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जन्म देना भी यहां मौत से खेलना है ।।पुष्यमित्र।।

झारखंड ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के मिशन डायरेक्टर अबूबकर सिद्दीकी से जब झारखंड की सेहत का हाल पूछा जाता है तो वे भवनों का अभाव और मैन पावर की कमी का रोना लेकर बैठ जाते हैं. निश्चित तौर पर गांवों और प्रखंड मुख्यालयों में बेहतरीन स्वास्थ्य सुविधाओं का न होना एक बड़ी समस्या है जो झारखंड के ग्रामीणों को सरकारी चिकित्सा व्यवस्था से दूर करते हैं और एक बड़ी आबादी ओझा और झोलाछाप चिकित्सकों पर आश्रित होकर संदिग्ध इलाज पाने के लिए लाचार होती है. 

मगर क्या र्सिफ संधाधनों के इंतजार में लोगों को खतरे में छोड़ा जा सकता है ? खास तौर पर तब जब झारखंड ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन का मूल उद्देश्य ही पंचायतों के सहयोग से गांवों में बेहतरीन स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराना है. झारखंड ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की ओर से इसके लिए हर गांव में सहिया की नियुक्ति भी की गयी है और हर पांच हजार की आबादी पर एक उप स्वास्थ्य केंद्र स्थापित कर एक एएनएम को वहां के लिए नियुक्त किया गया है. जननी सुरक्षा योजना और जननी शिशु सुरक्षा अभियान जैसी योजनाएं चलायी जा रही है. इसके बावजूद राज्य में गर्भवती महिलाओं की मौत, शिशु की मौत और उनका कुपोषित होना बंद नहीं हो रहा. इसकी वजह कहीं न कहीं प्रयास में गंभीरता का अभाव और पूरी योजना को पंचायतों से न जोड़ पाना ही है. झारखंड के सेहत के मौजूदा हालात को समझने के लिए हम सबसे पहले हालिया राष्ट्रीय स्वास्थ्य सव्रेक्षण के आंकड़ों पर नजर डालते हैं.

सेहत के आंकड़े


माताएं और बच्चे
झारखंड की एक औरत औसतन 3.3 बच्चे को जन्म देती है, यह राष्ट्रीय औसत(2.7) से काफी अधिक है.
अनपढ़ औरतों के बीच यह औसत(3.9) काफी अधिक है. 5 वीं से 9 वीं तक पढ़ी औरतों के यह औसत घट कर 2.9 हो जाता है और 10 वीं पास और अधिक पढ़ी-लिखी औरतों के बीच यह औसत 2 रह जाता है.
15 से 19 साल की 28 फीसदी औरतों की गोद में उनका एक बच्च जरूर होता है.
60 फीसदी से अधिक औरतें दो बच्चों के बीच तीन साल का अंतराल नहीं रख पातीं.
38 फीसदी विवाहित महिलाएं ही गर्भनिरोधक का इस्तेमाल करती हैं.


शिशुओं पर खतरा
हर 15 में से एक बच्च अपने जन्म के साल भर के अंदर अकाल कलवित हो जाता है.
11 में से एक बच्च पांच साल की उम्र पूरी नहीं कर पाता.
अगर माता की उम्र 20 साल से कम हो या 30 से अधिक तो शिशु मृत्यु दर स्वभाविक रूप से बढ़ जाती है.
20 से कम उम्र की एक हजार माताओं में से 99 और 30 से अधिक उम्र की हजार में से 76 माताएं अपना शिशु खो देती हैं. जबकि राज्य में सामान्य तौर पर यह औसत एक हजार में मात्र 46 है.

