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चुनौतियों से जूझता मीडिया-- आशुतोष चतुर्वेदी

मीडिया के खिलाफ एकतरफा फैसला सुनाने वाले आपको बहुत से लोग मिल जायेंगे. मीडिया पर टीका-टिप्पणी करना एक फैशन-सा हो गया है, लेकिन हम सब के लिए यह जानना जरूरी है कि मीडियाकर्मी कितनी कठिन परिस्थितियों में अपने काम को अंजाम देते हैं. पिछले दिनों एक व्हाट्सएप मैसेज वायरल हुआ- पहले अखबार छप के बिका करते थे, अब बिक के छपा करते हैं.

इस संदेश में मीडिया की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिये गये हैं. हाल में एक दुखद खबर भी सामने आयी कि एक अखबार के समूह संपादक की मौत हो गयी. इस दुखद घटना पर भी गौर करना जरूरी है. यह घटना दिखाती है कि मीडियाकर्मी कितने दबाव और प्रतिकूल परिस्थितियों में काम करते हैं और यह दबाव उनकी जान भी ले सकता है. वह यह चुनौती इसलिए स्वीकार करते हैं, ताकि आप तक निष्पक्ष और सटीक खबरें पहुंच सकें. उनके काम करने के घंटे निर्धारित नहीं होते. वे सुबह नौ से शाम पांच बजे तक की सुकून भरी नौकरी नहीं करते. अखबार में न्यूज जुटाने का काम दिनभर चलता है और फिर अखबार को तैयार करने का काम देर शाम शुरू होकर आधी रात तक चलता है.

जब आप सो रहे होते हैं, तब मीडियाकर्मी आपके लिए अखबार तैयार कर रहे होते हैं. आपको हर रोज सुबह अखबार चाहिए और टीवी, वेबसाइट पर ताजातरीन खबरें चाहिए, इसलिए मीडियाकर्मी लगभग 365 दिन काम करते हैं.

हाल में श्रीनगर में राइजिंग कश्मीर के संपादक शुजात बुखारी की आतंकवादियों ने गोली मार कर हत्या कर दी. त्रिपुरा में पिछले साल दो पत्रकारों की हत्या कर दी गयी थी. बेंगलुरु में गौरी लंकेश की हत्या तो चर्चित रही ही है, लेकिन छोटी जगहों पर पत्रकारिता करना और चुनौतीपूर्ण होता है.

वहां माफिया से टकराना आसान नहीं होता. मध्य प्रदेश के भिंड इलाके में रेत माफिया और पुलिस का गठजोड़ उजागर करने पर एक पत्रकार को ट्रक से कुचलकर मार दिया गया. यह कोई दबा-छुपा तथ्य नहीं है कि मीडियाकर्मियों को कई तरह के दबावों का सामना करना पड़ता है, इसमें राजनीतिक और सामाजिक दबाव दोनों शामिल हैं. कश्मीर में रिपोर्टिंग करना तो भारी जोखिम भरा कार्य है. आतंकवादियों के निशाना बनने का हमेशा खतरा बना रहता है.

इतने दबावों के बीच आप अंदाज लगा सकते हैं कि खबरों में संतुलन बनाये रखना कितना कठिन कार्य होता है. इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट के अनुसार 2016 में पूरी दुनिया में 122 पत्रकार मारे गये. रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स के अनुसार दुनियाभर में पत्रकारों और स्वतंत्र मीडिया पर दबाव बढ़ रहा है.

मेरा मानना है कि अखबार किसी मालिक या संपादक का नहीं होता है, उसका मालिक तो अखबार का पाठक होता है. पाठक की कसौटी पर ही अखबार की असली परीक्षा होती है. प्रभात खबर की ही मिसाल लें तो यह अखबार हमेशा सामाजिक सरोकारों के प्रति प्रतिबद्ध रहा है.
यह यूं ही नहीं है. इसका एक पूरा इतिहास है. जहां भी आम आदमी, समाज और राष्ट्र के विरुद्ध कुछ गलत दिखा, उसके खिलाफ प्रभात खबर एक मजबूत और निष्पक्ष चौथे स्तंभ के रूप में खड़ा हुआ है. जिन घपलों-घोटालों को शासन-प्रशासन ने छुपाकर रखना चाहा, उसे सबके सामने उजागर किया. हम गर्व के साथ कह सकते हैं कि प्रभात खबर ने सबसे अधिक घपले-घोटाले उजागर किये हैं, जिसके कारण कई पूर्व मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों तक को जेल तक जाना पड़ा. चारा घोटाला सबसे पहले प्रभात खबर ने उजागर किया.

