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गन्ने की कीमत से आगे- अपूर्वानंद

जनसत्ता 10 दिसंबर, 2013 : उत्तर प्रदेश से अब गन्ना उगाने वाले किसानों के मिल मालिकों से संघर्ष की खबरें आ रही हैं।

यह संघर्ष जोरदार है। और एक तरह से इसे सफल जन संघर्ष कहा जा सकता है। इसने मुजफ्फरनगर की तीन महीने से चली आ रही हिंसा की खबरों को पीछे धकेल दिया है। कम से कम हिंदी अखबारों में। इस आंदोलन में भारतीय राष्ट्रीय  लोक दल के लोग भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहे हैं जिनके नेता कभी चरण सिंह हुआ करते थे और अभी जिनकी विरासत उनके पुत्र और पौत्र संभाल रहे हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जनाधार होने के बावजूद इन्हें पिछले तीन महीनों में हिंसा के बीच हस्तक्षेप करने में विफलता ही हाथ लगी थी। इनके साथ भारतीय किसान यूनियन के नेताओं को भी शामिल कर लें, जो मजबूर हो गए थे कि भारतीय जनता पार्टी के एजेंडे को ही मुजफ्फरनगर में लागू करें, अब गन्ना-किसानों के संघर्ष के बहाने वे फिर मैदान में आ गए हैं।

राज्य सरकार भी शायद इस आंदोलन का इंतजार कर रही थी। या शायद उसने इसे पीछे रह कर बढ़ावा ही दिया हो। मिल मालिकों और किसानों के बीच मध्यस्थता के जरिए गन्ने की कीमत बढ़वा कर उसने वह वैधता हासिल करने की कोशिश की है जो सितंबर के बाद वह कम से कम पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हिंदुओं (जाटों) और मुसलमानों के बीच खो बैठी थी। यानी उसकी सत्ता है, उसके हस्तक्षेप से कुछ हो सकता है और इस तरह उसकी भूमिका बची हुई है। इस दृष्टि से यह संघर्ष सरकार के लिए बहुत आवश्यक था। यह कोई अतिशयोक्ति नहीं कि सितंबर से पश्चिमी उत्तर प्रदेश का बड़ा इलाका लगभग स्वायत्त हो गया था जहां सरकार अप्रासंगिक हो गई थी। अब वह लौटने का साहस जुटा पाएगी।

कहा जा सकता है कि मार्क्स का सिद्धांत उत्तर प्रदेश में आखिरकार सही सिद्ध हुआ है। भौतिक आवश्यकताओं के असली मुद्दे ने आखिरकार केंद्रीयता हासिल कर ही ली। धर्म के नाम पर झगड़ा एक नकली संघर्ष माना जाता रहा है जो रोजी-रोटी के असली मुद्दे से जनता का ध्यान बंटाने की साजिश है। दूसरी तरफ यह भी कहा जा सकता है कि विकास की राजनीति ने भावनात्मक राजनीति पर विजय हासिल कर ली है, क्योंकि उसका आधार भी आजीविका और रोजमर्रा की जिंदगी की बेहतरी ही है।

चीनी मिल मालिकों के खिलाफ गन्ना-किसानों के इस  संघर्ष में नेतृत्व की भूमिका में वे लोग भी हैं जो पिछले महीनों मुजफ्फरनगर की पंचायतों में एक विशेष समुदाय के पक्ष से प्रशासन को धमकी दे रहे थे कि सितंबर की हिंसा में नामजद लोगों की गिरफ्तारी के बुरे अंजाम होंगे। हमारी जानकारी के मुताबिक  मुसलिम लोगों की हत्याओं और बलात्कार के मामलों में नामजद लोगों में से बहुत कम गिरफ्तारियां हो पाई हैं। जब भी पुलिस ने गिरफ्तारी की कोशिश की है, बहुसंख्यक समुदाय की औरतों ने लाठी और दूसरे हथियारों के साथ गांव की नाकाबंदी कर दी है। कुछ नेता जो हिंसा भड़काने के आरोप में गिरफ्तार हुए थे, जमानत पर बाहर आ गए हैं और अपने पुराने काम में लग गए हैं। अनेक तो गिरफ्तार ही नहीं किए जा सके, जबकि वे खुलेआम सभाएं करते घूम रहे हैं। इनमें से कुछ अब गन्ना-किसानों के इस संघर्ष में दिख रहे हैं। यह भी कहा जा रहा है कि किसानों के इस संघर्ष में हिंदू-मुसलिम साथ हैं। फिर क्या उम्मीद करें कि मुसलमानों के लिए इंसाफ का संघर्ष भी मिल कर किया जा सकेगा?

