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गांधी की दृष्टि में गांव और किसान-- श्रीभगवान सिंह

महात्मा गांधी के विचारों और सोच के निर्माण में देश-विदेश के अनेक विचारकों, कवियों, लेखकों के साथ-साथ उनके अपने जीवनानुभवों का भी बहुत बड़ा हाथ रहा। इन जीवनानुभवों में अत्यंत महत्त्वपूर्ण रहा भारत में गांवों तथा किसानों के संबंध में उनके अनुभव। यह दीगर बात है कि उनके विचारों तथा कार्यों के मूल्यांकन के संदर्भ में इस पक्ष पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है। सर्वविदित है कि दक्षिण अफ्रीका में रहते हुए वहां रंग-भेद के खिलाफ गांधी ने संघर्ष के लिए ‘सत्याग्रह' जैसे अस्त्र का आविष्कार किया, पर इस सत्याग्रह की सफलता का भरोसा बहुत हद तक उन्हें भारत के किसानों की जीवन शैली से प्राप्त हुआ था। सत्याग्रह में जिस साहस को वे आवश्यक मानते थे, वह उन्हें शहरी लोगों में नहीं, बल्कि किसानों के जीवन में मूर्तिमान रूप में दिखाई पड़ता था। ‘हिंद स्वराज' में वे स्पष्ट शब्दों में कहते हैं- ‘मैं आपसे यकीनन कहता हूं कि खेतों में हमारे किसान आज भी निर्भय होकर सोते हैं, जबकि अंग्रेज और आप वहां सोने के लिए आनाकानी करेंगे।... किसान किसी के तलवार-बल के बस न तो कभी हुए हैं और न होंगे। वे तलवार चलाना नहीं जानते, न किसी की तलवार से वे डरते हैं। वे मौत को हमेशा अपना तकिया बना कर सोनेवाली महान प्रजा हैं। उन्होंने मौत का डर छोड़ दिया है। ...बात यह है कि किसानों ने, प्रजा मंडलों ने अपने और राज्य के कारोबार में सत्याग्रह को काम में लिया है। जब राजा जुल्म करता है तब प्रजा रूठती है। यह सत्याग्रह ही है।'

 

गांधी जहां अपने सत्याग्रह की सफलता के लिए किसानों जैसा साहस, मौत से न डरने का जज्बा वांछनीय समझते थे, वहीं देश की आजादी हासिल करने में भी किसानों की महती भूमिका स्वीकार करते थे। छह फरवरी 1916 को काशी हिंदू विश्वविद्यालय के उद्घाटन-समारोह में गांधी ने जो ऐतिहासिक भाषण दिया था, उसमें उन्होंने दो टूक कहा था- ‘मैं जब कभी यह सुनता हूं कि कहीं कोई बड़ा भवन उठाया जा रहा है, तो मेरा मन दुखी हो जाता है और मैं सोचने लगता हूं यह पैसा तो किसानों के पास से इकट्ठा किया गया पैसा है। यदि हम इनके परिश्रम की सारी कमाई दूसरों को उठा कर ले जाने दें तो कैसे कहा जा सकता है कि स्वराज्य की कोई भी भावना हमारे मन में है। हमें आजादी किसानों के बिना नहीं मिल सकती। आजादी वकील, डॉक्टर या संपन्न जमींदारों के वश की बात नहीं है।' वस्तुत: किसानों के प्रति यही हमदर्दी गांधी को चंपारण के गांवों तक खींच ले गई जहां के किसान अंग्रेज नीलहे जमींदारों के दमन से त्रस्त थे। अप्रैल 1917 में चंपारण पहुंच कर गांधी ने नीलहे जमींदारों के स्वेच्छाचार के खिलाफ सत्याग्रह करके वहां के किसानों को ‘तीन कठिया प्रथा' के शोषण-चक्र से छुटकारा दिलाया।

 


