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जम्मू-कश्मीर में बढ़ते राजमार्ग और सड़क दुर्घटनाओं में जानवरों के मरने की बढ़ती घटनाएं

मोंगाबे हिंदी, 21 अगस्त

सितंबर 2011 में, जम्मू यूनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूट ऑफ माउंटेन एनवायरनमेंट (आईएमई) के शोधकर्ताओं की एक टीम ने जम्मू-पुंछ राष्ट्रीय राजमार्ग पर सियार के एक जोड़े को मरा हुआ पाया। वन्यजीव शोधकर्ता नीरज शर्मा आईएमई की उस टीम का हिस्सा थे, जो उस दिन फ़ील्ड सर्वेक्षण के लिए निकली थी। उन्होंने कहा, “अफसोस की बात है कि मादा सियार गर्भवती थी। यह घटना मुझे परेशान करती रही। अगले कुछ सालों में, हमने बंदरों, लंगूरों, नेवले, गिलहरियों, लोमड़ियों, तेंदुओं, पक्षियों, सरीसृपों आदि जैसे जंगली जानवरों से जुड़ी ऐसी भयानक सड़क दुर्घटनाओं में लगातार वृद्धि देखी है।”

भारत में उत्तर-पश्चिमी हिमालय में वन्यजीवों की सड़क दुर्घटना में मौत एक बड़ी समस्या है। यह क्षेत्र एक वैश्विक जैव विविधता हॉटस्पॉट है जो तेंदुए, गंभीर रूप से लुप्तप्राय हंगुल या कश्मीर बारहसिंगा, भूरे भालू, संकटग्रस्त होने के करीब मार्खोर और हिमालयी ग्रिफॉन सहित अन्य प्रजातियों का घर है।

जैसे-जैसे वन्यजीवों के आवासों के पास से गुजरने वाली सड़कों पर वाहनों का दबाव बढ़ता जा रहा है, टक्कर लगने के बाद मरने वाले या घायल होने वाले जानवरों की संख्या में वृद्धि हो रही है। जम्मू और कश्मीर ट्रैफिक पुलिस के अनुसार, 2008 में जम्मू और कश्मीर में 6,68,445 वाहन थे। बाद के सालों में यह संख्या बढ़ती गई। 2010, 2011 और 2012 में वाहन संख्या में क्रमशः 10.34%, 11.92% और 11.98% की वृद्धि हुई। वहीं 2012 में 9,16,898 वाहन दर्ज किए गए। 2022 तक जम्मू-कश्मीर में लगभग 14 लाख वाहन पंजीकृत थे, जो पिछले 14 वर्षों में 100% बढ़ोतरी का संकेत देता है। इसके साथ ही, केंद्र शासित प्रदेश में राष्ट्रीय राजमार्गों की संख्या 2014 में सात से बढ़कर 2021 में 11 हो गई है। 2015 में भी 40,900 करोड़ रुपये की बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की घोषणा की गई थी।
पूरी रपट- मोंगाबे हिंदी