है कि क्या भारत में आने वाले पंद्रह-बीस सालों में शहरीकरण के लिए पहले ही ले ली गई कृषि-भूमि के अलावा और भूमि अधिग्रहण करने की आवश्यकता है भी या नहीं? इसलिए, कृषि-भूमि में विदेशी निवेश की संभावनाओं का पता लगाने की मंशा के पीछे के गोरखधंधे पर गौर करना जरूरी हो जाता है।

शहरीकरण से जुड़ी प्राइवेट बिल्डरों की परियोजनाओं में घरेलू निवेशकों की काफी बड़ी पूंजी फंसी पड़ी है। एक दौर ऐसा आया था जब निवेशकों या खरीदारों की पूंजी का इस्तेमाल बिल्डर अतिरिक्त कृषि-भूमि खरीदने में करते चले गए और उन परियोजनाओं को पूरा नहीं किया जिनके लिए धन लिया गया था। बाजार में पूंजी की उपलब्धता और ग्राहक न होने की वजह से आवासीय परियोजनाएं निवेशकों के लिए लाभकारी नहीं रहीं, जिसके कारण इस क्षेत्र में घरेलू पूंजी-निवेश लगभग बंद हो चुका है। बिल्डर खरीदारों के साथ हुए पुराने करार पूरा नहीं कर पा रहे हैं। खरीदार बैंकों से लिए गए ऋण की किस्तें नहीं चुका पा रहे हैं। इस ठहराव और असंतुलन को दूर करने के लिए कुछ लोग विदेशी निवेश आकर्षित करने की योजना को सिरे चढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।

काले धन को विदेशी कंपनियों के माध्यम से देश में निवेश करके उसे सफेद बनाने की एक वर्ग की चाहत भी कहीं न कहीं कृषि क्षेत्र में विदेशी निवेश की मांग के पीछे होगी। विदेशों में काले धन को खपाना मुश्किल होता जा रहा है। ऐसे में विदेश में जमा काले धन को देश में कृषि-भूमि में निवेश करना उनके लिए एक अच्छा विकल्प हो सकता है। भूमि अधिग्रहण से जुड़ा हुआ एक मुद््दा और भी है, जिस पर विचार करना जरूरी है।

इस साल एक जनवरी से नया जमीन अधिग्रहण कानून लागू हो गया है। इस कानून में इस प्रकार के प्रावधान हैं कि बाजार-भाव से तीन से चार गुना कीमत पर ही खेती की जमीन का अधिग्रहण संभव हो सकेगा। भूमि के जमाखोरों और सटोरियों को बाजार-भाव पर कृषि-भूमि में निवेश करके उसका सरकार के माध्यम से अधिग्रहण करवाना भारी मुनाफे का सौदा दिखाई देने लगा है। इस प्रकार काला धन सफेद भी हो जाएगा और बहुत ही थोड़े समय में पूंजी तीन से चार गुना तक बढ़ जाएगी!

कृषि-भूमि में विदेशी निवेश को न्योता देने से एक नए किस्म का भू-उपनिवेशवाद शुरू हो जाने का खतरा वास्तविक है, जिसमें खेती की जमीन की कीमतें भू-माफिया तय करेगा। इस प्रकार तय की गई कीमतें इतनी अधिक हो सकती हैं कि कृषि-भूमि को न तो कोई किसान खरीद पाएगा और न आम आदमी अपने जीवनकाल में एक मकान बनाने का सपना पूरा कर सकेगा। यह स्थिति देश की आंतरिक सुरक्षा और व्यवस्था के स्थायित्व के लिए बहुत बड़ा संकट बन सकती है।

दरअसल, शहरीकरण देश की आवश्यकता नहीं है। इसके विकल्प मौजूद हैं। जरूरत इस बात की है कि कस्बों और गांवों में शहरों के समान मूलभूत सुविधाएं मुहैया कराई जाएं। अगर शहरीकरण को इसी प्रकार बढ़ावा दिया जाता रहा तो शहरों में पहले से ही अपर्याप्त नागरिक सुविधाओं के चरमरा जाने का खतरा और बढ़ जाएगा। कस्बों और गांवों से लोगों के शहरों की तरफ पलायन को रोकना नीतिकारों की प्राथमिकता होनी चाहिए। पर्यावरण पर शहरीकरण के विपरीत प्रभावों को नकारा नहीं जा सकता। हरे-भरे खेतों की जगह कंक्रीट के जंगल अवश्य ही पर्यावरण पर बुरा प्रभाव डालेंगे।

शहरीकरण के लिए और कृषि-भूमि का अधिग्रहण करने के बजाय बहुमंजिला इमारतों के निर्माण को बढ़ावा देना बेहतर विकल्प है। पुरानी इमारतों को तोड़ कर उन्हें आधुनिक बहुमंजिला आवासीय परिसरों में परिवर्तित किया जा सकता है। पहले से ही अधिग्रहीत कृषि-भूमि को पूर्ण आवासीय परिसरों के रूप में बस जाने तक आगे खेती की जमीन के अधिग्रहण पर रोक लगाई जा सकती है। आवासीय परियोजनाओं को अनुमति देने से पहले इस बात की जांच होनी चाहिए कि आवास पाने के लिए आवेदन करने वाले लोग जरूरतमंद हैं या महज निवेश की नीयत से आवेदन कर रहे हैं।

कृषि-भूमि अमूल्य राष्ट्रीय संपदा है। कृष्ण पक्ष के चंद्रमा की तरह यह लगातार घटती जा रही है। भू-संपदा को बढ़ाना संभव नहीं है। इसलिए इसे बचाना और सहेजना एक महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय जिम्मेदारी है। यह समझ से परे है कि राष्ट्रीय भूमि उपयोग नीति और राष्ट्रीय किसान नीति-2007 में देशी और विदेशी निवेश में क्यों भेद नहीं किया गया है? आवश्यकता इस बात की है कि कृषि-भूमि के उपयोग से संबंधित समग्र नीति तैयार की जाए। कृषि-भूमि में विदेशी निवेश की राह खोल देने से देश एक ऐसे कुचक्र में फंस जाएगा, जिससे मुक्तिपाना दुष्कर ही नहीं, लगभग असंभव होगा।