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गोलवलकर की किताब के बहाने-- रामचंद्र गुहा

बेंगलुरु किताबों का शहर नहीं है। फिर भी यह मेरा शहर ही है, जहां से करीब 50 साल पहले एक किताब छपी थी, जिसे भारतीय समाज और राजनीति के हर विद्यार्थी को अनिवार्य रूप से पढ़ना चाहिए। यह किताब थी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक एमएस गोलवलकर की बंच ऑफ थॉट्स, जिन्होंने संघ को न सिर्फ 30 वर्ष से ज्यादा वक्त तक नेतृत्व दिया, बल्कि आज भी संघ के लिए मुख्य नीति-निर्धारक और मार्गदर्शक बने हुए हैं। संघ का कोई भी आयोजन बिना गोलवलकर के चित्र के पूरा नहीं माना जाता। गोलवलकर के लेखों और भाषणों के संग्रह बंच ऑफ थॉट्स का पहला प्रकाशन 1966 में विक्रम प्रकाशन, कामराजपेट (बेंगलुरु) से हुआ था। मैंने इसे पहली बार लगभग 20 साल पहले और दोबारा अभी हाल ही में पढ़ा।

हाल में इसलिए भी जरूरी लगा कि इस वक्त केंद्र में पूर्ण बहुमत वाली ऐसी सरकार है, जो गोलवलकर से बहुत ज्यादा प्रभावित है। ऐसे समय में, जब भाजपा के ज्यादातर बड़े नेता संघ की छत्रछाया में पले-पढ़े हों और पार्टी खुद को गोलवलकर से न सिर्फ प्रभावित, बल्कि ऋणी महसूस करती हो, गोलवलकर की बंच ऑफ थॉट्स की वर्तमान संदर्भों में प्रासंगिकता बढ़ जाती है। कहना न होगा कि बंच ऑफ थॉट्स हिंदुत्ववादियों के लिए वही स्थान रखता है, जो स्थान सच्चे ईसाई के लिए बाइबिल, सच्चे मुसलमान के लिए कुरान और सच्चे कम्युनिस्टों के लिए कम्युनिस्ट मैनीफेस्टो का है। अब ऐसे हिंदुत्ववादी, जिन्होंने गोलवलकर को पढ़ा भले ही न हो, वे भी अपने नेताओं से सुनकर ही सही, उनके संदेशों और भावनाओं को आत्मसात करते दिखाई देते हैं।

बंच ऑफ थॉट्स का केंद्रीय भाव कहता है कि हिंदू अविभाज्य हैं और हमेशा रहे हैं। गोलवलकर कहते हैं कि हिंदू समाज का विकास जिस व्यापक तरीके से एक सूत्र में पिरोया हुआ दिखता है, वह किसी को भी हतप्रभ करता है। उनका मानना है कि हिंदू समाज को एकता के सूत्र में पिरोने वाले इस धागे को कभी ठीक से परिभाषित नहीं किया गया। बल्कि बड़े ही सरलीकृत तरीके से यह मान लिया गया कि न कभी हिंदू एक थे, न कभी भारत देश एक था। गोलवलकर मानते हैं कि तमाम विपरीत हालात के बावजदू हिंदू आज भी विश्व को नेतृत्व और दिशा देने की क्षमता रखता है। वह यह भी मानते हैं कि हिंदुओं को यह ईश्वरीय वरदान है कि हिंदू ही विश्व को राह दिखाएगा। गोलवलकर यहीं नहीं ठहरते और स्थापना देते हैं कि यदि यह तय है कि हिंदुओं के भाग्य में विश्व का नेतृत्व करना लिखा है, तो यह भी उतना ही बड़ा सच है कि संघ ही हिंदुओं का नेतृत्व करेगा।

यहां सवाल यह उठता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का यह शीर्ष विचारक धर्म को हिंदुत्व से अलग कैसे मानता है? गोलवलकर बौद्ध धर्म की तारीफ करते हैं, लेकिन इसके अनुयायियों की यह कहकर निंदा करते हैं कि इन लोगों ने हमारी सदियों पुरानी परंपराओं की जड़ें खोदने का काम किया। हमारे सांस्कृतिक मूल्यों को ध्वस्त किया। अपनी व्याख्याओं के साथ वह मानते हैं कि बौद्धों ने ‘मातृ समाज' और ‘मातृ धर्म' के प्रति गद्दारी की और ऐसा करने वाले भारतीय बौद्ध देशभक्त नहीं हो सकते।

