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क्यों बंद हो रहे सरकारी स्कूल--- कौशलेन्द्र प्रपन्न

एक सरकारी स्कूल का बंद होना क्या मायने रखता है इसका अनुमान शायद हम आज न लगा सकें। संभव है इसका खमियाजा समाज को दस-बीस बरस बाद भुगतना पड़े। एक ओर विकास के डंके बज रहे हैं वहीं दूसरी ओर आम बच्चों से उनकी बुनियादी शिक्षा की उम्मीद यानी सरकारी स्कूल तक छीने जा रहे हैं। हमने 2000 में सहस्राब्दी विकास लक्ष्य तय किया था। उसमें 2010 तक सभी बच्चों को बुनियादी शिक्षा दिलाने की घोषणा की थी। यों तो 1990 में ही हमने ‘सबके लिए शिक्षा' (एजुकेशन फर आॅल) की घोषणा कर दी थी। उसमें हमने तय किया था कि 2000 तक सभी बच्चों को तालीम मुहैया करा देंगे। लेकिन वैश्विक शिक्षा निगरानी रिपोर्ट 2017-18 की मानें तो अब भी भारत में 8 करोड़ 80 लाख बच्चे स्कूली शिक्षा से बेदखल हैं।


इस तरह के आंकड़े महज संख्या नहीं हैं बल्कि सतत विकास-लक्ष्य के चेहरे पर झन्नाटेदार तमाचा हैं। लेकिन अफसोसनाक हकीकत यह है कि हमें वह दर्द महसूस नहीं होता। बल्कि हम दूसरे तमाशों में दर्द को भूल बैठे हैं। क्या हम इस सच्चाई से मुंह फेर सकते हैं कि आज स्कूल से बाहर रह गए बच्चे कल हमारे ही समाज के अनपहचाने चेहरों में तब्दील हो जाएंगे। नागर समाज इन्हें अनपढ़ और गंवार के तमगे बांटा करेगा।


शिक्षा दरअसल हमारी चिंता के केंद्र में नहीं आ पाती। बस शिक्षा तब मीडिया और नागर समाज का ध्यान खींचती है जब कोई अप्रिय घटना हो- शिक्षक का गुस्सा, या बच्चे ज्यादा फेल हो जाएं। जब हकीकतन स्कूलों में खासकर सरकारी स्कूलों में शिक्षक/शिक्षण का मुद््दा उठता है तब बजट कम होने के नाम पर सारा ठीकरा शिक्षक के सिर फोड़ दिया जाता है। जबकि सरकारी स्कूलों में बच्चों के न आने, कम होने आदि की शिकायत अमूमन सभी राज्यों से आती रही है। पर इन स्कूलों को कैसे सुधारा जाए इस पर ठहर कर सोचने और समाधान निकालने में हमारी दिलचस्पी नहीं होती।


हाल ही में ओड़िशा में मुख्यमंत्री के गृहजिले में सत्तर सरकारी स्कूलों को ताला लगा दिया गया। कुल बंद हुए स्कूलों की संख्या 828 है। ये वे स्कूल हैं जिनके बारे में बताया गया है कि इनमें दस से भी कम बच्चे रह गए थे। इसलिए इन्हें बंद करने का फैसला लिया गया। जबकि कायदे से इन स्कूलों में बच्चों के कम होते जाने की वजहों की पड़ताल और उन वजहों को दूर करने के प्रयास किए जाने चाहिए थे। लेकिन वे कदम उठाने जरा कठिन थे, सो आसान रास्ता चुन लिया गया और इन स्कूलों को बंद कर दिया गया। आदिवासी समाज से उनका जंगल पहले ही छीन चुके हैं। बची थी शिक्षा तो उसे भी छीन लिया।


माना जा रहा है कि आदिवासी बहुल रायगढ़ा और कंधमाल जिलों में इन स्कूलों में बच्चे लगातार कम हो रहे थे। लेकिन यह जानने की कोशिश हमने नहीं की कि क्यों यह प्रवृत्ति विकसित हो रही है। क्या हम कम होते बच्चों यानी स्कूल छोड़ने वालों बच्चों की पहचान नहीं कर सकते थे। क्या हमें यह नहीं पता करना चाहिए था कि इन स्कूलों से बच्चे कहां जा रहे हैं? क्या वे पास के निजी स्कूलों में दाखिल हो रहे हैं या कौशल विकास योजना के तहत हाथ का काम सीखने कौशल विकास केंद्रों पर जा रहे हैं। आंकड़े बता रहे हैं कि ऐसे 8,547 स्कूलों की पहचान की गई है जहां पच्चीस से भी कम बच्चे रह गए हैं।


