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क्या मोदी सरकार का आख़िरी बजट वास्तव में भारत की तरक्की की कहानी बयां करता है?- सचिन कुमार जैन

क़र्ज़दार सरकारें देश की आज़ादी को सुरक्षित नहीं रख सकती हैं, क्योंकि तब क़र्ज़ देने वाला नीतियों पर नियंत्रण रखता है. माध्यम वर्ग को आयकर में थोड़ी छूट और मिली, 12 करोड़ किसानों को हर रोज़ 16.50 रुपये मिलेंगे, क्योंकि वे पिछले दिनों कमर कस के बाहर निकल आए थे.

2030 तक नदियों को साफ़ करने का वायदा, 2030 में सबको पीनी का साफ़ पानी मिलने का सुखद स्वप्न; बहुत लोगों ने तालियां बजायीं और सोचा कि यह विकासवादी बजट आ गया है. हम सब अपने-अपने हित, अपने-अपने सुख पाल रहे हैं.

मुझे जो मिला, मैं उससे खुश हो गया और दाएं-बाएं देखना, यह सवाल पूछना छोड़ दिया कि सरकार का पैसा कहां से आ रहा है और कहां जा रहा है?

हम सब अर्थव्यवस्था के विध्वंस में भागीदार बन रहे हैं. सरकार ने 1 लाख करोड़ रुपये जनता को देकर, ख़ुद 7 लाख करोड़ रुपये के क़र्ज़ लेने का अधिकार पा लिया और इससे भी ऊपर समाज की प्राथमिकताओं के क्रम को बिगाड़ने का भी; किसी को सरकार कभी नहीं बताती कि वह क्यों क़र्ज़ ले रही है और इसका आने वाली पीढ़ियों पर क्या असर पड़ेगा?

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