गर्भावस्था के दौरान लापरवाही
57 फीसदी महिलाएं ही गर्भावस्था के दौरान चिकित्सकीय सलाह लेती हैं. इनमें से महज 39 फीसदी औरतें डाक्टरों से और 18 फीसदी दूसरे स्वास्थ्य कर्मियों से सलाह लेती हैं. गावों में यह आंकड़ा 50 फीसदी ही रह जाता है.
36 फीसदी महिलाएं ही गर्भावस्था के दौरान तीन या इससे अधिक बार चेकअप करवा पाती हैं.
पहले तीन माह के दौरान 33 फीसदी महिलाएं ही डाक्टर के पास जा पाती हैं.
महज 19 फीसदी महिलाएं ही अस्पताल में बच्चों को जन्म दे पाती हैं, 29 फीसदी महिलाओं को ही किसी न किसी रूप में बच्चों को जन्म देते वक्त स्वास्थ्य कर्मियों की सहायता मिल पाती है.
इन हालात में हर एक लाख में 278 औरतें बच्चों को जन्म देने के दौरान दम तोड़ देती हैं.
बच्चों को जन्म देने के दो दिन के अंदर महज 17 फीसदी औरतों का ही चेकअप हो पाता है.


स्वास्थ्य संसाधनों का हाल

झारखंड में उप स्वास्थ्य केंद्रों की संख्या 7088 होनी चाहिये मगर फिलहाल 3958 उप स्वास्थ्य केंद्र ही काम कर रहे हैं.
इन स्वास्थ्य केंद्रों में 1732 सरकारी भवनों(स्कूल या पंचायत भवन आदि) में, 1956 किराये के भवनों में और 270 किराया मुक्त भवनों से संचालित होते हैं.


अधिकतर भवनों की हालत जजर्र है, वहां कार्यरत एक मात्र स्वास्थ्य कर्मी एएनएम के रहने की कोई व्यवस्था नहीं है. हर उप स्वास्थ्य केंद्र में दो एएनएम की बहाली होनी थी, मगर अधिकतर केंद्रों में फिलहाल एक एएनएम से ही काम चलाया जा रहा है. इन हालात में दूर दराज के अधिकतर केंद्रों में एएनएम रात के वक्त रुकना नहीं चाहती हैं और गर्भवती महिलाओं को इसका लाभ नहीं मिल पाता है.


राज्य में फिलहाल 1126 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की आवश्यकता है, मगर अभी तक सिर्फ 330 अतिरिक्त स्वास्थ्य केंद्रों को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में परिवर्तित किया गया है. इनमें से सिर्फ 172 भवन की स्वीकृति मिली है.


168 प्रखंडों में जो जिला मुख्यालय से दूर हैं सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के निर्माण की स्वीकृति मिली है.
हर प्रखंड में फस्र्ट रेफरल यूनिट खोले जाने की योजना है ताकि सिजेरियन की नौबत आने पर हर बार जिला मुख्यालय की दौड़ न लगानी पड़े. मगर अब तक सिर्फ 32 एफआरयू ही खोले जा सके हैं.


अत्यधिक कुपोषित बच्चों की देखभाल के लिए 53 एमटीसी खोले गये हैं, मगर इनमें बहुत कम बच्चे पहुंच पाते हैं. कारण इनमें इलाज के लिए माता और शिशु को 15 दिन से एक माह तक का समय गुजारना पड़ता है. हालांकि यहां रहने पर प्रति दिन सौ रुपये की प्रोत्साहन राशि और आने-जाने का किराया देने का भी प्रावधान है. मगर महिलाएं अपना घर छोड़कर वहां रहने के लिए तैयार नहीं. लिहाजा सरकार अब इन केंद्रों के बदले सामुदायिक स्तर पर कुपोषण के इलाज की योजना बना रही है.


ग्राम स्वास्थ्य समिति और सहिया के संयुक्त खाते में हर साल दस हजार रुपये की राशि जमा की जाती है, ताकि इसका उपयोग गांव के सेहत से जुड़े मसलों को लेकर हो. मगर एक हालिया अध्ययन के मुताबिक इस राशि का समुचित उपयोग नहीं हो पाता है.
इसी तरह हर स्तर के अस्पताल के साथ एक समिति गठित की गयी है, इन्हें भी एक नियत राशि खर्च के लिए दी जाती है, मगर उस राशि का ठीक से इस्तेमाल न हो पाने की शिकायतें है. जल्द ही इस संबंध में दिशा-निर्देश जारी किये जाने हैं.


