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ग्राम सभाओं की जरूरत-- डा. अनुज लुगुन

आम बजट में सरकार ने देश की अर्थव्यवस्था को पांच ट्रिलियन डॉलर बनाने का लक्ष्य रखा है. बजट पर अर्थशास्त्रियों के अपने-अपने मत हैं. बीबीसी की वेबसाइट में प्रकाशित एक आर्थिक विश्लेषण में कहा गया कि अर्थव्यवस्था कहां होगी और अर्थव्यवस्था में कौन कहां होगा, ये दो अलग-अलग और महत्वपूर्ण सवाल हैं.

हमारा सवाल भी यही है कि अर्थव्यवस्था में कौन कहां होगा? इस सवाल को आर्थिक से ज्यादा सामाजिक भागीदारी के नजरिये से देखा जाना चाहिए.

गांधीजी ने कहा था कि जब भी किसी काम की शुरुआत हो, तो सबसे पहले यह देखा जाना चाहिए कि उससे समाज के अंतिम जन का क्या हित हो रहा है? शासन में अंतिम जन की भागीदारी के लिए उन्होंने ग्राम स्वराज का रास्ता सुझाया. औपनिवेशिक दासता से मुक्त समाज में ग्राम सभा ही स्वराज की प्राथमिक इकाई हो सकती है.

नीति-निर्माण में स्थानीय जन या ग्राम जनों की प्रत्यक्ष भागीदारी के बिना लोकतांत्रिक होने की बात कैसे की जा सकती है? गांधीजी के स्वशासन की परिकल्पना में इसी सामाजिक भागीदारी का अनिवार्य स्थान था, लेकिन गांधीजी के ग्राम स्वराज की परिकल्पना अब भी उपेक्षित और अधूरी है. किसी लोकतांत्रिक देश के विकास का लक्ष्य क्या यह नहीं हो सकता कि उसके नीति-निर्माण में समाज के अंतिम जन की प्रत्यक्ष भागीदारी हो?

स्वराज की परिकल्पना ने ही ग्राम सभा के महत्व को बढ़ाया, लेकिन हमारे यहां ग्राम सभा और पंचायती राज को आपस में ‘अटैच' करके उसे नौकरशाहों के अधीन कर दिया गया. वर्ष 1996 में पारित पेसा (पीईएसए) कानून ने संविधान की पांचवीं अनुसूची के क्षेत्रों में ग्राम सभा के अधिकारों और शक्तियों का विस्तार किया.

यह संसदीय लोकतंत्र के चुनावी तंत्र से इस मामले में अलग और विशिष्ट था कि ग्राम सभाएं सामाजिक स्तर पर स्वयं निर्णय लेकर योजनाएं बना सकती थीं, स्थानीय बाजार का प्रबंधन कर सकती थीं और आर्थिक-प्रशासनिक प्रक्रियाओं को जारी कर सकती थीं. इस संवैधानिक अधिनियम ने ग्राम सभाओं को सबसे बड़ी शक्ति यह प्रदान की कि अनुसूचित आदिवासी क्षेत्रों में किसी भी तरह की परियोजना को लागू करने के लिए सबसे पहले ग्राम सभा से सहमति लेनी होगी. ग्राम सभा से ‘एनओसी' लिये बिना खनन आदि कोई भी परियोजना नहीं चलायी जा सकती है.

ओड़िशा के नियमगिरि में बहुराष्ट्रीय कंपनी वेदांता के खनन मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पेसा अधिनियम का हवाला देते हुए ही ग्राम सभाओं की सहमति को वैधानिक आधार माना. वहां की ग्राम सभाओं ने मिल कर एक स्वर में वेदांता के खनन का विरोध किया और परियोजना को बंद करना पड़ा.

पेसा अधिनियम द्वारा प्रदत्त ग्राम सभा और पारंपरिक आदिवासी ग्राम सभाओं के स्वरूप में भिन्नता जरूर है, लेकिन शक्ति आदिवासी समाज को ही देने की कोशिश की गयी है. अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा की मांग उठती रहती है. झारखंड के अनुसूचित (आदिवासी) क्षेत्र में पत्थलगड़ी आंदोलन की मांग का मुख्य स्वर भी ग्राम सभा द्वारा स्वशासन ही है, जिसके लिए आंदोलनकारियों पर देशद्रोह जैसे गंभीर मामले दर्ज किये गये हैं.

संवैधानिक रूप से ग्राम सभाओं को शक्ति प्रदान की गयी है, लेकिन उसके क्रियान्वयन के लिए अब तक कोई स्पष्ट रूपरेखा नहीं बनी है. अनुसूचित क्षेत्रों में पेसा अधिनियम को सफलतापूर्वक लागू करने के बजाय, उसकी शक्ति को कमजोर करने की पुरजोर कोशिश की गयी. यह कोशिश किसी और ने नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र ने की है. झारखंड में भी ग्राम सभा स्वायत्त नहीं है. पंचायती राज अधिनियम के तहत उसे अंततः नौकरशाहों के अधीन रखा गया है. ग्राम सभा की अपनी कोई आर्थिक शक्ति नहीं है और न ही उसका कोई अपना बजट है. योजनाओं में ग्राम सभा की भागीदारी केवल कागजी है. योजनाएं वही पारित होकर आती हैं, जो नौकरशाह चाहते हैं.

झारखंड में जल संरक्षण के लिए ‘डोभा' निर्माण योजना चली. एक ग्राम सभा के सदस्य ने अधिकारियों से सवाल किया कि आप लोग डोभा टंगरा (पहाड़ी) में बनाते हैं, जहां न पानी होता है, न ही वहां तक बैल-बकरी पहुंच सकते हैं. फिर ग्राम सभा से प्रखंड के अधिकारियों ने मैदान के लिए योजना पारित कराने की बात कही.

इसके लिए ग्राम सभा की लाभुक समिति का खाता भी खुलवाया गया, लेकिन आज तक मैदान नहीं बना. ग्राम सभा को पता ही नहीं कि उनकी योजना कहां चली गयी. ये कुछ छोटे उदाहरण हैं. ऐसे सैकड़ों उदाहरण भ्रष्ट नौकरशाह और सरकारी तंत्र के अधीन दबे हुए हैं, जो देश में अंतिम जन की लोकतांत्रिक भागीदारी को न केवल बाधित करते हैं, बल्कि लोकतंत्र के प्रति अविश्वास भी पैदा करते हैं.

दरअसल, ग्राम सभा और सरकारी तंत्र के बीच की टकराहट स्वायत्तता और शक्ति के बंटवारे को लेकर है. ग्राम सभा की स्वायत्तता के बिना स्वराज संभव नहीं है. ऐसे में, सवाल स्वाभाविक है कि पांच ट्रिलियन डॉलर वाली अर्थव्यवस्था में ग्राम सभा कहां होगी? नीति निर्णय नेताओं और अफसरों के होते हैं, पैसा बड़े निवेशकों और पूंजीपतियों के पास है, लेकिन जमीन और संसाधन ग्राम सभा के पास है.

संवैधानिक शक्तियां भी ग्राम सभा के पास हैं. इनके बीच जो अंतर्विरोध पैदा होगा, उसका संबंध सिर्फ आर्थिक नहीं होगा, बल्कि उससे भी बड़ा मसला लोकतंत्र में सामाजिक भागीदारी का होगा. अंतिम जन की सामाजिक भागीदारी के बिना क्या हम मजबूत अर्थव्यवस्था बन सकते हैं?