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गरीबी के बारे में डीटन ने बढ़ाई है अर्थशास्त्र की समझ-- रीतिका खेड़ा

अपने पूरे कैरिअर में माप के मसले उनकी चिंताओं के केंद्र में रहे हैं। उनके अनुसार आंकड़ों को बिना सवाल किए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। उदाहरण के लिए इस सदी के शुरूआती वर्षों में उन्होंने भारत में मूल्य सूचकांक की गणना की समस्याएं रेखांकित करते हुए यह दिखाया था कि वह कैसे गरीबी संबंधी अनुमानों को प्रभावित करती है। भारत के संबंध में उनका एक और काम गौर फरमाने लायक है: 'अनियमित नियंत्रित परीक्षण' यानी रैंडमाइज्ड कंट्रोल ट्रायल्स (आरसीटी) की उनकी आलोचना। अर्थशास्त्र के क्षेत्र में एक बड़ा सवाल यह है कि अच्छा साक्ष्य किसे मानें। कठोर साक्ष्य की इस तलाश में हाल के वर्षों में आरसीटी तकनीक ने बहुत प्रामाणिकता अर्जित की है। इसकी अवधारणा काफी सरल है। एक जैसे दो जनसमूह लें लेकिन नीतिगत हस्तक्षेपों को सिर्फ एक के लिए लागू करें और नतीजों पर गौर करें।
मसलन, माना जाता है कि खराब शैक्षणिक नतीजों की वजह स्कूल में शिक्षकों की संख्या अपर्याप्त होना है। आरसीटी करने वाले लोग कहेंगे कि एक प्रयोग करो। एक जैसी पारिवारिक पृष्ठभूमि के बच्चों को लो जो एक ही स्कूल में पढ़ते हों और उनमें से कुछ को अतिरिक्त शिक्षक उपलब्‍ध कराओ लेकिन बाकियों को नहीं। अगर अतिरिक्त शिक्षक का लाभ लेने वाले बच्चों के शिक्षण नतीजे अन्य बच्चों से स्पष्टत: भिन्न हैं, आरसीटी वाले कहेंगे कि अतिरिक्त शिक्षकों की नियुक्ति उचित है।
डीटन आरसीटी पर अतिनिर्भरता के सबसे मुखर आलोचक रहे हैं। उन्होंने दिखाया है कि आरसीटी की तकनीकी श्रेष्ठता के दावे बढ़ा-चढ़ा के किए जाते हैं और सवाल किया है कि क्या सिर्फ इस मानदंड के आधार पर निर्णय किए जाएं। (मसलन, ऊपर के उदाहरण में यह सवाल उठता है कि बच्चों के प्रदर्शन में सुधार ही स्कूलों में अतिरिक्त शिक्षक मुहैया कराने का एकमात्र पैमाना होना चाहिए।)
भारत के लिए यह बहस बहुत महत्वपूर्ण है कि क्योंकि कई राज्य सरकारें (जैसे बिहार और तमिलनाडू) इन पद्धतियों से प्रभावित रही हैं। उन्होंने आरसीटी के इस्तेमाल के लिए समझौता पत्र (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए हैं ताकि इन परीक्षणों के परिणामों के आधार पर नीतियां बनाई और क्रियान्वित की जा सकें। बिहार में एक आरसीटी में उन्होंने पाया कि ऐसे हस्तक्षेप की वजह से मजदूरी के भुगतानों में देरी होने लगी। इन परिस्थितियों में मजदूरों को मुआवजा पाने का कानूनी हक है, लेकिन दरअसल मुआवजे का कोई भुगतान नहीं किया गया। नीतिनिर्माण और सार्वजनिक बहस के बीच ऐसे विच्छेद पर डीटन प्रश्न उठाते रहे हैं। सार्वजनिक कार्रवाई और सामाजिक हस्तक्षेप के लिए प्रतिबद्ध होते हुए भी (सन 2013 की अपनी पुस्तक, द ग्रेट ऐस्केप में अपने कामकाज पर अमर्त्य सेन का प्रभाव उन्होंने साभार स्वीकार किया है) उन्होंने आंकड़ों के अपने ब्यौरेवार कार्य को खुद अपने बारे में बोलने दिया है। उन्होंने उसको अपनी मान्यताओं से स्वतंत्र रहने दिया है, भले ही वह 'असहज' परिणामों तक ले जाए।
इस सदी के शुरूआती वर्षों में डीटन और ज्यां द्रेज ने दिखाया कि कैसे उदारवाद के बाद की अवधि (1993-1994 और 1999-2000 के बीच) में गरीबी घटने के सरकारी दावे सही हैं लेकिन 1993-1994 के बाद गरीबी की गिरावट दर बढ़ने का सरकारी दावा गलत है। वाम और दक्षिण दोनों पक्षों के अर्थशास्त्रियों से डीटन की तीखी बहसें हुई हैं। वाम की बात करें तो 2009 में भारत में कुपोषण के संदर्भ में कैलोरी ग्रहण और उसके निहितार्थों पर उत्सा पटनायक के अभिमत की प्रतिक्रिया में ज्यां द्रेज के साथ एक लेख लिखकर गरीबी में गिरावट के बारे में उत्सा पटनायक की राय पर सवाल उठाए। दक्षिण की बात करें तो 2013 में डीटन और उनके सह लेखकों ने अरविंद पानगढ़िया के उस पर्चे को चुनौती दी कि भारतीय कुपोषण नहीं बल्कि आनुवांशिक कारणों से कद में छोटे होते हैं। 
सकल घरेलू उत्पाद में स्वस्थ वृद्धि दर के बावजूद भारत में बाल कुपोषण की गंभीर स्थिति पर डीटन का काम सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। 2009 में डीटन और द्रेज ने विभिन्न पैमानों का इस्तेमाल करते हुए दिखाया कि बाल कुपोषणों में सुधार की दर भारत में बेहद कम और अस्वीकार्य है। यह ज्यादा खतरनाक है क्योंकि जिस अवधि का उन्होंने अध्ययन किया वह जीडीपी के लिए स्वस्थ वृद्धिदर की अवधि थी। यदि आम लोगों की जिंदगी बेहतर न हो (यदि वे ज्यादा से ज्यादा दिन बेहतर स्वस्थ जीवन न जी पाएं) तो खतरा महसूस करने की वजह बनती है। 
(लेखिका आईआईटी दिल्ली में अर्थशास्त्र पढ़ाती हैं।)