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क्यों 25 साल बाद भी हमें नहीं पता कि बच्चों को चमकी बुखार से कैसे बचाया जाए?-- सचिन जैन

भारत में बच्चे एक संख्या भर बन कर रह गए हैं. वर्तमान विकास की चर्चाओं में हम बस शिशु मृत्यु दर, बाल मृत्यु दर, कुपोषण का प्रतिशत, बच्चों के साथ लैंगिक शोषण के आंकड़े और मृत बच्चों की संख्या की गणना करते रहते हैं.

पिछले महीने भर से बिहार के मुजफ्फरपुर के बहाने भी यही हुआ है. इस क्षेत्र में एक्यूट इंसेफलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) या चमकी बुखार के कारण तकरीबन 150 बच्चों की मृत्यु हो गई.

महत्वपूर्ण बात यह है कि वर्ष 1995 में मुजफ्फरपुर में यह एक्यूट इंसेफलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) का पहला मामला स्पष्ट रूप से सामने आने के बाद 25 साल गुजर गए, इसके बाद भी इस बीमारी के सही-सही कारणों का पता नहीं चल पा रहा है.

महत्वपूर्ण बात यह है कि राजनीतिक गठजोड़ों के कारण सक्रिय रहने वाले बिहार में पिछले पांच सालों में 1000 से ज्यादा बच्चों का जीवन छीन लेने वाली इस बीमारी पर शोध, जांच और उपचार के लिए अत्याधुनिक अनुसंधान केंद्र और वाइरोलॉजिकल प्रयोगशाला स्थापित नहीं हो पाई है.

हमारे यहां विकास के लिए यह जरूरी माना जाता है कि बच्चों में कुपोषण के ऊंचे स्तर को छिपाया जाए और संसद से लेकर विधानसभाओं तक पुरजोर तरीके से यह साबित किया जाए कि भारत में कुपोषण बाल मृत्यु का कोई कारण नहीं है.

बिहार में लीची को एईएस का और एईएस को बच्चों की मृत्यु का कारण माना जा रहा है, परन्तु अभी भी व्यवस्था को यह स्वीकार करने में दिक्कत है कि बच्चों की मृत्यु का मूल कारण तो कुपोषण और प्राथमिक लोक स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली है.

इंसेफलोपैथी होने का मतलब है कि यह एक किस्म की बायोकेमिकल बीमारी है. जैसा कि मुजफ्फरपुर में तात्कालिक रूप से यह दिखाई दे रहा है कि लीची फल का सेवन इसका मुख्य कारण है.

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