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चारा संकट की जड़ें, भाग एक: हरित क्रांति के समय से शुरू हो गई थी समस्या

डाउन टू अर्थ, 15 मई 

भारत विश्व की 20 प्रतिशत पशुधन आबादी के साथ सर्वाधिक दुग्ध उत्पादन करने वाला देश है। संयुक्त राष्ट्र के कृषि एवं खाद्य संगठन के अनुसार, यहां के 70 प्रतिशत परिवार आजीविका के लिए प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कृषि एवं इससे जुड़े व्यवसाय पर निर्भर हैं। पशुपालन आदि काल से ही मानव सभ्यता के साथ जुड़ा रहा है, परंतु पिछले कुछ सालों में चारे की बढ़ती कीमतों ने इस व्यवसाय को बुरी तरह से प्रभावित किया है। पशुपालक औने-पौने दाम पर मवेशी बेचकर दूसरे व्यवसाय की तरफ जाने को मजबूर हो रहे हैं। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय द्वारा मार्च 2023 में जारी थोक मूल्य सूचकांक के आंकड़े बताते हैं कि चारे की वार्षिक मुद्रास्फीति दर फरवरी 2023 में 24 प्रतिशत रही और यही मुद्रास्फीति दर गत नवंबर में अपने रिकॉर्ड स्तर 30.93 पर थी।

चारे की यह वार्षिक मुद्रास्फीति दर समग्र थोक मूल्य सूचकांक में मुद्रास्फीति दर के विपरीत है, क्योंकि समग्र थोक मूल्य सूचकांक में मुद्रास्फीति दर फरवरी 2023 में पिछले 2 वर्षों के न्यूनतम स्तर 3.85 पर थी। सामान्य अर्थशास्त्र कहता है कि आर्थिक वस्तु की कीमतें मांग एवं आपूर्ति के बाजार सिद्धांत द्वारा निर्धारित होती हैं। क्या इसका यह मतलब है कि वर्तमान कीमतें चारे की कम आपूर्ति व अधिक मांग की वजह से हैं? ऐसा ठीक से कह पाना मुश्किल है, क्योंकि हमारे देश में चारे के उत्पादन, मांग एवं आपूर्ति से संबंधित देशव्यापी सालाना आंकड़े किसी भी सरकारी या गैर सरकारी संस्था द्वारा जारी नहीं किए जाते। चारे की उपलब्धता, मांग एवं आपूर्ति से संबंधित आंकड़ों का एकमात्र प्रामाणिक दस्तावेज भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद– भारतीय चारा एवं चारागाह अनुसंधान संस्थान, झांसी द्वारा 10 साल पहले जारी किया गया “आईजीएफआरआई विजन 2050” दस्तावेज है जिसमें वर्ष 2020 के लिए 35.6 प्रतिशत हरे चारे व 10.9 प्रतिशत सूखे चारे की कमी का अनुमान व्यक्त किया गया है। 10.9 प्रतिशत चारे की कमी से चारे की वार्षिक मुद्रास्फीति दर रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची हो ऐसा नहीं है।

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