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जब डूबने लगेंगे तटीय शहर-- अरविन्द कुमार सिंह

जलवायु संकट की वजह से पिघलती बर्फ के कारण समुद्र का जल-स्तर इस सदी के अंत यानी वर्ष 2100 तक वैज्ञानिकों के पूर्वानुमान से दोगुने से भी ऊपर निकल जाएगा। यह चौंकाने वाली बात अमेरिका के कोलाराडो विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने ‘प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज' में प्रकाशित शोध में कही है। वैज्ञानिकों ने वर्ष 2100 तक समुद्र का जल-स्तर तीस सेंटीमीटर बढ़ने का अनुमान लगाया था। लेकिन नए शोध के मुताबिक अब यह पैंसठ सेंटीमीटर से भी अधिक बढ़ सकता है। शोधकर्ताओं की मानें तो समुद्र का जल-स्तर हर साल 0.08 मिलीमीटर की दर से बढ़ रहा है। इसके लिए अलनीनो की वजह से समुद्री जल का तापमान बढ़ने और हवाओं का बदलता रुख भी काफी हद तक जिम्मेदार है। शोधकर्ताओं ने समुद्र के बढ़ते जल-स्तर के लिए दो महत्त्वपूर्ण कारण गिनाए हैं। एक यह कि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन की बढ़ती मात्रा के कारण धरती पर हवा और पानी का तापमान बढ़ रहा है। दूसरा, जमीनी बर्फ के तेजी से पिघलने से समुद्री जल-स्तर में लगातार बढ़ोतरी हो रही है।


शोधकर्ताओं के मुताबिक समुद्री जल-स्तर तेजी से बढ़ने के पीछे सबसे बड़ी वजह ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका की बर्फ का तेजी से पिघलना है, जिसके लिए एकमात्र वजह जलवायु संकट है। याद होगा अभी कुछ दिन पहले मैक्सिको की खाड़ी में स्थित लुइसियाना का डेलाक्रोइस शहर देश-दुनिया में खूब चर्चा का विषय बना था। उसका कारण यह था कि यह शहर धीरे-धीरे समुद्र में समा रहा है। यहां समुद्र का पानी शहर एक बड़े हिस्से को निगल चुका है और पिछले एक सौ साल में लुइसियाना की 1880 वर्ग मील जमीन समुद्र में डूब चुकी है। एक रिपोर्ट में कहा गया है कि औसतन सत्रह वर्ग मील जमीन हर साल डूब रही है। ऐसा माना जा रहा है कि अगर कहीं बड़ा समुद्री तूफान आया तो शहर का बड़ा हिस्सा समुद्र में समा सकता है। वर्ष 2016 में हुए एक अध्ययन के मुताबिक पिछले सौ साल में समुद्र का पानी बढ़ने की रफ्तार पिछली सत्ताईस सदियों से ज्यादा है। वैज्ञानिकों की मानें तो अगर धरती का बढ़ता तापमान रोकने की कोशिश नहीं हुई तो दुनिया भर में समुद्र का स्तर पचास से एक सौ तीस सेंटीमीटर तक बढ़ सकता है। गौरतलब है कि अभी तक पहाड़ी ग्लेशियर की बर्फ ही समुद्र का पानी बढ़ा रही थी, मगर धरती के बढ़ते तापमान से अंटार्कटिका और ग्रीनलैंड की बर्फ भी पिघलने लगी है। ऐसा माना जा रहा है कि आगे चल कर इसी से समुद्र का पानी तेजी से बढ़ने वाला है। पिछले साल कैंब्रिज विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने दावा किया था कि आने वाले एक-दो वर्षों में आर्कटिक समुद्र की बर्फ पूरी तरह समाप्त हो जाएगी। इसका आधार वैज्ञानिकों द्वारा अमेरिका के नेशनल स्नो एंड आइस डाटा सेंटर की ओर से ली गई सैटेलाइट तस्वीरें हैं।


