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चिंता मतदाता के अधिकार की- कमलेश जैन

भारतीय गणतंत्र की विशाल जनसंख्या को, चुनावों के दौरान एक स्वच्छ, जनता की मर्जी से चुनी हुई सरकार बनाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने वर्षों से ऐसे फैसले दिए हैं, जो लगातार चुनाव प्रक्रिया को सरल और पारदर्शी बना रहे हैं। इसी शृंखला में प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई, दीपक गुप्ता और संजीव खन्ना ने निर्देश दिया है कि अब ईवीएम (इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन) की ईमानदारी की जांच एक नहीं, बल्कि पांच वीवीपैट (वोटर वेरिफाइएबल पेपर ऑडिट ट्रेल) से कभी भी, कहीं भी की जा सकेगी। ईवीएम ने चुनाव प्रक्रिया को आसान बनाया है, लेकिन वे अक्सर विवादों में भी रही हैं।

ईवीएम की सत्यता कितनी है, इस पर लगातार विरोधी दल आशंका व्यक्त करते रहते हैं, खासकर तब, जब उन्हें हार का सामना करना पड़ता है। मगर अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद यह आशंका काफी हद तक निर्मूल हो जाएगी। अब एक विधानसभा क्षेत्र में चुनाव आयोग को एक की बजाय पांच मत केंद्रों की पर्चियों का मिलान ईवीएम के नतीजों से करना पड़ेगा। अभी तक कुल 4,125 जगहों पर वीवीपैट की पर्चियों का मिलान होना था, पर अब कुल 20,625 मत केंद्रों की पर्चियों का मिलान करना होगा। इससे चुनाव नतीजे घोषित करने में कई घंटे तक की देर हो सकती है। हो सकता है कि इसके लिए चुनाव आयोग को ज्यादा कर्मचारियों की आवश्यकता भी पड़े। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया का फायदा यह होगा कि ईवीएम सिस्टम के प्रति दलों और मतदाताओं को परिणामों पर ज्यादा संतोष होगा।

वीवीपैट से गिनती ईवीएम से गिनती होने के पश्चात ही होगी। ईवीएम से नतीजे हासिल करने में करीब एक घंटा का वक्त लगता है। सत्यापन प्रक्रिया इसके बाद होगी। वीवीपैट मशीनों से गिनती में इसके बाद करीब चार घंटे लगेंगे। अदालत में चुनाव आयोग के उप-चुनाव आयुक्त सुदीप जैन मौजूद थे। अदालत ने उनसे पूछा कि वह कैसे यह निर्णय लेते हैं कि किस मशीन की सत्यता की जांच करनी है? तो, उन्होंने जवाब दिया कि यह काम वह उम्मीदवारों या उनके प्रतिनिधियों के सामने एक लॉटरी निकालकर करते हैं। अदालत ने इस पर साफ किया कि वह इस प्रक्रिया पर आशंका व्यक्त नहीं कर रही। अदालत की यह टिप्पणी भी गौर करने लायक है कि ‘वह न तो चुनाव आयोग या उसकी प्रक्रिया पर संदेह कर रही है, न ही उसकी निष्पक्षता और ईमानदारी पर।' देश के 21 राजनीतिक दलों ने याचिकाकर्ता के तौर पर सुप्रीम कोर्ट से प्रार्थना की थी कि कम से कम 50 प्रतिशत ईवीएम की जांच अचानक कभी भी होनी चाहिए, जिससे कोई संदेह न रहे और प्रक्रिया पर उठने वाले विवाद खत्म हों।

