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खेती-बाड़ी को किस दिशा ले जाएगी घटते खेतों की प्रवृत्ति?

कार्बन कॉपी, 27 फरवरी

दरअसल दुनिया अब नए खेतों को बनता नहीं देख पाएगी। बजाय इसके खेतों का एकीकरण शुरू होगा। भारत जैसे देशों के साथ ही एशिया, अफ्रीका व उत्तरी अमेरिका के अधिकांश गरीब और विकासशील देशों के लिए यह एक ऐसा बदलाव है, जिसके बारे में हमने कभी नहीं सोचा था। और इसलिए हम इसके परिणामों के लिए तैयार नहीं थे।

उदाहरण के लिए भारत में क्रियाशील कृषि जोतों की संख्या 1970-1971 से लगातार बढ़ रही है। 1971 में भारत में 7.1 करोड़ कृषि जोत थी। नवीनतम कृषि गणना (सेंसस) 2015-2016 के अनुसार, अब यह 14.65 करोड़ जोत में बंट गई है। इसी के चलते भारत की कृषि नीति छोटी जोत के कारण उपज में कमी के परिणाम पर केंद्रित है। इसी भूमि पर एक अरब से ज्यादा लोगों का पेट भरने का दारोमदार है।  

इसे देखते हुए किसी भी कीमत और परिणाम पर उत्पादकता बढ़ाने पर तत्काल ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है। यदि वैश्विक प्रवृत्ति को भारतीय परिदृश्य में ढाला जाए तो स्थिति बिलकुल उलटने वाली है।

हाल ही में बोल्डर स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो के शोधकर्ताओं ने अपनी तरह का पहला अध्ययन किया। नेचर सस्टेनेबिलिटी जर्नल में प्रकाशित अध्ययन में 1969-2013 तक 180 देशों में खेतों की संख्या और आकार का विश्लेषण किया गया। शोधकर्ताओं ने 2100 में स्थिति का पूर्वानुमान लगाने के लिए इस अवधि के रुझानों का उपयोग किया।

अध्ययन में अनुमान है कि 2100 में दुनिया में खेतों की संख्या आधी हो जाएगी लेकिन खेतों का आकार दोगुना हो जाएगा। अमेरिका और पश्चिमी यूरोप में यह चलन पिछले कई दशकों में जगजाहिर हो चुका है।

अमेरिकी कृषि विभाग की आर्थिक शोध शाखा कहती है, “20वीं सदी की शुरुआत में कृषि श्रम प्रधान थी। यह ग्रामीण क्षेत्रों में कई छोटे व बिखरे हुए खेतों पर होती थी जहां अमेरिका की आधी से अधिक आबादी रहती थी। दूसरी तरफ 21वीं सदी में कृषि उत्पादन ग्रामीण क्षेत्रों में कम लेकिन बड़े आकार के खेतों में केंद्रित है, जहां अमेरिका की एक चौथाई से भी कम आबादी रहती है।”
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