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गुजरात: वनवासी कल्याण के लिए 15 हजार करोड़

नई दिल्ली [जागरण ब्यूरो]। सदियों से वनों में निवास करने वाली जनजातियों को वनभूमि पर मालिकाना हक देने के केंद्र सरकार के कानून की तरफदारी करते हुए गुजरात सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि वह वनवासियों के कल्याण पर 15 हजार करोड़ रुपये खर्च कर रही है। यही नहीं, राज्य सरकार ने वनों में निवास करने वाले जनजातीय लोगों को जनस्वास्थ्य सुविधा, शिक्षा, अधिकार, स्वच्छता और अनाज वितरण की सरकारी योजना [पीडीएस] का लाभ देने की प्रतिबद्धता जताते हुए 2012 तक उनकी आय दोगुनी करने के लक्ष्य की भी बात कही है।

गुजरात सरकार ने यह बातें सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में कही हैं। यह हलफनामा बांबे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी व अन्य की ओर से दाखिल जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट से जारी नोटिस के जवाब में दाखिल किया गया है। याचिका में संसद के कानून बनाने के अधिकार पर सवाल उठाते हुए इसके कई प्रावधानों को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गई है।

हलफनामे में गुजरात सरकार ने कहा है कि कानून में कोई खामी नहीं है और संसद ऐसा कानून बनाने में सक्षम है। 1976 में किए गए संविधान के 42वें संशोधन के बाद से 'वन' संविधान की समवर्ती सूची में शामिल हो गया है। केंद्र सरकार को राज्यों से सहमति के बाद इस मुद्दे पर कानून बनाने का हक है। यह कानून 13 दिसंबर 2005 से पहले वन भूमि पर कब्जा रखने वाले वनवासियों या जनजातियों को वन भूमि पर मालिकाना हक देता है।

गुजरात सरकार इस केंद्रीय कानून का पालन करती है। कानून को गंभीरता से लागू करने के लिए राज्य सरकार ने बजट का करीब 14.8 फीसदी हिस्सा जनजातीय विकास के लिए निश्चित किया है। वनवासियों की सुविधाएं बढ़ाने और जनजातीय व बाकी जनता के बीच का अंतर समाप्त करने के लिए राज्य सरकार वनबंधुआ कल्याण योजना के तहत जनजातीय क्षेत्र विकास पर 15 हजार करोड़ रुपये खर्च कर रही है। इस योजना का लक्ष्य वर्ष 2012 तक जनजातीय लोगों की आय दोगुना करना है। राज्य सरकार ने जनजातियों के कल्याण के लिए जनस्वास्थ्य, स्वच्छता, सार्वजनिक वितरण प्रणाली की योजनाएं लागू करने की प्रतिबद्धता भी जताई है। सरकार ने अदालत से अनुरोध किया है कि कानून को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी जाए।