प्रभात खबर की परंपरा रही है कि वह समाज के हर वर्ग की आवाज बने, जोर-शोर से उनके मुद्दे उठाये. इस कार्य में कई प्रकार की बाधाओं का भी सामना करना पड़ता है, लेकिन हमें अपने पाठकों का नैतिक समर्थन हर बार मिला है. हम जानते हैं कि एक अखबार के लिए पाठकों का प्रेम ही उसकी बड़ी पूंजी होती है.

यह सच है कि खबरों के बहुत से स्रोत हो गये हैं और मौजूदा दौर में खबरों की साख का संकट है, लेकिन आज भी अखबार खबरों के सबसे प्रामाणिक स्रोत हैं. सोशल मीडिया पर रोजाना कितनी सच्ची झूठी खबरें चलतीं हैं. टीवी चैनल तो रोज शाम एक छद्म विषय पर बहसें कराते हैं.

शिर्डी में दीवार पर साईं बाबा प्रकट हुए जैसी अफवाहों को जोर-शोर से प्रसारित किया जाता है, लेकिन इस सामूहिक उन्माद को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से प्रस्तुत नहीं किया जाता. दूसरी ओर, किसानों के धरने की खबरें मीडिया में स्थान नहीं पा पातीं. टीवी में एक ओर विचित्र बात स्थापित हो गयी है. वहां एंकर जितने जोर से चिल्लाये, उसे उतना सफल माना जाने लगा है. ऐसा नहीं है कि अखबारों में कमियां नहीं हैं. अखबारों ने भी जनसरोकार के मुद्दों को उठाना बंद कर दिया है. अब किसानों के प्रदर्शन की खबरें सुर्खियां नहीं बनतीं. बेरोजगारी और पूर्वोतर की घटनाएं मीडिया के एजेंडे में पहले से नहीं हैं. बाजार के दबाव में अखबार भी शहर केंद्रित हो गये हैं.

अखबार उन लोगों की अक्सर अनदेखी कर देते हैं, जिन्हें उसकी सबसे अधिक जरूरत होती है. दूसरी ओर सरकारें बड़ी विज्ञापनदाता हो गयी हैं, वह दबाव अलग है. हाल में तकनीक के विस्तार ने अखबारों के समक्ष नयी चुनौती पेश की है. इसका असर देश-विदेश के सभी अखबारों पर पड़ा है. मुझे ब्रिटेन में रहने और बीबीसी के साथ काम करने का अनुभव रहा है. ब्रिटेन के प्रतिष्ठित गार्जियन जैसे प्रतिष्ठित अखबार संघर्ष कर रहे हैं, जबकि ब्रिटेन के अखबारों का मॉडल दूसरी तरह का है.

वहां लोग खबरें पढ़ने के लिए पूरी कीमत अदा करने को तैयार रहते हैं. वहां गार्जियन, टाइम्स और इंडिपेंडेंट जैसे अखबार हैं, जो लगभग दो पाउंड यानी लगभग 180 रुपये में बिकते हैं, लेकिन भारत में हिंदी पाठक अखबार के लिए बहुत अधिक कीमत अदा करने के लिए तैयार नहीं होते, जबकि एक अखबार को तैयार करने में 20 से 25 रुपये की लागत आती है.

इधर, अखबारी कागज के दाम लगभग तीन गुना तक बढ़ गये हैं, उसका दबाव अलग है. दुनिया में संभवत: यह एकमात्र उत्पाद है, जो अपनी लागत से कहीं कम मूल्य पर बिकता है. विज्ञापनों के जरिये इस लागत को पूरा करने की कोशिश की जाती है, लेकिन उसकी कीमत भी अदा करनी पड़ती है. यह बात अब कोई दबी-छुपी नहीं रह गयी है कि अखबार को चलाना अब बड़ी पूंजी का खेल हो गया है.

जाहिर है कि इसके लिए मीडिया को बाजार के अनुरूप ढलना पड़ता है. सबसे गंभीर बात है कि समय के साथ पाठक भी बदल गये हैं.अखबार पहले खबरों के लिए पढ़े जाते थे, लेकिन मार्केटिंग के इस दौर में अखबार फ्री कूपन और मुफ्त लोटा-बाल्टी के आधार पर निर्धारित किये जाने लगे हैं. पाठकों को भी इस विषय में गंभीरता पूर्वक विचार करना होगा.