 
1920 से गांधीजी ने पूरे देश के स्वराज्य के लिए असहयोग, सविनय अवज्ञा जैसे जो आंदोलन चलाए, उनके पीछे भी उनका मुख्य उद्देश्य रहा गांवों तथा किसानों का पुनरुद्धार करना, क्योंकि उनका मानना था कि भारत अपने सात लाख गांवों में बसता है, न कि चंद शहरों में। यही कारण था कि जहां वे एक तरफ राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन तथा अपने रचनात्मक कार्यक्रमों को उत्तरोत्तर व्यापक व असरदार बनाने में पूरे दम-खम के साथ लगे रहे, वहीं उनका गांवों से लगाव प्रगाढ़ होता गया। यही कारण था कि वे 1933 में अहमदाबाद के साबरमती आश्रम को छोड़ वर्धा आ गए और 1936 में वर्धा से कुछेक मील की दूरी पर सेगांव नामक गांव में आकर आश्रम बना कर रहने लगे। बाद में इस ‘सेगांव' का ही नामकरण सेवाग्राम कर दिया गया जो निपट गंवई इलाका था। सेवाग्राम में बसने के पीछे गांधी ने जो कारण बताए थे, वे गांवों से उनके गहरे लगाव को समझने में बहुत सहायक हैं। ‘गांधी-मार्ग' पत्रिका के नवंबर-दिसंबर 2016 अंक में छपे लेख में कनकमल गांधी ने बताया है कि सेवाग्राम आते ही शाम की प्रार्थना में बापू ने बताया कि हमारी दृष्टि देहली की ओर से उलट कर देहात की ओर होनी चाहिए। देहात हमारा कल्पवृक्ष है। मेरे सेगांव में आ बसने का तात्कालिक उद््देश्य तो यह है कि मैं अपनी सामर्थ्य-भर गांवों में व्याप्त भयंकर अज्ञान और दरिद्रता को और उससे भी भयंकर बाहरी गंदगी को दूर कर सकूं। सच तो यह है कि ये तीनों बुराइयां एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं। हम गांवों में फैले हुए इस अज्ञान को मुंह से अक्षर-ज्ञान करा कर नहीं, बल्कि लोगों के समक्ष सफाई का आदर्श-पाठ प्रस्तुत करके, उन्हें दुनिया में क्या कुछ हो रहा है, इसकी जानकारी देकर और इसी तरह के दूसरे उपायों से दूर करना चाहते हैं।

 

 


 
पर इससे यह नहीं समझना चाहिए कि गांधीजी सिर्फ सेवाग्राम को इन बुराइयों से मुक्त करना चाहते थे, वस्तुत: वे उसे समस्त गांवों के समक्ष एक मॉडल के रूप में प्रस्तुत करना चाहते थे ताकि भारत के सभी गांव स्वच्छ, साफ-सुथरे हों। वे अपने लेखों के जरिये बार-बार इन बातों की तरफ ग्रामवासियों का ध्यान आकृष्ट करते रहे। मई 1936 के ‘हरिजन' में उन्होंने लिखा- ‘हमें गांवों को अपने चंगुल में जकड़ रखने वाली जिस त्रिविध बीमारी का इलाज करना है, वह इस प्रकार है (1) सार्वजनिक स्वच्छता की कमी (2) पर्याप्त और पोषक आहार की कमी (3) ग्रामवासियों की जड़ता।' गांवों को इस जहालत से उबारने में वे शहरवासियों का सहयोग भी वांछनीय समझते थे। गांधीजी यह भी चाहते थे कि प्रत्येक गांव अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के मामले में स्वावलंबी हो तभी वहां सच्चा ग्राम-स्वराज्य कायम हो सकता है। इसके लिए उन्होंने इस बात पर भी बल दिया कि जमीन पर अधिकार जमींदारों का नहीं होगा, बल्कि जो उसे जोतेगा वही उसका मालिक होगा। इसके अतिरिक्त, उन्होंने ग्रामोद्योग की उन्नति के लिए कुटीर उद्योगों को बढ़ाने पर बल दिया जिसमें उनके द्वारा चरखा तथा खादी का प्रचार शामिल था। गांधी का मानना था कि चरखे के जरिये ग्रामवासी अपने खाली समय का सदुपयोग कर वस्त्र के मामले में स्वावलंबी हो सकते हैं। ग्रामोद्योगों की प्रगति के लिए ही उन्होंने मशीनों के बजाय हाथ-पैर के श्रम पर आधारित उद्योगों को बढ़ाने पर जोर दिया।