अब जो अदालत ने फैसला दिया है, वह इसी आम चुनाव से लागू होगा, जिसके तहत पहले चरण का मतदान 11 अप्रैल को होने वाला है। अदालत ने ईवीएम की ईमानदार जांच के सवाल पर कहा कि यह मुद्दा इतनी देरी और आखिरी समय में नहीं सुलझाया जा सकता। हमें फिक्र है न सिर्फ राजनीतिक दलों के संतोष की, बल्कि गरीब-अनपढ़ मतदाता के संतोष की भी। पहले भारतीय चुनाव आयोग के दिशा-निर्देश संख्या-16.6 के अनुसार, हर विधानसभा क्षेत्र में एक ही मतदान केंद्र की ईवीएम की वीवीपैट जांच की जाती थी, अब जब यह प्रक्रिया पांच जगहों पर चलाई जाएगी, तो चुनाव ज्यादा प्रामाणिक होगा। याचिकाकर्ता की मांग थी कि यह जांच कम से कम 50 प्रतिशत या 125 पोलिंग बूथ पर हो, पर चूंकि समय कम है, इसीलिए हर विधानसभा क्षेत्र में पांच ईवीएम की जांच ही संभव है।

चुनाव आयोग का तर्क था कि इस प्रक्रिया से 2019 लोकसभा के नतीजे घोषित करने में देरी होगी। इसके साथ ही हमें सुप्रीम कोर्ट में इससे पहले हुए एक दूसरे फैसले को भी देखना चाहिए। विगत 25 सितंबर को सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव में खड़े दागी उम्मीदवारों पर चिंता जताई थी। इसके लिए अदालत ने संसद से कहा था कि वह एक पुख्ता कानून बनाए कि जिससे राजनीति और चुनाव को अपराधीकरण से बचाया जा सके। निर्देश दिए गए थे कि सभी उम्मीदवार अपने-अपने अपराधों का सिलसिलेवार ब्योरा दें, जिससे जनता उन्हें सही से परख सके। न्यायालय ने माना कि एक मतदाता का संविधान के अनुच्छेद 19 (1)(9) के तहत यह मौलिक अधिकार है कि वह अपने उम्मीदवार का आपराधिक इतिहास जान सके।

चुनाव आयोग अपने विस्तृत फॉर्म में सभी कॉलम भरने के लिए निर्देश देगा, जिसे उम्मीदवार को बड़े-बड़े अक्षरों में अपने खिलाफ दर्ज मुकदमों की लिस्ट देनी होगी, उम्मीदवार अपनी पार्टी को भी पूर्णतया सूचित करेगा। राजनीतिक दल अपनी वेबसाइट पर ये सब सूचनाएं डालेंगे, उसे प्रचारित भी करेंगे। इसके साथ ही यह भी कहा गया कि संसद ऐसा कानून बनाए, जिससे ऐसे अपराधी उम्मीदवार चुनाव न लड़ सकें। अदालत ने स्वीकार किया कि राजनीति का अपराधीकरण हो चुका है, चुनाव प्रक्रिया में सुधार जरूरी है और इस पर न्यायपालिका की नजर चली गई है।

भारतीय जनतंत्र में राजनीतिक अपराधीकरण कोई नई बात नहीं है, पर इसके पुख्ता प्रमाणों को 1993 के मुंबई बम ब्लास्ट मामले में बड़ी शिद्दत से महसूस किया गया था। हालांकि इसके पहले के भी बहुत से उदाहरण हैं, जिनमें वे लोग चुनाव जीतकर आए, जिन पर हत्या, बलात्कार, डकैती जैसे आरोपों के तहत मुकदमे लंबित थे। यह भारतीय गणतंत्र के लिए अत्यंत शोचनीय स्थिति है। तमाम क्षेत्रों में इस तरह की चिंताएं न जाने कब से सुनाई देती रहती हैं, लेकिन इन सब पर कुछ नहीं किया गया। अब जब सर्वोच्च न्यायालय सक्रिय हुआ है, तो उम्मीद बंधी है। वीवीपैट पर हुआ ताजा फैसला भी इसी प्रक्रिया की अगली कड़ी है, जो बताता है कि अदालत चुनावी प्रक्रिया से ज्यादा इस बात का ध्यान रख रही है कि निष्पक्ष चुनाव मतदाता का मौलिक अधिकार है।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)