सितंबर में जब भारतीय किसान यूनियन के इन नेताओं से यह पूछा गया कि उनके रहते यह हिंसा कैसे फूट पड़ी और क्योंकर लगभग साठ हजार मुसलमानों को अपने पुश्तैनी गांव छोड़ कर भागना पड़ा, तो व्यक्तिगत बातचीत में उन्होंने स्वीकार किया कि भाजपा के संगठित अभियान ने उन्हें अपने समुदाय के बीच ही निष्प्रभावी बना दिया था और उनके पास इसके अलावा और कोई चारा नहीं बचा था कि वे अभी अपने समुदाय के साथ खड़े दिखाई दें। यह मानते हुए भी कि मुसलमानों के साथ नाइंसाफी हुई है, इस बात को बोलने का खतरा मोल लेना उनके बस का नहीं था।

अगर उनकी बात मान लें तो भारतीय किसान यूनियन के नेताओं में, जिनके आह्वान पर कभी हजारों-हजार किसान अपनी जगहों से उठ कर दिल्ली ठप करने पहुंच सकते थे, यह विश्वास नहीं रह गया था कि उनकी बात उनके अपने लोग सुनेंगे। आर्थिक मुद््दे पर तो वे अपने लोगों को गोलबंद कर सकते हैं, जैसा कि अभी के संघर्ष से भी जाहिर होता है; भावनात्मक स्तर पर उनकी अपील नहीं है।

आर्थिक जगत और भावनात्मक जगत के बीच की इस खाई को कम्युनिस्ट पार्टियां भी नहीं पाट सकी थीं। जमशेदपुर हो या मुंबई, श्रमिक बहुल शहर होने के बावजूद सांप्रदायिक विचार के प्रसार को रोकने में वे कम्युनिस्ट पार्टियां नाकाम रहीं जिन्होंने वहां मजदूरों की आर्थिक बेहतरी का संघर्ष किया था। बिहार में भूमि हड़प आंदोलन में तो ग्रामीण भूमिहीन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के साथ आए लेकिन जमीन पर स्वामित्व मिल जाने के बाद उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी को अपना राजनीतिक स्वर मानने से इनकार कर दिया।

लगभग दो दशक बाद एक शुद्धतर मार्क्सवादी-लेनिनवादी दल ने भी अपने जनाधार का क्षरण अस्मिता की भावनात्मक राजनीति के द्वारा होते देखा। धीरे-धीरे ट्रेड यूनियनों में भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबद्ध भारतीय मजदूर संघ ने वामपंथी यूनियनों को अपदस्थ कर दिया।

आश्चर्य की बात नहीं कि गुजरात में 2002 की हिंसा के बाद बड़े पैमाने पर विस्थापित मुसलमानों को राहत पहुंचाने का खयाल भी वामपंथी दलों को नहीं आया। ऐसा नहीं कि कांग्रेस या अन्य ‘धर्मनिरपेक्ष’ दलों ने कुछ किया हो। यह काम कुछ भावुक ‘गैर-राजनीतिक’ व्यक्तियों और

‘एनजीओ’ के रूप में तिरस्कृत लोगों के जिम्मे छोड़ दिया गया। अगर हम मुजफ्फरनगर में इस्लामी संगठनों को ही राहत-शिविर चलाते देख रहे हैं तो यह भी नई बात नहीं। गुजरात में विस्थापितों को फौरी राहत देने से लेकर सुरक्षित जगह बसाने का काम भी प्राय: इस्लामी संगठनों ने ही किया था। गुजरात में नरेंद्र मोदी की मुसलिम-विरोधी मनोवृत्ति को इस क्रूर उदासीनता और असंवेदनशीलता के लिए जिम्मेवार माना गया। राहत-शिविरों को जबर्दस्ती बंद करने से लेकर न्याय के रास्ते में रोड़े अटकाने के अनेक उदाहरण हमारे सामने थे। जाहिरा शेख, बिलकीस बानो से लेकर जकिया जाफरी की इंसाफ की जद्दोजहद के लिए या तो उन्हें अकेले छोड़ दिया गया या कुछ नागरिक समूहों के सहारे।

पिछले साल महाराष्ट्र में मालेगांव के करीब धुले में हुई हिंसा और उसके बाद भी यही दोहराया गया। यहां सिर्फ छह मुसलमान मारे गए थे। और घर भी तकरीबन छत्तीस ही बर्बाद किए गए थे। यह पॉवरलूम पर टिका शहर है। कायदे से यहां के लोगों की जिंदगी में वामपंथियों की दिलचस्पी होनी चाहिए थी। और मुसलिम समर्थक कही जाने वाली कांग्रेस और उसकी सहयोगी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की भी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। यहां तक कि मारे गए मुसलमानों के परिजनों से सहानुभूति जताने जैसी निरी मानवीयता का प्रदर्शन करने में भी ये दल हिचकिचा गए।

मुआवजा घोषित करने में आनाकानी होती रही और हिंसा की जांच को लेकर भी सरकार अनिच्छुक दिखाई पड़ी। हिंसा के शिकार परिवारों को राहत देने के सवाल पर प्रशासन खामोश रहा। पूछने पर कहा कि उनका खयाल उनके हम-मजहब कर ही रहे हैं, फिर सरकार से यह उम्मीद क्यों की जा रही है। बहुत दबाव डालने पर जब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने धुले का दौरा किया भी, तो उन्होंने सार्वजनिक रूप से मुसलमानों से मिलने से परहेज किया और बंद कमरे में उनके प्रतिनिधियों से मिले। क्या यह कहने की जरूरत है कि ये भी मुसलिम धार्मिक नेता ही थे?

