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गुजरात मॉडल का सच- कुमार प्रशांत

जनसत्ता 16 अप्रैल, 2013:नरेंद्र मोदी बार-बार प्रशासन की उस शैली की बात कहते रहे जिसे वे गुजरात-मॉडल का नाम देते हैं। क्या है यह गुजरात मॉडल? वे तीसरी बार मुख्यमंत्री बने हैं और इस लंबे दौर में एकदम निर्द्वंद्व सत्ता उनके हाथ में रही है। पहले दौर में उनकी प्रशासनिक शैली की एकमात्र उपलब्धि रही कि समाज के अल्पसंख्यकों और असहमत लोगों को डरा-धमका और मार डाल कर एकदम हाशिए पर पहुंचा दिया जाए ताकि कोई पथ-बाधा बचे ही नहीं। हमने मान लिया कि यह मोदी-मॉडल का एक तत्त्व है।
दूसरा तत्त्व क्या है? जब मोदी बार-बार कहते हैं कि उन्होंने प्रशासनिक ढांचे में कई तरह के सुधार किए हैं तो हम सच्चाई जाने बगैर उसे सही मान लेते हैं, और फिर पूछते हैं उनसे कि गुजरात तो देश के सबसे तथाकथित उन्नत राज्यों में एक था ही, फिर उसके साथ मोदी पिछले दस सालों से कर क्या रहे हैं? भयंकर किस्म के सामाजिक अपराध, तस्करी, अवैध शराब, दबंग जातियों का वर्चस्व, चिमनभाई पटेल मार्का राजनीति और फिर भाजपा मार्का सांप्रदायिक राजनीति से अलग, मोदी-मॉडल में क्या-क्या है, हम जानना चाहें तो क्या जवाब है?
मोदी ने जवाब दिया और कुछ इस तरह दिया मानो सबको लाजवाब ही कर दिया! उन्होंने कहा कि हम इतने वर्षों तक कांग्रेस के बनाए गड्ढे भर रहे थे, गुजरात का भव्य-दिव्य नवनिर्माण तो अब शुरू होगा! मोदी की मानें तो कांग्रेसियों की, गड्ढे करने की क्षमता का कायल होना पड़ेगा। लेकिन गुजरात ही नहीं, कांग्रेसियों की इस क्षमता का प्रमाण तो सारा देश है! लेकिन क्या इसी सिक्के का दूसरा पहलू यह नहीं है कि मोदी-मॉडल गड्ढे भरने से ज्यादा कुछ नहीं कर सकता है?
मोदी खुद कह रहे हैं कि गुजरात में हमने नया कुछ भी नहीं किया है क्योंकि सारा समय गड्ढे भरने में गया! तब फिर किस मॉडल की बात सारे देश में की जा रही है? यह तो वही घिसा-पिटा, राजनीतिक-प्रशासनिक अकुशलता को छिपाने का मॉडल है जो अपने से पहले के शासन पर, अगर वह दूसरे दल का शासन था तब तो ज्यादा आसानी से दोष मढ़ कर अपनी पीठ थपथपाता है। मनमोहन सिंह सरकार के लोग भी इसी मॉडल का सहारा लेकर सारी गड़बड़ियों का ठीकरा आज तक अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार पर फोड़ते हैं; और हम पाते हैं कि मॉडल चाहे किसी का भी हो, असल में उसका ठीकरा तो हमारे ही सिर फूटता रहा है।
मोदी गुजरात में और नीतीश कुमार बिहार में करीब-करीब साथ ही आए। अगर मॉडल की भाषा में बात करें तो गुजरात में मोदी-मॉडल, बिहार में नीतीश-मॉडल काम कर रहा है। नीतीश से पहले बिहार में लालू यादव का एकछत्र राज रहा और उन्होंने अपने लंबे शासनकाल में जो किया उसे नीतीश जंगल-राज कहते हैं। मतलब यह कि नीतीश को विरासत में गड््ढे नहीं, ज्वालामुखी से बने गह्वर मिले! अब हम देखें कि बिहार में नीतीश-मॉडल ने और उसी अवधि में गुजरात में मोदी-मॉडल ने क्या हासिल किया है। विकास के आज जितने भी प्रतिमान माने जाते हैं उन सभी को जांचें तो पाएंगे कि नीतीश-मॉडल ने बिहार में, मोदी-मॉडल के गुजरात से कहीं ज्यादा उपलब्धियां हासिल की हैं।