ममता वाहन का हाल
गर्भवती महिलाओं को अस्पताल तक पहुंचाने के लिए राज्य सरकार ने ममता वाहन के नाम से महत्वपूर्ण योजना तैयार की थी. इसके तहत 2150 वाहन पूरे राज्य में चल रहे हैं. मगर इन वाहनों का कॉमन नंबर नहीं होने के कारण ग्रामीण हमेशा भ्रम की स्थिति में रहते हैं. हर जिले में ममता वाहन हेल्प लाइन का अलग नंबर है. यह नंबर मोबाइल का भी है और लैंड लाइन का भी. मोबाइल के नंबर भी अलग-अलग सेवा प्रदाताओं के हैं और इनके नंबर भी ऐसे नहीं हैं जिन्हें आसानी से याद रखा जा सके. हालांकि एनएचआरएम के आंकड़ों के मुताबिक इन वाहनों के जरिये 90423 महिलाओं को अस्पताल पहुंचाया गया है. अगर ये आंकड़े सही भी हैं तो एक ममता वाहन एक साल से अधिक समयावधि में सिर्फ 40 महिलाओं को अस्पताल पहुंचा सकी है. एनएचआरएम कॉमन नंबर स्कीम पर विचार कर रहा है.

स्वास्थ्य कर्मियों का टोटा
उप स्वास्थ्य केंद्रों में सेवा उपलब्ध कराने के लिए 3958 पुरुष स्वास्थ्य कर्मियों की जरूरत है मगर फिलहाल 1922 कर्मी ही उपलब्ध हैं.
330 महिला स्वास्थ्य सहायकों की जरूरत है, इनकी नियुक्ति अब तक नहीं हुई है.
सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में 194 महिला रोग विशेषज्ञों की आवश्यकता है, जबकि फिलहाल 30 महिला रोग विशेषज्ञ ही कार्यरत हैं.
इन केंद्रों में 194 फिजीशियन की भी जरूरत है, इनमें से एक भी उपलब्ध नहीं हैं.
इतने ही शिशु रोग विशेषज्ञों की जरूरत है, मगर तमाम सामुदायिक केंद्र बगैर शिशु रोग विशेषज्ञों के संचालित हो रहे हैं.
इसी तरह 194 पदों के बदले एक भी रेडियोग्राफर उपलब्ध नहीं है.
524 फार्मासिस्टों की जगह सिर्फ 348 कार्यरत हैं.
524 लैब सहायकों की जगह 381 कार्यरत हैं.
पूरे राज्य में फिलहाल 1688 नर्स/मिडवाइफ की जरूरत है मगर महकमा सिर्फ 429 नर्सो की सहायता से पूरे राज्य की सेवा कर रहा है.

टीकाकरण
12 से 23 महीने के 34 फीसदी बच्चों को ही सारे टीके लग पाते हैं.
कुपोषण
राज्य के 47 फीसदी बच्चों की लंबाई उम्र के हिसाब से कम है.
36 फीसदी बच्चों का वजन ऊंचाई के हिसाब से कम है.
55 फीसदी बच्चों का वजन उम्र के हिसाब से कम है.
एनीमिया
70 फीसदी महिलाएं, छह माह से लेकर 5 साल तक के 70 फीसदी बच्चे और 37 फीसदी पुरुष एनीमिया से पीड़ित हैं.
टीबी
हर एक लाख में से 598 लोगों का टीबी का इलाज चल रहा है. इनमें से अधिकतर ऐसे लोग हैं जिनके घर में ईंधन के तौर पर गैस या बिजली का इस्तेमाल नहीं होता.
डायरिया
डायरिया से पीड़ित 21 फीसदी बच्चों को ही ओआरएस का घोल उपलब्ध हो पाता है.
सिर्फ 37 फीसदी ग्रामीण महिलाएं ही डायरिया के लक्षणों की पहचान कर पाती है.