गोलवलकर ने 1950 और 1960 के दौर में यह सब लिखा था। यह वही वक्त था, जब बाबा साहब अंबेडकर बौद्ध धर्म अपना रहे थे। सवाल उठता है कि ऐसे में गोलवलकर ऐसी स्थापना कैसे दे सकते हैं? क्या वह अंबेडकर को ‘मातृ समाज' और ‘मातृ धर्म' के प्रति गद्दार मानते थे? बंच ऑफ थॉट्स में इन सवालों के जवाब नहीं मिलते। यह किताब अंबेडकर के दलित उभार और उन्हें आजादी देने की बात की चर्चा आमतौर पर नहीं करती। गोलवलकर पुरजोर तरीके से वकालत करते हैं कि यह जाति व्यवस्था ही थी, जिसने देश के पैमाने पर हिंदुओं को एकसूत्र में बांधने और एकजुट रखने का काम किया। वह लिखते हैं कि ‘एक तरफ तथाकथित ‘जाति ग्रस्त' हिंदू समाज जहां सदियों से यूनानियों, शकों, हूणों, मुसलमानों, यहां तक कि यूरोपीय देशों के अत्याचार के बावजूद अजेय और अमर रहा, वहीं तमाम तथाकथित जाति-विहीन समाज कभी न उठ पाने की हद तक धूलधूसरित हो गए।'

गोलवलकर अपनी किताब में जाति की चर्चा सिर्फ वर्ण-व्यवस्था को पुष्पित-पल्लवित करने के लिए करते हैं, लेकिन इसमें लैंगिक विभेद पर कोई बात नहीं दिखती। किताब हिंदू समाज में दलितों और महिलाओं के दमन पर कुछ नहीं कहती, लेकिन गोलवलकर भारतीय मुसलमानों और ईसाइयों को बुरी तरह संदेह की नजर से देखते हैं। वह कहते हैं,‘उनके बारे में क्या कहा जाए, जिन्होंने धर्म-परिवर्तन कर ईसाइयत या इस्लाम स्वीकार किया है। वे इसी धरती पर पैदा तो हुए हैं, लेकिन क्या इसके नमक का हक भी अदा करते हैं? क्या वे इस धरती के प्रति एहसानमंद हैं, जिसने उन्हें यहां तक पहुंचाया? क्या वे मानते हैं कि वे इसी पवित्र धरती के पुत्र हैं और यह उनका सौभाग्य होगा कि वे इसकी सेवा करें? क्या वे इस धरती की सेवा अपना कर्तव्य मानते हैं? नहीं, उनके धर्म-परिवर्तन के साथ ही देश के प्रति उनका प्यार और समर्पण खत्म हो चुका है।' यहां गोलवलकर और 19वीं तथा 20वीं सदी में यूरोप के कट्टर यहूदी विरोधियों की बातों में काफी साम्य दिखता है।

यह बताने की जरूरत नहीं कि फ्रांसीसी, जर्मन और ब्रिटिश अपने देशों के यहूदियों के बारे में ऐसा ही सोचते थे। गोलवलकर मानते थे कि ‘हर हिंदू का यह धर्म है कि वह हमारी सदियों पुरानी पवित्र, अजेय और भलाई करने वाले हिंदू राष्ट्रवाद की परंपरा के लिए काम करे।' अब जरा इसकी तुलना में गांधी जी की बात भी देख लें। गांधी की नजर में ‘हर हिंदू का धर्म है कि वह छुआछूत मिटाने और स्त्रियों का दमन खत्म करने की दिशा में काम करे। हर भारतीय का धर्म है कि वह विभिन्न धर्मों के बीच सौहार्द के लिए काम करे।' अब ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक हो जाता है कि क्या हिंदू या भारतीय होने की दो अलग-अलग शर्तें हो सकती हैं? क्योंकि दोनों विचार मौलिक रूप से एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत हैं।

गोलवलकर लोकतंत्र को यह कहकर खारिज करते हैं कि यह व्यक्ति को अनावश्यक आजादी देता है। अब नरेंद्र मोदी भले ही शपथ लेते हुए भारतीय संविधान में आस्था जताएं कि वही उनकी एकमात्र ‘पवित्र पुस्तक' है, लेकिन उनके गुरु गोलवलकर तो यही मानते थे (किताब के अनुसार) कि भारतीय संविधान विसंगतियों से भरा हुआ है और इसे या तो रद्द कर देना चाहिए या कम से कम फिर से लिखा जाना चाहिए।' गोलवलकर भारत के संघीय ढांचे के गठन की बात से भी नाराज थे और एक पूरी तरह सशक्त केंद्रीय सत्ता के पक्ष में थे। संभव है कि आज नरेंद्र मोदी सहकारी संघवाद की खूबियों की बात करें, लेकिन उनके गुरु गोलवलकर तो बहुत पहले लिख गए हैं कि ‘संघीय ढांचे के विचार को ही जलाकर गहरे दफन कर देना चाहिए।'