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क्रोनी पूंजीवाद और विकास- भरत झुनझुनवाला

राजतंत्र, सामंतवाद व कम्युनिज्म की तुलना में पूंजीवाद ने दुनिया में बहुत अधिक समृद्धि लायी है. पूंजीवाद की यह सफलता खुले बाजार में प्रतिस्पर्धा से हासिल हुई है. बाजार में हर व्यक्ति को प्रयोग करने, नये माल बनाने एवं नयी तकनीक के उपयोग की छूट होती है. जैसे पूंजीवाद में छूट है कि कोई किसान हाइब्रिड बीज से फसल उगाये या देशी बीज से. एक किसान सफल हुआ, तो दूसरे सहज ही उसका अनुसरण करते हैं और उपज बढ़ती है तथा बाजार में दाम गिरता है. बाजार में नये व्यापारियों को प्रवेश का अवसर रहता है. किसान का बेटा पढ़ कर कंपनी की मार्केटिंग कर सकता है. अवसर सभी के लिए खुले रहते हैं. इससे प्रतिभावान लोगों को बढ़ने के मौके मिलते हैं. वे तकनीकें इजाद करते हैं, जैसे बिलगेट्स ने ‘विंडोज’ बना आइटी क्षेत्र में क्रांति ला दी.

सच्चे पूंजीवाद में सरकार के द्वारा बाजार की चाल में हस्तक्षेप नहीं किया जाता. सरकार ने निर्णय दे दिया कि हाइब्रिड बीज के उपयोग की छूट है, तो छूट हर किसान को उपलब्ध होती है. सच्चे पूंजीवाद में मत्स्य न्याय चलता है. एक-दूसरे की व्यापारिक मारकाट करने को सब बराबर होते हैं. लेकिन सरकार व्यक्ति विशेष के पक्ष में हस्तक्षेप करे, तो क्रोनी पूंजीवाद (चहेतों को लाभ पहुंचानेवाला यानी लंगोटिया पूंजीवाद) पैदा होता है. जैसे 2जी स्पेक्ट्रम या जमीन का आवंटन व्यक्ति विशेष के पक्ष में किया जाये, तो कुशल उत्पादन से हम वंचित हो जाते हैं.

मान लीजिए कि गन्ने के बीज उगाने हैं. देश में अनेक व्यक्ति होंगे, जो इस कार्य को कर सकते हैं. सच्चे पूंजीवाद में सरकार को उन्नत बीज खरीदने की घोषणा करनी चाहिए. ऐसे में कई लोग गन्ने के बीज के उत्पादन का कार्य करेंगे. इनमें जो सस्ता और अच्छा उत्पादन करेगा वह जीतेगा. इसके विपरीत यदि सरकार किसी अकुशल व्यक्ति को बीज उत्पादन का ठेका दे दे, तो उसकी अकुशलता अर्थव्यवस्था में व्याप्त हो जाती है. इसी प्रकार स्पेक्ट्रम या कोयले के ब्लॉक के आवंटन नीलामी द्वारा हों, तो कुशलतम व्यक्ति इन्हें हासिल करेगा और आर्थिक विकास को गति मिलेगी. यही बात नौकरी, विशेषकर सरकारी नौकरी पर लागू होती है.

पूंजीवाद में सभी को बराबर अवसर दिया जाता है, परंतु क्रोनी पूंजीवाद में विशेष व्यक्ति को प्राथमिकता दी जाती है. विशेष लोगों को प्राथमिकता देने का खासकर छात्रों पर बहुत दुष्प्रभाव पड़ता है. पढ़ने के स्थान पर वे गुरुजी की चाकरी पर ध्यान देते हैं. इससे शिक्षा के लाभ से अर्थव्यवस्था वंचित हो जाती है. युवा डिग्री लेकर घूमते रहते हैं, पर कुछ भी हासिल करने लायक नहीं रह जाते.

क्रोनी पूंजीवाद का निकृष्ट रूप तब सामने आता है, जब शासनकर्ताओं द्वारा विरोधियों को दबाने के विशेष अभियान चलाये जाते हैं. जैसे किरण बेदी की यात्रा और बालकृष्ण की नागरिकता के मामलों को उठाया गया. देश में इस तरह के करोड़ों मामले होंगे. यदि ऐसे आचरण गलत थे, तो सभी पर कार्रवाई होनी चाहिए थी. व्यक्ति विशेष को टारगेट करने से क्रोनी पूंजीवाद के विरोध में उठनेवाली आवाज कमजोर हो जाती है और सरकार की गलत चाल पर लगाम हट जाती है.

क्रोनी पूंजीवाद का तार्किक परिणाम विकास दर में गिरावट होता है. कुशल व्यापारियों को अवसर न देने से, छात्रों द्वारा ज्ञान अर्जित नहीं करने से एवं विरोधियों पर कार्रवाई करने से अकुशल उत्पादन होता रहता है, बाजार में माल महंगा पड़ता है, आम आदमी का जीवन स्तर गिरता है और विकास दर गिरती है. साथ-साथ देश की आय वर्ग विशेष में सीमित हो जाती है. एक वर्ग के पास अनंत आय और एवं ऐसो-आराम के साधन होते हैं, जबकि राजमहल की चहारदीवारी के बाहर आम आदमी भूखे मरता है.

क्रोनी पूंजीवाद वाले देश के प्रतिभावान लोग पलायन कर जाते हैं. इसके विपरीत सच्चे पूंजीवाद की विजय होती है. इस समय भारत सच्चे पूंजीवाद को त्याग कर क्रोनी पूंजीवाद की ओर बढ़ रहा है. इसी से महंगाई बढ़ रही है. आम आदमी का जीवन स्तर दबाव में है, विकास दर गिर रही है, विकास एक वर्ग विशेष में सिमट कर रह गया है.

प्रसन्नता का विषय है कि क्रोनी पूंजीवाद ज्यादा समय तक टिकता नहीं. अफ्रीकी देश टय़ूनीशिया में वहां के राष्ट्रपति बेन अली के परिवार के लिए सभी व्यापारिक अवसर आरक्षित थे. देश की टेलीफोन एवं दूसरी प्रमुख कंपनियां इसी परिवार के द्वारा चलायी जाती थीं. यहीं अफ्रीकी क्रांति का शुभारंभ हुआ. यानी क्रोनी पूंजीवाद से निबटने का रास्ता क्रांति का है, जिसे अन्ना हजारे, केजरीवाल और रामदेव बढ़ा रहे हैं. सरकार के सामने विकल्प है कि क्रोनी पूंजीवाद को स्वयं त्याग दे या फिर क्रांति का सामना करे.