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चुनावों में पीछे छूटते असली मुद्दे- आशुतोष चतुर्वेदी

पांच राज्यों छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, मिजोरम, तेलंगाना और राजस्थान में विधानसभा चुनावों पर पूरे देश की निगाहें लगी हुईं हैं. नतीजे किस करवट बैठेंगे, इसको लेकर नेताओं की धड़कनें तेज हैं. छत्तीसगढ़ में 12 नवंबर को पहले चरण का मतदान है. छत्तीसगढ़ की प्रकृति झारखंड से बहुत मिलती-जुलती है, लेकिन राजनीतिक समीकरण अलग हैं. छत्तीसगढ और मध्य प्रदेश में भाजपा का दबदबा रहा है और वह पिछले पंद्रह साल से सत्ता में है. लगातार चौथा कार्यकाल हासिल करना अपने आप में एक बड़ी चुनौती है. कांग्रेस इन राज्यों में वापसी करना चाहती है.


यही वजह है कि दोनों पार्टियों के लिए विधानसभा चुनाव प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गये हैं. भाजपा और कांग्रेस, दोनों किसी अस्त्र को दागने से नहीं चूक रही हैं, लेकिन यह भी सच्चाई है कि अब चुनाव जमीनी मुद्दों पर नहीं लड़े जाते. चुनावों में किसानों की समस्याएं, रोजगार, स्वास्थ्य सेवाओं और शिक्षा की स्थिति, विकास जैसे विषय मुद्दे नहीं बनते. इस बार चुनाव के मुद्दों पर नजर डालें, तो शुरुआत विकास के मुद्दे से हुई थी, लेकिन जल्द ही यह मुद्दा पीछे छूट गया. राहुल गांधी राफेल की खरीद में भ्रष्टाचार का मुद्दा प्रमुख रूप से उठा रहे हैं.

कांग्रेस जीएसटी और नोटबंदी जैसे मुद्दे भी उठा रही है, वहीं भाजपा अरबन नक्सल और राम मंदिर मुद्दे जैसे मुद्दों को हवा दे रही है, जबकि इन राज्यों में किसानों का अंसतोष बड़ा विषय रहा है. उस पर कोई गंभीर चर्चा नहीं हो रही है. पिछले कुछ चुनावों से कांग्रेस ने अल्पसंख्यकों से दूरी बनाते हुए नरम हिंदुत्व की राह पकड़ी है और राहुल गांधी हर छोटे-बड़े मंदिर में मत्था टेकते नजर आ रहे हैं, जबकि यह भाजपा का कार्यक्षेत्र रहा है. भाजपा मुद्दों के अलावा अपने मजबूत संगठन के जरिये बूथ लेवल पर काम कर रही है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह सभी राज्यों के चुनाव प्रचार में सक्रिय हैं. सघन प्रचार और ध्रुवीकरण के जरिये भाजपा हवा का रुख अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रही है, लेकिन स्थानीय फैक्टर पार्टियों का गणित बिगाड़ सकते हैं. माना जा रहा है कि छत्तीसगढ़ में बसपा और अजित जोगी की जनता कांग्रेस का गठबंधन छत्तीसगढ़ के चुनाव परिणामों को प्रभावित कर सकता है.

मीडिया हर विधानसभा चुनाव को 2019 के लोकसभा चुनावों का सेमीफाइनल बताता है. यह सच है कि लोकसभा चुनावों से पहले ये अंतिम विधानसभा चुनाव हैं और इन चुनावों के नतीजे पार्टियों और कार्यकर्ताओं के मनोबल पर असर डालेंगे. मुझे लगता है कि सेमीफाइनल के बजाय सांप-सीढ़ी के खेल से इसकी तुलना अधिक उपयुक्त है.

2019 से पहले के विधानसभा चुनाव आपको लोकसभा चुनाव की ऊपरी सीढ़ी के नजदीक ले जाते हैं. यदि इन विधानसभा चुनावों की सीढ़ी पर भाजपा और नरेंद्र मोदी सफलतापूर्वक चढ़ते गये, तो उनके लिए 2019 की लोकसभा की सीढ़ी बहुत आसान हो जायेगी. मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में असफलता उनकी राह मुश्किल बना देगी. हालांकि यह भी सही है कि कई बार लोकसभा और विधानसभाओं के चुनावी नतीजे उपचुनाव के परिणामों के एकदम उलट होते हैं, लेकिन अब बहुत समय नहीं बचा है.