 

 


 
यह कहने में तनिक असंगति नहीं कि दक्षिण अफ्रीका से भारत आने के बाद गांधीजी ने कमर तक धोती पहनने तथा कमर का ऊपरी हिस्सा उघारे रखने का जो लिबास अपनाया, वह यहां के ग्रामवासियों के पहनावे के ही अनुरूप था, क्योंकि तब अधिकतर किसान गर्मी-बरसात में कमर से ऊपर उघारे देह ही रहते थे। यही नहीं, गांवों में आवास वहां पर उपलब्ध मिट्टी, बांस, लकड़ी, खर-पतवार, खपड़ा आदि से निर्मित होते थे। गांधीजी ने यही मकान-निर्माण की तकनीकी अपने आश्रमों को बनाने में अपनाई। दक्षिण अफ्रीका के फीनिक्स, टॉल्सटॉय आश्रम से लेकर भारत में साबरमती, सेवाग्राम जैसे आश्रमों का निर्माण स्थानीय स्तर पर उपलब्ध बांस, लकड़ी, खपड़ा आदि से ही कराया।

 

 


 
इस प्रकार गांधी जहां गांवों की खराबियों को दूर कर उन्हें सुंदर, स्वच्छ बनाना अपना कर्तव्य समझते थे, वहीं वे ग्रामवासियों की जीवन शैली से भी सात्त्विक, आध्यात्मिक जीवन-सूत्र सीखने को वांछनीय समझते थे। दुर्भाग्यवश आजाद भारत गांवों तथा किसानों के संदर्भ में गांधी के सरोकार व सीख से न केवल विमुख होता गया, बल्कि शनै:-शनै: वह गांवों तथा किसानों को उजाड़ने, तबाह करने में मुब्तिला रहा है।गांधी के विचारों और सोच के निर्माण में देश-विदेश के अनेक विचारकों, कवियों, लेखकों के साथ-साथ उनके अपने जीवनानुभवों का भी बहुत बड़ा हाथ रहा। इन जीवनानुभवों में अत्यंत महत्त्वपूर्ण रहा भारत में गांवों तथा किसानों के संबंध में उनके अनुभव। यह दीगर बात है कि उनके विचारों तथा कार्यों के मूल्यांकन के संदर्भ में इस पक्ष पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है।
सर्वविदित है कि दक्षिण अफ्रीका में रहते हुए वहां रंग-भेद के खिलाफ गांधी ने संघर्ष के लिए सत्याग्रह जैसे अस्त्र का आविष्कार किया, पर इस सत्याग्रह की सफलता का भरोसा बहुत हद तक उन्हें भारत के किसानों की जीवन शैली से प्राप्त हुआ था। सत्याग्रह में जिस साहस को वे आवश्यक मानते थे, वह उन्हें शहरी लोगों में नहीं, बल्कि किसानों के जीवन में मूर्तिमान रूप में दिखाई पड़ता था। ह्यहिंद स्वराजह्ण में वे स्पष्ट शब्दों में कहते हैं- मैं आपसे यकीनन कहता हूं कि खेतों में हमारे किसान आज भी निर्भय होकर सोते हैं, जबकि अंग्रेज और आप वहां सोने के लिए आनाकानी करेंगे।... किसान किसी के तलवार-बल के बस न तो कभी हुए हैं और न होंगे। वे तलवार चलाना नहीं जानते, न किसी की तलवार से वे डरते हैं। वे मौत को हमेशा अपना तकिया बना कर सोनेवाली महान प्रजा हैं। उन्होंने मौत का डर छोड़ दिया है। ...बात यह है कि किसानों ने, प्रजा मंडलों ने अपने और राज्य के कारोबार में सत्याग्रह को काम में लिया है। जब राजा जुल्म करता है तब प्रजा रूठती है। यह सत्याग्रह ही है।गांधी जहां अपने सत्याग्रह की सफलता के लिए किसानों जैसा साहस, मौत से न डरने का जज्बा वांछनीय समझते थे, वहीं देश की आजादी हासिल करने में भी किसानों की महती भूमिका स्वीकार करते थे। छह फरवरी 1916 को काशी हिंदू विश्वविद्यालय के उद्घाटन-समारोह में गांधी ने जो ऐतिहासिक भाषण दिया था, उसमें उन्होंने दो टूक कहा था- ह्यमैं जब कभी यह सुनता हूं कि कहीं कोई बड़ा भवन उठाया जा रहा है, तो मेरा मन दुखी हो जाता है और मैं सोचने लगता हूं यह पैसा तो किसानों के पास से इकट्ठा किया गया पैसा है। यदि हम इनके परिश्रम की सारी कमाई दूसरों को उठा कर ले जाने दें तो कैसे कहा जा सकता है कि स्वराज्य की कोई भी भावना हमारे मन में है। हमें आजादी किसानों के बिना नहीं मिल सकती। आजादी वकील, डॉक्टर या संपन्न जमींदारों के वश की बात नहीं है।ह्ण वस्तुत: किसानों के प्रति यही हमदर्दी गांधी को चंपारण के गांवों तक खींच ले गई जहां के किसान अंग्रेज नीलहे जमींदारों के दमन से त्रस्त थे। अप्रैल 1917 में चंपारण पहुंच कर गांधी ने नीलहे जमींदारों के स्वेच्छाचार के खिलाफ सत्याग्रह करके वहां के किसानों को ह्यतीन कठिया प्रथाह्ण के शोषण-चक्र से छुटकारा दिलाया।