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एक तर्क यह भी दिया जा रहा है कि इतने कम बच्चों पर मानव संसाधन और पैसा खर्च करना कहां तक उचित है। गौरतलब है कि इस इलाके में चल रहे सरकारी स्कूलों में 1,58,213 लाख बच्चे पढ़ते हैं। यदि इन स्कूलों को बंद किया गया तो इन बच्चों को कहां और किस प्रकार स्कूलों में व्यवस्था की जाएगी। हालांकि ओड़िशा सरकार ने बताया है कि इन बच्चों को पास के स्कूलों में दाखिला दे दिया जाएगा। ऐसे में पहले से मौजूद बच्चों को नए बच्चों के परिवेशीय और स्तर के अनुसार आने वाली खाई को पाटने की कार्य योजना क्या तैयार है। ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनके लिए हमें तैयार रहना होगा। इन जिलों के सरकारी स्कूलों में हजारों शिक्षक कार्यरत हैं। उन्हें अचानक नए स्कूलों में नई जगह भेज दिया जाएगा।


पिछले पांच सालों में देश के विभिन्न राज्यों मसलन राजस्थान, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़ आदि में बहुत सारे सरकारी स्कूलों में ताले लग चुके हैं। बंद हुए स्कूलों के बच्चों को स्थानीय अन्य स्कूलों में दाखिला दे दिया गया। सरकारी स्कूलों को निजी कंपनियों के हाथों में सौंप दिया गया। हालांकि इन स्कूलों में सरकारी शिक्षक नहीं रहे, बल्कि एनजीओ की ओर प्रशिक्षित शिक्षकों की मदद ली जा रही है। इसी तरह उत्तराखंड में भी साढ़े तीन हजार से ज्यादा सरकारी स्कूल 2015-16 में बंद हो चुके हैं।
‘आरटीइ फोरम' पिछले छह सालों से बल्कि 2009 से ही शिक्षा अधिकार अधिनियम के तहत सभी स्कूलों में प्रशिक्षित और स्थायी शिक्षकों की भर्ती की वकालत कर रहा है। साथ ही, सरकारी स्कूलों को बंद होने से कैसे बचाएं, इस बाबत सरकार और न्यायपालिका में आवाज उठाता रहा है। ‘फोरम' का मानना है कि सरकार सभी बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मुहैया कराने की जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकती। फोरम शिक्षकों के खाली पदों को भरने की मांग भी उठाता रहा है। केवल एक संस्था ऐसे गंभीर सवाल उठाए या आवाज बुलंद करे यह काफी नहीं है। नागर समाज को सरकारी स्कूलों को बंद होने से बचाने के लिए आगे आना होगा। सरकार निजी कंपनियों के हाथों प्राथमिक शिक्षा को सौंपने का खेल खेल रही है। जो स्कूल बंद हो रहे हैं उनसे लड़कियां ज्यादा प्रभावित होंगी।


पिछले पांच सालों में डेढ़ लाख से ज्यादा सरकारी स्कूल बंद हो चुके हैं। तर्क दिया गया कि बच्चे कम हैं। उन बच्चों को स्कूलों में कैसे लाएं इसके प्रति सरकार सचेत नहीं है। जबकि शिक्षा अधिकार अधिनियम के अनुसार एक किलोमीटर के दायरे में स्कूल मुहैया कराना सरकारों की न केवल नैतिक बल्कि संवैधानिक जिम्मेदारी है। इस जिम्मेदारी से सरकारें पल्ला नहीं झाड़ सकतीं। जब राजस्थान में सत्रह हजार स्कूलों को बंद किया गया तो नागर समाज ने आवाज उठाई। तब जाकर सरकार को तीन हजार स्कूलों को दुबारा खोलना पड़ा। आज न केवल ओड़िशा और राजस्थान बल्कि देश के अन्य राज्यों में भी लचर तर्कों को आधार बना कर सरकारी स्कूलों को बंद किया जा रहा है या निजी हाथों में दिया जा रहा है, जो कि दुर्भाग्यपूर्ण है।


शिक्षा अधिकार अधिनियम संवैधानिक प्रावधान है जिसके तहत छह से चौदह साल के आयुवर्ग के सभी बच्चों को बुनियादी शिक्षा प्रदान करने के प्रति सरकार जिम्मेदार है। लेकिन हककीत यह है कि सरकार अपनी जिम्मेदारी से लगातार बचने की कोशिश कर रही है। वहीं ताजा वैश्विक शिक्षा निगरानी रिपोर्ट कहती है कि शिक्षा में जिम्मेवारी तय करना बेहद जरूरी है। इनमें सरकार, नागर समाज, शिक्षक, स्कूली पाठ्यपुस्तकें आदि सभी शामिल हैं। सतत विकास लक्ष्य की समय सीमा बढ़ा कर 2030 कर दी गई है। माना जा रहा है कि इस समय तक हम सभी बच्चों को गुणवत्तापूर्ण, समान शिक्षा प्रदान करने में सक्षम हो जाएंगे। लेकिन मौजूदा नीति और गति को देखते हुए हो सकता है हमें एक बार फिर समय सीमा बढ़ानी पडेÞ।