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गंभीर खतरा, सुस्त रवैया-- विनीत कुमार

हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं जब धरती के वायुमंडल में ग्रीन हाउस गैस का स्तर पिछले 8 लाख वर्षों में उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है और फरवरी, 2018 में तो यह 408 पीपीएम के रिकॉर्ड आंकड़े को पार कर गया है। संयुक्त राष्ट्र संघ की एमिशन गैप रिपोर्ट 2017 कहती है कि पेरिस समझौते के अंतर्गत देशों की वर्तमान प्रतिबद्धताएं तापमान को 21वीं सदी के अंत तक 2 डिग्री सेल्सियस तक रोकने में नाकाफी हैं।

विभिन्न अनुमानों के मुताबिक, हम लगभग 3 से 4 डिग्री सेल्सियस के औसत तापमान वृद्धि की ओर बढ़ रहे हैं, जिसके परिणाम विनाशकारी होंगे। पहले ही 2015, 2016, 2017 पिछले सारे रिकॉर्ड को तोड़ते हुए अब तक के सबसे गर्म वर्ष घोषित हो चुके हैं।

भारत में जलवायु परिवर्तन का प्रभाव मुख्यत: कृषि, जल, जंगल, हिमखंड, समुद्र जल स्तर आदि पर अधिक पड़ने की संभावना है। साथ ही यहां चरम मौसमीय घटनाओं की आवृत्ति व तीव्रता भी बढ़ जाएगी। बड़े पैमाने पर भारत में फैली गरीबी व जनसंख्या के एक बड़े हिस्से की आजीविका की निर्भरता जलवायु संवेदनशील क्षेत्रों जैसे कृषि, जंगल, भूमि जैसे प्राकृतिक संसाधनों पर होने की वजह से यहां जलवायु परिवर्तन का जोखिम और बढ़ जाएगा। ऐसी स्थिति में जलवायु परिवर्तन के वर्तमान व संभावित जोखिमों से निपटने की तैयारी अत्यंत आवश्यक है।

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