 

 


 
1920 से गांधीजी ने पूरे देश के स्वराज्य के लिए असहयोग, सविनय अवज्ञा जैसे जो आंदोलन चलाए, उनके पीछे भी उनका मुख्य उद््देश्य रहा गांवों तथा किसानों का पुनरुद्धार करना, क्योंकि उनका मानना था कि भारत अपने सात लाख गांवों में बसता है, न कि चंद शहरों में। यही कारण था कि जहां वे एक तरफ राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन तथा अपने रचनात्मक कार्यक्रमों को उत्तरोत्तर व्यापक व असरदार बनाने में पूरे दम-खम के साथ लगे रहे, वहीं उनका गांवों से लगाव प्रगाढ़ होता गया। यही कारण था कि वे 1933 में अहमदाबाद के साबरमती आश्रम को छोड़ वर्धा आ गए और 1936 में वर्धा से कुछेक मील की दूरी पर सेगांव नामक गांव में आकर आश्रम बना कर रहने लगे। बाद में इस ह्यसेगांवह्ण का ही नामकरण सेवाग्राम कर दिया गया जो निपट गंवई इलाका था।सेवाग्राम में बसने के पीछे गांधी ने जो कारण बताए थे, वे गांवों से उनके गहरे लगाव को समझने में बहुत सहायक हैं। ह्यगांधी-मार्गह्ण पत्रिका के नवंबर-दिसंबर 2016 अंक में छपे लेख में कनकमल गांधी ने बताया है कि सेवाग्राम आते ही शाम की प्रार्थना में बापू ने बताया कि हमारी दृष्टि देहली की ओर से उलट कर देहात की ओर होनी चाहिए। देहात हमारा कल्पवृक्ष है। मेरे सेगांव में आ बसने का तात्कालिक उद््देश्य तो यह है कि मैं अपनी सामर्थ्य-भर गांवों में व्याप्त भयंकर अज्ञान और दरिद्रता को और उससे भी भयंकर बाहरी गंदगी को दूर कर सकूं। सच तो यह है कि ये तीनों बुराइयां एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं। हम गांवों में फैले हुए इस अज्ञान को मुंह से अक्षर-ज्ञान करा कर नहीं, बल्कि लोगों के समक्ष सफाई का आदर्श-पाठ प्रस्तुत करके, उन्हें दुनिया में क्या कुछ हो रहा है, इसकी जानकारी देकर और इसी तरह के दूसरे उपायों से दूर करना चाहते हैं।

