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केपटाउन कहीं भी दस्तक दे सकता है -- अनिल प्रकाश जोशी

दक्षिण अफ्रीका के केपटाउन की जल त्रासदी चौंकाने से ज्यादा डराने वाली है। यह दुनिया के बेहतरीन शहरों में से एक माना जाता है और हमेशा अपनी खूबसूरती के लिए चर्चा में रहा है। लेकिन आज केपटाउन दूसरी वजह से सुर्खियों में है। यहां पानी का संकट अपने चरम पर पहुंच चुका है। पिछले एक दशक से वैसे भी यह शहर पानी की किल्लत से गुजर ही रहा था और समय रहते इसके लिए कुछ नहीं किया गया। अब हालत यह है कि घरों को आपूर्ति के लायक भी पानी नहीं बचा। सब कुछ ठप है, क्योंकि जल है, तो जीवन है। वहां नहाना और धोना सब कुछ बंद कर दिया गया है। अब वहां प्रति व्यक्ति मात्र 25 लीटर पानी देना संभव होगा और किसी भी तरह के जल दंगों से निपटने के लिए सेना और पुलिस भी तैयार की जा रही है।

केपटाउन तो एक शहर है, दूसरी तरफ पूरा संयुक्त अरब अमीरात विकराल जल संकट की ओर बढ़ रहा है। इससे निपटने के लिए अंटार्कटिका से समुद्र के रास्ते एक हिमखंड खींचकर लाने की कोशिश की जा रही है। यह काम एक निजी कंपनी को सौंपा जा रहा है। अनुमान है कि यह हिमखंड पांच साल तक यूएई के लोगों की प्यास बुझाएगा। इस अजीब योजना के तहत 8,800 किलोमीटर दूर हिमखंड वहां पहुंचेगा, फिर उसे टुकड़े-टुकड़े करके स्टोर किया जाएगा। दुनिया में बाकी जगह समस्या भले ही इतनी विकराल न हो, लेकिन आबादी के एक बडे़ हिस्से को परेशान तो कर ही रही है। अनुमान है कि दुनिया की 1़1 अरब आबादी को आज भी साफ पानी नसीब नहीं होता और दूसरी तरफ 2.7 अरब लोगों को कम से कम एक महीना पानी की कमी से जूझना पड़ता है। यह तय माना जा रहा है कि साल 2025 तक दुनिया की दो-तिहाई आबादी पानी के संकट का शिकार होगी।


पूरी समस्या को हम ऐसे भी समझ सकते हैं कि 1951 में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता 5,177 घन मीटर थी, जो घटकर वर्ष 2025 में सिर्फ 1,341 घन मीटर पहुंचने वाली है। अपने ही देश में अधिकतर तालाब और कुओं ने दो दशकों में तेजी से पानी खोया है और जहां पर जल 15 से 20 फीट नीचे उपलब्ध था, वहां वह 200 फीट से नीचे जा चुका है। लोकसभा में ही सरकार द्वारा स्वीकारा गया है कि अपने देश में 275 नदियां खतरे की घंटी बजा चुकी हैं, क्योंकि उनमें पानी की मात्रा तेजी से खत्म हो रही है। 2016 में नौ राज्यों के 33 करोड़ लोगों ने भीषण जल संकट को झेला था। जल आयोग के अनुसार, देश के 91 प्रमुख जलाशय अच्छी हालत में नहीं हैं। गरमी आते-आते इनमें 20 से 22 फीसदी पानी ही बचा रहता है।
जब संकट आता है, तो दाएं-बाएं से हम किसी तरह जल जुटा ही लेते हैं और स्थितियां सामान्य होने पर पुराना संकट भुला दिया जाता है। अपने देश में जो नया चलन सामने आया है, वह यह कि जल संकट अब गरमियों की ही समस्या नहीं रह गया, बल्कि शीतकाल में भी लोगों को इससे जूझना पड़ता है। जल संकट का दूसरा बड़ा पहलू यह भी है कि धरती को छेदकर हर हद तक पानी निकालने के हमारे पागलपन ने आर्सेनिक क्लोराइड, फ्लोराइड, नाइटे्रट व आयरन जैसे तत्वों की जल में बहुतायत पैदा कर दी है, जिससे देश को नई तरह की बीमारियां झेलनी पड़ रही हैं।


इस संकट की स्थिति में भी अपने देश में जल के प्रति मनमानी कोई नई बात नहीं है। इसके दुरुप्रयोग के सारे रास्ते खुले हैं। जल संरक्षण व जल के किफायती उपयोग पर न तो कोई कानून दिखता है और न ही कोई बड़ी जागरूकता। इसलिए यह खतरा तो है ही कि देर-सवेर अपने यहां भी केपटाउन जैसी स्थितियां पैदा हो सकती हैं। इसका अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि देश के कई हिस्से खासतौर से गरमियों में भीषण सूखे की स्थिति में पहुंच जाते हैं, शहरों में हर जगह पानी-पानी का शोर सुनाई देने लगता है। दिल्ली हो या देहरादून, कानपुर हो या लखनऊ , या दक्षिण भारत का कोई अन्य शहर केपटाउन कहीं भी दस्तक दे सकता है। केपटाउन व संयुक्त अरब अमीरात के जल संकट के संकेत हमें गंभीर होने का इशारा करते हैं।

इसके लिए सबसे पहले जरूरी यह है कि हम जल पर एक राष्ट्रीय कानून बनाएं। ऐसे कई देश हैं, जहां जल कानूनों ने जल दुरुपयोग पर बड़ा अंकुश लगाया है। इजरायल और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश जल कानून बनाकर उन पर अमल करते हैं। दूसरा, अपने देश का 65 से 70 फीसदी जल खेती में लगा दिया जाता है। जरूरत है कि इजरायल जैसे देशों से खेती में जल का बेहतर उपयोग सीखा जाए। तीसरी और ज्यादा अहम बात जो हमारे देश के पक्ष में है, वह यह कि यहां वर्षा की बहुतायत है। हर वर्ष लगभग 4,000 अरब क्यूबिक पानी उपलब्ध होता है, पर उसका मात्र 15 फीसदी हम संरक्षित कर पाते हैं। इस दिशा में एक बड़ी पहल की आवश्यकता है। मरती नदियां, खाली होते कुओं और सूखते तालाबों को बरसात की बारिश ही नवजीवन दे सकती है। हमें सारे रास्ते तैयार करने होंगे, वह चाहे हरेक नागरिक से जुड़ा उपाय हो या कॉरपोरेट घरानों से, हमें पानी को जोड़ने के लिए हर तरह की कोशिश करनी पड़ेगी। जहां एक तरफ जल संरक्षण व इसके कुशल उपयोग पर काम करना होगा, वहीं पानी के दुरुपयोग के लिए कानून की वकालत करनी होगी। वरना हम केपटाउन व संयुक्त अरब अमीरात की खबरों की अनदेखी आने वाले समय पर नहीं कर पाएंगे, क्योंकि तब हम स्वयं उस जल संकट का हिस्सा होंगे। इस तरह के संकटों में समझदारी और दायित्व मात्र सरकार के जिम्मे नहीं छोड़ा जा सकता, क्योंकि सरकार तो बदलती रहती है। लेकिन हमारी सामूहिक जागरूकता आने वाले समय में ऐसी किसी भी परिस्थिति को बदल सकती है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)