गुजरात की तरह बिहार में नीतीश एकमात्र नहीं हैं। उनका भाजपा के साथ गठबंधन है और सुशील मोदी जैसा काबिल आदमी उनके साथ है। फिर भी अगर बिहार इस बात का उदाहरण बना हुआ है कि गठबंधन की सरकार कैसे चलाई जाती है तो इसमें नीतीश-मॉडल का हाथ है। बिहार में अपना मॉडल चलाने के लिए नीतीश को जरूरत नहीं पड़ी कि बिहार के सामाजिक समीकरण का क्रूर ध्रुवीकरण किया जाए। उन्होंने बिहार में खुलेपन का और बराबरी का माहौल बनाए ही नहीं रखा है बल्कि उसकी पहरेदारी भी की है।
भूमि अधिग्रहण का सवाल आज किसी भी सरकार के लिए कड़ा इम्तहान बन गया है। सारे देश में किसान इस एक सवाल को लेकर जितने अशांत है, उतना किसी भी दूसरे सवाल पर नहीं। पश्चिम बंगाल में मार्क्सवादी बड़ी कीमत चुका कर यह सीख पाए हैं कि मेहनतकश वर्ग किसी का गुलाम नहीं होता- उनका भी नहीं, जो उसके लिए काम करने का दावा करते हैं। ममता बनर्जी भी अब उसी आंच में तपने लगी हैं। नरेंद्र मोदी गुजरात में इस सवाल पर जो कर रहे हैं वह बुद्धदेव भट्टाचार्य से अलग क्या है? गुजरात में किसानों की जमीन का सौदा, सरकार की दलाली में कॉरपोरेट के लिए किया जा रहा है। कॉरपोरेट का चेहरा कहीं अदानी का है, कहीं अंबानी का, कहीं टाटा का तो कहीं किसी दूसरे का, लेकिन दलाल का चेहरा सब जगह एक ही है- मोदी मॉडल!
बंगाल और गुजरात में फर्क है तो यह कि मोदी के यहां किसानों की कोई जागरूक-संगठित ताकत नहीं है। चालाकी और दमन के सहारे मोदी किसानों से निबट रहे हैं और उम्र का नौवां दशक पार कर रहे सर्वोदय के चुन्नी भाई वैद्य अपने मन-प्राणों का पूरा बल लगा कर, उसका मुकाबला कर रहे हैं। ऐसे मुकाबलों में हार-जीत नहीं होती, संघर्ष की विरासत होती है जो चुन्नी भाई जैसों को गांधी-विनोबा-जयप्रकाश से मिली है और वे जिसे अगली पीढ़ी को सौंपने में लगे हैं। ऐसे में मोदी किस मुंह से कहते हैं कि औद्योगिक विकास, कृषि की कीमत पर नहीं होना चाहिए। यह तो वही निरर्थक जुमला है जो मनमोहन सिंह भी बोलते हैं।

पिछले दिनों गुजरात के सौराष्ट्र के इलाके में मैं था और देखा कि वहां पानी की कैसी किल्लत है। कहां-कहां से पानी जुटा रहे हैं लोग! पिछले साल भी बारिश ने धोखा दिया और इस साल भी आसार अच्छे नहीं हैं। लेकिन बारह सालों में मोदी-मॉडल ने इस समस्या के बारे में क्या किया? मैंने देखा कि वहां दलितों को पानी की कमी से भी और अगड़ी जातियों के दुर्व्यवहार से भी जूझना पड़ता है। मोदी कहते हैं कि गुजरात के हर गांव में चौबीसो घंटे बिजली रहती है, लेकिन सौराष्ट्र के गांवों में ऐसा नहीं मिला। कस्बों में बिजली बराबर जाती है और गांवों में किसान बिजली के लिए परेशान रहते हैं। नर्मदा का पानी कहां-कहां पहुंचा है और किन-किन को मिल रहा है, कभी इसका हिसाब भी तो किया जाए!