वैज्ञानिकों के मुताबिक इस वर्ष एक जून तक आर्कटिक समुद्र के केवल एक करोड़ ग्यारह लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में ही बर्फ बची है जो पिछले तीस साल के औसत एक करोड़ सत्ताईस वर्ग किलोमीटर से कम है। उनका दावा है कि तेजी से बर्फ पिघलने से समुद्र भी गर्म होने लगा है। आर्कटिक क्षेत्र में आर्कटिक महासागर, कनाडा का कुछ हिस्सा, ग्रीनलैंड (डेनमार्क का एक क्षेत्र), रूस का कुछ हिस्सा, संयुक्त राज्य अमेरिका (अलास्का) आइसलैंड, नार्वे, स्वीडन और फिनलैंड शामिल हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर पृथ्वी का तापमान तीन दशमलव छह डिग्री सेल्सियस तक बढ़ता है तो आर्कटिक के साथ-साथ अंटार्कटिका के विशाल हिमखंड भी पिघल जाएंगे और समुद्र के जल स्तर में दस इंच से पांच फुट तक वृद्धि हो जाएगी। इसका परिणाम यह होगा कि तटीय शहर समुद्र में डूब जाएंगे। ऐसा हुआ तो फिर न्यूयार्क, लॉस एंजिलिस, पेरिस, लंदन, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, पणजी, विशाखापत्तनम, कोचीन और तिरुवनंतपुरम जैसे शहर समुद्र में समाने लगेंगे। वर्ष 2007 की अंतर-सरकारी पैनल की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर के करीब तीस पर्वतीय ग्लेशियरों की मोटाई अब आधे मीटर से भी कम रह गई है। हिमालय क्षेत्र में पिछले पांच दशकों में माउंट एवरेस्ट के ग्लेशियर दो से पांच किलोमीटर तक सिकुड़ गए हैं और छिहत्तर फीसद ग्लेशियर तेजी से सिकुड़ रहे हैं। कश्मीर और नेपाल के बीच गंगोत्री ग्लेशियर भी तेजी से सिकुड़ रहा है। अनुमानित भूमंडलीय तापमान बढ़ने से जीवों का भौगोलिक वितरण भी प्रभावित हो सकता है। कई प्रजातियां धीरे-धीरे ध्रुवीय दिशा या उच्च पर्वतों की ओर विस्थापित हो जाएंगी। प्रजातियों के वितरण में इन परिवर्तनों का प्रजाति विविधता तथा पारिस्थितिकी क्रियाओं इत्यादि पर असर पड़ेगा। पृथ्वी पर करीब बारह करोड़ साल तक राज करने वाले डायनासोर नामक दैत्याकार जीवों के समाप्त होने का कारण संभवत: ग्रीनहाउस प्रभाव ही था। निश्चित रूप से मनुष्य के विकास के लिए प्रकृति प्रदत्त संसाधनों का दोहन आवश्यक है, लेकिन उसकी सीमा निर्धारित होनी चाहिए। पर ऐसा हो नहीं रहा है। जिस तरह बिजली उत्पादन के लिए नदियों के सतत प्रवाह को रोक कर बांध बनाए जा रहे हैं उससे खतरनाक पारिस्थितिकीय संकट खड़ा हो गया है। भारत की गंगा और यमुना जैसी कई नदियां सूखने के कगार पर हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार जल संरक्षण और प्रदूषण पर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले 200 सालों में भू-जल स्रोत सूख जाएंगे।


याद होगा पांच जून, 2007 को पर्यावरण दिवस का सबसे ज्वलंत विषय ‘पिघलती बर्फ' ही था। इस पर मुख्य अंतरराष्ट्रीय आयोजन नार्वे के ट्रामसे में हुआ था और दुनिया भर में ‘ग्लोबल आउटलुक फॉर आइस एंड स्नो' की शुरुआत हुई। दुनिया के बीस सबसे ज्यादा क्लोरोफ्लोरो कार्बन उत्सर्जित करने वाले देशों के बीच ओजोन परत के क्षरण को रोकने के लिए 16 सितंबर, 1987 को अंतरराष्ट्रीय संधि हुई थी, जिसे मांट्रियल प्रोटोकॉल नाम दिया गया। इसका मकसद ओजोन परत के क्षरण के लिए जिम्मेदार गैसों और तत्त्वों के इस्तेमाल पर रोक लगाना था। लेकिन इस दिशा में अभी तक अपेक्षित सफलता नहीं मिली है। आंकड़ों के मुताबिक अब तक वायुमंडल में छत्तीस लाख टन कार्बन डाइआक्साइड की वृद्धि हो चुकी है और चौबीस लाख टन आक्सीजन खत्म हो चुकी है। अगर यही स्थिति रही तो 2050 तक पृथ्वी के तापक्रम में लगभग चार डिग्री सेल्सियस तक वृद्धि हो सकती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि पृथ्वी का तापमान जिस तेजी से बढ़ रहा है और अगर उस पर समय रहते काबू नहीं पाया गया तो अगली सदी में तापमान साठ डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाएगा। कहीं सूखा पड़ेगा, कहीं गरम हवाएं चलेंगी तो कहीं भीषण तूफान और बाढ़ आएगी। जल संरक्षण और प्रदूषण पर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले सालों में भू-जल संकट गहराएगा। नतीजतन, मनुष्य को खतरनाक मौसमी बदलावों जैसे- जलवायु संकट, ओजोन क्षरण, ग्रीनहाउस प्रभाव, भूकम्प, भारी वर्षा, बाढ़ और सूखे जैसी आपदाओं से जूझना होगा। जलवायु परिवर्तन को लेकर 1972 में स्टाकहोम, 1992 में रियो द जेनेरियो, 2002 में जोहानीसबर्ग, 2006 में मांट्रियल और 2007 में बैंकॉक सम्मेलन हुआ। जलवायु परिवर्तन को लेकर चिंता जताते हुए उसे संतुलित बनाए रखने के लिए ढेरों कानून गढ़े गए। लेकिन त्रासदी है कि उस पर ईमानदारी से अमल नहीं हो रहा है। इन सम्मेलनों में सैद्धांतिक रूप से पृथ्वी के प्राकृतिक द्रव्यों, जिनमें वायु, पानी, भूमि तथा पेड़-पौधे शामिल हैं, को वर्तमान और भावी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखने पर बल दिया गया है। रियो शिखर सम्मेलन में कहा गया कि स्थायी विकास के सभी सरोकारों का केंद्र बिंदु मानव जाति ही है और उसे प्रकृति के साथ पूर्ण समरसता रखते हुए स्वस्थ एवं उत्पादनशील जीवन जीना चाहिए। लेकिन विडंबना है कि मानव जाति प्रकृति से शत्रुता भरा व्यवहार छोड़ने को तैयार नहीं है।