 

 


 
पर इससे यह नहीं समझना चाहिए कि गांधीजी सिर्फ सेगांव को इन बुराइयों से मुक्त करना चाहते थे, वस्तुत: वे उसे समस्त गांवों के समक्ष एक मॉडल के रूप में प्रस्तुत करना चाहते थे ताकि भारत के सभी गांव स्वच्छ, साफ-सुथरे हों। वे अपने लेखों के जरिये बार-बार इन बातों की तरफ ग्रामवासियों का ध्यान आकृष्ट करते रहे। मई 1936 के ह्यहरिजनह्ण में उन्होंने लिखा- ह्यहमें गांवों को अपने चंगुल में जकड़ रखने वाली जिस त्रिविध बीमारी का इलाज करना है, वह इस प्रकार है (1) सार्वजनिक स्वच्छता की कमी (2) पर्याप्त और पोषक आहार की कमी (3) ग्रामवासियों की जड़ता।ह्ण गांवों को इस जहालत से उबारने में वे शहरवासियों का सहयोग भी वांछनीय समझते थे। गांधीजी यह भी चाहते थे कि प्रत्येक गांव अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के मामले में स्वावलंबी हो तभी वहां सच्चा ग्राम-स्वराज्य कायम हो सकता है। इसके लिए उन्होंने इस बात पर भी बल दिया कि जमीन पर अधिकार जमींदारों का नहीं होगा, बल्कि जो उसे जोतेगा वही उसका मालिक होगा। इसके अतिरिक्त, उन्होंने ग्रामोद्योग की उन्नति के लिए कुटीर उद्योगों को बढ़ाने पर बल दिया जिसमें उनके द्वारा चरखा तथा खादी का प्रचार शामिल था। गांधी का मानना था कि चरखे के जरिये ग्रामवासी अपने खाली समय का सदुपयोग कर वस्त्र के मामले में स्वावलंबी हो सकते हैं। ग्रामोद्योगों की प्रगति के लिए ही उन्होंने मशीनों के बजाय हाथ-पैर के श्रम पर आधारित उद्योगों को बढ़ाने पर जोर दिया।

 

 


 
यह कहने में तनिक असंगति नहीं कि दक्षिण अफ्रीका से भारत आने के बाद गांधीजी ने कमर तक धोती पहनने तथा कमर का ऊपरी हिस्सा उघारे रखने का जो लिबास अपनाया, वह यहां के ग्रामवासियों के पहनावे के ही अनुरूप था, क्योंकि तब अधिकतर किसान गर्मी-बरसात में कमर से ऊपर उघारे देह ही रहते थे। यही नहीं, गांवों में आवास वहां पर उपलब्ध मिट्टी, बांस, लकड़ी, खर-पतवार, खपड़ा आदि से निर्मित होते थे। गांधीजी ने यही मकान-निर्माण की तकनीकी अपने आश्रमों को बनाने में अपनाई। दक्षिण अफ्रीका के फीनिक्स, टॉल्सटॉय आश्रम से लेकर भारत में साबरमती, सेवाग्राम जैसे आश्रमों का निर्माण स्थानीय स्तर पर उपलब्ध बांस, लकड़ी, खपड़ा आदि से ही कराया।
 
 
इस प्रकार गांधी जहां गांवों की खराबियों को दूर कर उन्हें सुंदर, स्वच्छ बनाना अपना कर्तव्य समझते थे, वहीं वे ग्रामवासियों की जीवन शैली से भी सात्त्विक, आध्यात्मिक जीवन-सूत्र सीखने को वांछनीय समझते थे। दुर्भाग्यवश आजाद भारत गांवों तथा किसानों के संदर्भ में गांधी के सरोकार व सीख से न केवल विमुख होता गया, बल्कि शनै:-शनै: वह गांवों तथा किसानों को उजाड़ने, तबाह करने में मुब्तिला रहा है।