अब कुछ वैसी बातें, जिन्हें मोदी ने इस तरह कहा जैसे वे कोई मार्के की बात कह रहे हों लेकिन उनमें सार बहुत नहीं था। जैसे यह कि देश के एक-एक राज्य के जिम्मे दुनिया के एक-एक देश कर देने चािहए ताकि हम सारी दुनिया को संभाल लें। क्या सच में मोदी जब प्रधानमंत्री बनेंगे तब देश को वे संभालेंगे और दुनिया को राज्यों के भरोसे छोड़ देंगे? अब भी हम देख तो रहे हैं कि अपने एक पड़ोसी देश श्रीलंका को हमने तमिलनाडु के जिम्मे छोड़ दिया है! मोदी सरीखे वहां के सारे राजनीतिक अपने चुनावी हित के आगे राष्ट्रीय हित की बलि चढ़ा रहे हैं।
अपनी बात को गहरी समझ का आधार देते हुए मोदी ने कहा कि अब दुनिया में युद्ध, कूटनीति जैसी कोई बात तो बची नहीं है, दो देशों के बीच आज जो भी बचा है वह है व्यापार। तो व्यापार आदि के लिए विदेश विभाग का इतना बड़ा तामझाम क्यों चाहिए? क्या मोदी के इस ‘गंभीर\' चिंतन से भाजपा सहमत है? परिस्थिति का सरलीकरण करने से परिस्थति सरल नहीं हो जाती! क्या मोदी समेत भाजपा को यह समझने की जरूरत नहीं है कि आज राजनीति व्यापार-धंधे की पोशाक पहन कर सामने आती है?
वह वक्त बीत गया जब साम्राज्यवाद के विकास के लिए उपनिवेश बनाने पड़ते थे और उसके लिए जरूरी होता था कि आप अपनी फौज लेकर सशरीर वहां उपस्थित हों। आज उसकी जरूरत नहीं रही है। आपकी पूंजी और आपका माल जहां पहुंचता है वहीं आपका उपनिवेश बन जाता है।
पहले विदेश नीति अलग और उद्योग-व्यापार की नीति अलग आधार पर चलती थी। आज दोनों गड्डमड््ड हो गए हैं। इसलिए आज जरूरी यह है कि सरकार और प्रशासन दोनों स्तर पर, राजनीति और व्यापार की गहरी समझ हो और दोनों को साथ लेकर चलने का नाजुक संतुलन बनाया जाए। स्थिति पहले से आसान नहीं, जटिल हुई है। इसलिए आर-पार की लड़ाई की धमकी देने वाले अटल बिहारी वाजपेयी भी कभी लड़ाई छेड़ नहीं सके!
ऐसी ही मोदी की यह बात भी है कि हमें गुजरात के साथ लगने वाली पाकिस्तानी सीमा पर सौर ऊर्जा के संयंत्र लगा देने चाहिए। मोदी कहते हैं कि इससे सीमा की सुरक्षा भी हो जाएगी और हमें बिजली भी मिलने लगेगी। क्या ऐसे सुझावों के पीछे सिर्फ यह बताने की चालाकी है कि हमारे पास विकल्प भी हैं और योजनाएं भी? या कि सच में इन्हें नहीं सूझता कि अंतरराष्ट्रीय सीमाओं की सुरक्षा इस तरह नहीं की जा सकती कि हमारी फौजें दुश्मन पर भी नजर रखें और सौर ऊर्जा के संयंत्रों पर भी!
फिर रोज ही यह खेल होगा कि कभी यहां तो कभी वहां दुश्मन ने कोई छोटा हथगोला ही फेंक दिया और करोड़ों का संयंत्र जल गया और बिजली गुल हो गई तो अंधेरे का फायदा उठा कर कई आतंकवादी भीतर घुस आए! ऐसा सोच बचकाना ही नहीं, बहुत खतरनाक भी है। मोदी चाहें तो भाजपा के पूर्व फौजी जसवंत सिंह से बात कर लें; या फिर खंडूड़ी साहब से! ये दोनों अगर सहमत हों तो गुजरात से ही यह प्रयोग शुरू हो, और फिर अपने सहयोगी प्रकाश सिंह बादल के पंजाब में मोदी इसे करें! करना तो दूर, करने की कोशिश में ही इन्हें समझ में आ जाएगा कि यह व्यर्थ की लफ्फाजी है।
मुझे लगता है कि राष्ट्रीय मंच पर मोदी का यह अवतरण उन्हें भी और भाजपा को भी बहुत उलटी स्थिति में डाल गया है। दोनों की छवि को नुकसान हुआ है। पप्पू और फेंकू वाले स्तर से इसे देखें तो कहना होगा कि राहुल गांधी ने पप्पू की अपनी छवि को एक नए रंग से देखने पर हमें मजबूर किया है और हमें लगता है कि वे प्रधानमंत्री बनें या न बनें, परिपक्व जरूर हो रहे हैं। नरेंद्र मोदी ने इन सारे आयोजनों में, फेंकू की अपनी छवि को पक्का किया है। अब अपनी पार्टी में, गठबंधन में और फिर देश में उन्हें गंभीर नेता के रूप में मान्यता मिले, यह ज्यादा कठिन हो गया है। (समाप्त)