इन विधानसभा चुनावों के तत्काल बाद लोकसभा चुनाव की बारी है. इस दृष्टि से मौजूदा नतीजे और महत्वपूर्ण हो जाते हैं. कांग्रेस के लिए हार कोई नयी बात नहीं है. पार्टी कुछ समय से लगातार चुनाव हार रही है. हां, यदि जीत हुई, तो वह राहुल गांधी को स्थापित कर देगी, क्योंकि अब तक वह उपहास के पात्र रहे हैं और ऐसा माना जा रहा था कि जनता उन्हें ठुकरा चुकी है. इस बार राहुल गांधी नये तेवर में हैं. उनके भाषणों में जिन मारक मुद्दों और शब्दों का अभाव दिखता था, इस बार वे दिखाई दे रहे हैं.

हिंदी पट्टी के इन राज्यों का केंद्र में भाजपा की सरकार बनवाने में बड़ा योगदान रहा है, लेकिन राज्यों के नेतृत्व को लेकर लोगों में नाराजगी है. ऐसा लगता है कि हिंदी पट्टे के कुछ किले दरकने लगे हैं. सर्वे संकेत देते हैं कि राजस्थान में भाजपा की स्थिति ठीक नहीं है.

संदर्भ समझने के लिए राजस्थान के पिछले चुनाव परिणामों को जानना जरूरी है. राजस्थान में पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 200 में से 163 सीटें जीती थीं, कांग्रेस को केवल 21 सीटें मिली थीं और शेष अन्य के खाते में गयीं थीं. 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने राजस्थान में 25 में से 25 संसदीय सीटों पर कब्जा कर एक नया रिकॉर्ड बनाया था, लेकिन उपचुनावों के बाद भाजपा की दो सीटें कम हो गयीं.

मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा लंबे अरसे से सत्ता में है, लेकिन उससे किसानों में नाराजगी है. जीएसटी को लेकर व्यापारियों का एक वर्ग नाराज है. देखना होगा कि यह नाराजगी क्या असंतोष में बदली है यानी मतदाता यह सोचें कि इन्हें तो हराना है और इस बात की परवाह न करें कि विपक्ष का उम्मीदवार कैसा है.

पहले होता यह था कि विधानसभा चुनावों में स्थानीय नेतृत्व की प्रमुख भूमिका होती थी, लेकिन अब खेल के नियम बदल गये हैं. प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने हर चुनाव को अहम बना दिया है. प्रत्येक चुनाव में केंद्रीय नेतृत्व की अहम भूमिका होने लगी है और विधानसभा चुनाव पूरी ताकत से लड़े जाते हैं, लेकिन पूर्वोत्तर के मिजोरम विधानसभा चुनावों को लेकर मीडिया की कोई खास दिलचस्पी नजर आती है.
मिजोरम में 28 नवंबर को मतदान होना है, लेकिन चुनावी होड़ में यह राज्य दब-सा गया है. यहां अबकी बार भाजपा और उसका सहयोगी मिजो नेशनल फ्रंट सत्ता से कांग्रेस को हटाने के लिए पूरी कोशिश कर रहे है. हालांकि दोनों दल अलग-अलग चुनाव लड़ रहे हैं. पहले यहां शराबबंदी थी, लेकिन सत्तारूढ़ कांग्रेस ने इसे खत्म कर दिया. इस बार के चुनाव में शराबबंदी भी एक प्रमुख मुद्दा है.

हर चुनाव राजनीति को एक नया संदेश देकर जाता है. पिछले कर्नाटक विस चुनावों से विपक्षी एकता का संदेश निकला था. यह देश का दुर्भाग्य है कि अक्सर सरकारें अपनी असफलताओं के कारण चली जाती हैं, इसमें विपक्ष की कोई अहम भूमिका नहीं होती. कांग्रेस की सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि भाजपा सरकारें अपने बोझ से कैसे गिरें, उसे इसी का इंतजार है.

सड़कों पर उतरकर सरकार के खिलाफ जनमत जगाने का काम वह नहीं करती. इन विस चुनावों में कांग्रेस नेताओं के सामने बड़ा अवसर है, लेकिन उनकी आपसी खींचतान की खबरें सामने आ रही हैं. मध्य प्रदेश में कमलनाथ, सिंधिया और दिग्विजय सिंह हैं, तो राजस्थान में गहलौत और सचिन पायलट के बीच खींचतान है. छत्तीसगढ़ में कांग्रेस से निकले अजीत जोगी पार्टी को नुकसान पहुंचा रहे हैं. जैसा कि कांग्रेसी भी कहते हैं, उन्हें विपक्ष की जरूरत नहीं होती, उनके लोग ही इस कमी को पूरा कर देते हैं.