बताया गया कि कांग्रेस के अन्य नेता भी लुके-छिपे मुसलमानों से मिले; एक ने एक चेक बंद कमरे में दिया और कहा कि अपने लोगों को बताना कि हमने मदद की थी। आप तो समझ ही रहे हैं, खुलेआम यह करने में हिंदुओं के नाराज होने का खतरा था!

बोडो हमले में विस्थापित मुसलमानों के प्रति (लगभग डेढ़ लाख), जो महीनों तक शिविरों में रहने को बाध्य हुए, दिल्ली में किसी भी राजनीतिक दल ने सहानुभूति नहीं दिखाई। असम दिल्ली से इतनी संवेदनात्मक दूरी पर है कि गुजरात और मुजफ्फरनगर में राहत लेकर जाने वाले लोग भी वहां तक जाने के खयाल से थक-से गए। असम की कांग्रेस सरकार ने भी इसे गंभीर मानवीय समस्या मानने से इनकार कर दिया। अन्य ‘धर्मनिरपेक्ष’ दलों ने, जिनमें वामपंथी शामिल हैं, इसे महत्त्वपूर्ण राजनीतिक मुद्दा ही नहीं माना।

इन सारे उदाहरणों से एक ही बात साबित होती है और वह यह कि धर्मनिरपेक्षता व्यावहारिक राजनीति में एक वायवीय अवधारणा भर रह गई है। वह मानवीय अवधारणा भी नहीं रह पाई है। उसका न्याय से भी सीधा संबंध नहीं रह गया है। वह कोई जीवन मूल्य भी नहीं है। कम से कम ऐसी तो नहीं ही है कि उसके लिए सत्ता को दांव पर लगाया जाए। वह इतनी अधिक राज्य-केंद्रित अवधारणा हो चुकी है कि धर्मनिरपेक्ष कहने पर मात्र कुछ राजकीय नीतियों और योजनाओं का ध्यान आता है। धर्मनिरपेक्षता को हमने नई सामुदायिक भावना का आधार बनाने का उद्यम नहीं किया है।

मुजफ्फरनगर पर लौटें। ठंड बढ़ गई है। प्लास्टिक की छत से ओस भी अंदर टपक रही है। कुछ खबरों के मुताबिक  लगभग चालीस नवजात और कमउम्र शिशु, जो हिंसा में बच गए थे, इस ठंड में मारे गए हैं। उत्तर प्रदेश की धर्मनिरपेक्ष सरकार यह साबित करने पर तुली है कि सब कुछ सामान्य हो चुका है। कोशिश की जा रही है कि कानूनी शिकायतें वापस ले ली जाएं जिससे पुराना ‘सद्भाव’ लौट सके। इस तरह इस सद्भाव के लिए भी जिम्मा हिंसा के शिकार लोगों पर है और हमलावर अब खुद को शिकार की तरह पेश कर रहे हैं। उनका कहना है कि उनको निशाना बनाया जा रहा है।

राजनीतिक दलों को छोड़ें, विश्वविद्यालयों के ‘सोशल वर्क’ और ‘पीस स्टडीज’ और ‘वीमेंस स्टडीज’ विभागों की क्या प्रतिक्रिया है? छात्र और शिक्षक संगठनों की? क्यों हम कंबल, स्वेटर और दवाएं नहीं इकट्ठा कर रहे हैं? प्राकृतिक आपदाओं के समय राहत-कोष स्थापित करने वाले मीडिया घरानों ने क्यों अपने पाठकों और दर्शकों से हिंसा-पीड़ितों की मदद के लिए अपील नहीं की? क्या यह मानवीय आपदा नहीं थी? गांधीवादी संगठन भजन करने के अलावा क्यों हिल नहीं पा रहे हैं? क्यों आइआइटी के एक अध्यापक वीएन त्रिपाठी, कुछ खुदाई खिदमतगार, हिमांशु कुमार और कुछ स्त्री संगठनों के अलावा हममें से किसी को मुजफ्फरनगर जाने का खयाल नहीं आया? और कुछ नहीं तो हिंसा के शिकार लोगों के साथ सहानुभूति के दो बोल ही बांटने के लिए?

अब भी मुजफ्फरनगर के लिए मौका है। जो गन्ने की सही कीमत के संघर्ष के जरिए सामाजिक जीवन में वापस पांव जमा रहे हैं, वे थोड़ी हिम्मत दिखाएं और इन शिविरों तक जाएं: दवा, कंबल, स्वेटर, गर्म कपड़ों के साथ। राहत की अपनी भाषा है, वह इंसानी सहारे की जुबान है। क्या मुसलमानों के साथ हमदर्दी का मतलब हिंदू-दुश्मनी है? अगर हमारे राजनीतिक आचरण से दर्दमंदी का लोप हो जाएगा तो हम कैसे समाज का निर्माण करेंगे? आर्थिक आचरण और व्यवहार में सीमित मनुष्य खंडित मनुष्य है। हमें तो संपूर्ण मनुष्यता की राजनीति चाहिए।