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जमीन पर छवि चमकदार नहीं- हरि जयसिंह

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बहुआयामी शख्सियत के धनी हैं। आज जब वे प्रधानमंत्री के रूप में अपने कार्यकाल का एक साल पूरा कर रहे हैं तो उनके शुभचिंतक-प्रशंसक और उनके निंदक-आलोचक दोनों ही अलग-अलग दृष्टिकोणों से इसकी समीक्षा कर रहे हैं। सोनिया और राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने इस एक साल में यह तो स्पष्ट कर ही दिया है कि आर्थिक सुधारों की डगर पर वह विपक्ष के रूप में मोदी सरकार का साथ नहीं देने वाली। यह साफ है कि कांग्रेस आज नकारात्मक राजनीति कर रही है। वास्तव में वह आज भी लोकसभा चुनावों में मिली करारी हार से उबर नहीं सकी है। कांग्रेस के साथ ही समाजवादी-वामपंथी पार्टियां आज भी भाजपा को सांप्रदायिक पार्टी के रूप में देखती हैं और उन्हें लगता है कि उनका अल्पसंख्यक कार्ड सदाबहार सेकुलर रहने वाला है।

बहरहाल, मोदी सरकार के एक साल के कार्यकाल की समीक्षा करते समय सांप्रदायिकता बनाम सेकुलरिज्म की नेहरू के जमाने की पुरानी बहस में पड़ने की मेरी कोई मंशा नहीं है। इससे तो बेहतर होगा कि तथ्यों के आधार पर सरकार के कार्यकाल की पड़ताल की जाए और यह देखा जाए कि मोदी को वोट देकर जिताने वाले युवा वर्ग के लिए उनका 'सबका साथ सबका विकास" का मंत्र कितना कारगर साबित हो सका है। लाख टके का सवाल यही है कि प्रधानमंत्री किस हद तक इसमें सफल हो सके हैं।

मेरा मानना है कि प्रधानमंत्री के इरादे नेक हैं और वे अपने लक्ष्यों को पूरा करने के लिए कमर कसे हुए हैं। वे भारत को तेज आर्थिक विकास की राह पर ले जाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। आर्थिक मोर्चे पर वे एकाग्र हैं, हालांकि उनकी प्राथमिकताएं अकसर गड्ड-मड्ड नजर आती हैं। बहरहाल, हमें यह स्वीकार करना होगा कि प्रधानमंत्री के पास कोई अलादीन का चिराग नहीं है, जिससे कि वे रातोंरात देश के हालात बदल देंगे। भारत जैसे जटिल और विविधतापूर्ण देश में स्थायी बदलाव लाना एक दीर्घकालिक चुनौती है। यह काम महज एक-दो साल में नहीं हो सकता। हमें केवल यही देखना होगा कि मोदी सरकार पटरी पर चल रही है या नहीं। यह कहना तो खैर ठीक नहीं होगा कि सरकार पूरी तरह से सही दिशा में चल रही है। उसके कुछ महत्वपूर्ण आर्थिक निर्णय भी राजनीतिक कारणों से लंबित हैं।

स्टॉक मार्केट में उतार-चढ़ाव का दौर भले ही बदस्तूर जारी हो, लेकिन भारत की स्टैंडर्ड एंड पुअर रेटिंग 'स्थायी" से सुधरकर 'सकारात्मक" हो गई है। यहां तक कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक ने भी भारत की विकास दर 7.5 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है। दूसरी तरफ सामाजिक सुरक्षा के क्षेत्र में मोदी सरकार ने एक साल की अवधि में उल्लेखनीय काम किया है। जन-धन योजना, प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना, जीवन ज्योति बीमा योजना, अटल पेंशन योजना, मेक इन इंडिया, स्वच्छता अभियान के साथ ही सरकारी कार्यालयों में बेहतर कार्यसंस्कृति का निर्माण, विदेशों में देश की बढ़ती कीर्ति, सहकारी संघवाद की दिशा में उल्लेखनीय कार्य सरकार की उपलब्धियों में शुमार हैं।

इसके बावजूद आज प्रधानमंत्री मोदी छवि और धारणा के संकट से जूझ रहे हैं। उनका और उनके समर्थकों का मानना है कि प्रधानमंत्री की छवि चमकदार है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही नजर आती है। बाजार की तरह राजनीति में भी आम धारणा का खासा महत्व होता है। अटल सरकार के समय वित्त मंत्री रह चुके यशवंत सिन्हा इस बात को अच्छे-से समझते हैं। एक साक्षात्कार में वे कहते हैं कि 'आज चुनावी राजनीति में कुछ करने से भी ज्यादा यह जरूरी हो गया है कि लोग समझें कि आप कुछ कर रहे हैं। आपको अपने बारे में यह धारणा निर्मित करनी पड़ती है कि आप वाकई कुछ महत्वपूर्ण कर रहे हैं।"

तो क्या यह इस बात का द्योतक है कि अपने विराट सूचना तंत्र के बावजूद सरकार अपने पक्ष में आम राय निर्मित करने में नाकाम हो रही है। सूचना-प्रसारण मंत्रालय में अरुण जेटली जैसे मीडिया-उन्मुख मंत्री के होने से संवाद में तो कोई दिक्कत नहीं हो सकती, हां, संवाद की सामग्री और उसकी गुणवत्ता जरूर चिंता का विषय हो सकती है। शायद मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में उनके प्रति नकारात्मक धारणा निर्मित होने में उनकी अत्यधिक विदेश यात्राओं का एक अहम योगदान रहा। निश्चित ही, मोदी सैर करने के लिए विदेश यात्राओं पर नहीं गए थे और उन्होंने ऐसा करके अपने समय की बर्बादी नहीं की है, लेकिन इससे लोगों के मन में यह धारणा निर्मित हुई कि घरेलू नीति पर उनका ध्यान अपेक्षाकृत कम है। भूमि अधिग्रहण कानून पर सरकार का अड़ियल रुख भी उसे भारी पड़ रहा है। जब देश के किसान पहले ही मुश्किलों से जूझ रहे थे, तब भूमि कानून को लेकर सरकार के आग्रह का फायदा कांग्रेस ने उठा लिया और सरकार के खिलाफ यह आम धारणा निर्मित करने में सफल रही कि वह किसान-विरोधी है। बाजारों और मंडियों में कीमतों में उतार-चढ़ाव का दौर जारी रहा, लेकिन इस उतार-चढ़ाव का लाभ उपभोक्ताओं और किसानों तक नहीं पहुंचा, जमीनी स्तर पर यह सरकार की नाकामियों में से एक है। खासतौर पर हमारे कृषि क्षेत्र में बुनियादी रूप से कुछ गलत है और किसान आज भी सूदखोरों के चंगुल से मुक्त नहीं हो सके हैं।

यह अकारण नहीं है कि मोदी सरकार के सत्ता में आने के बावजूद किसानों द्वारा आत्महत्या करने का सिलसिला बना हुआ है। यह प्रधानमंत्री कार्यालय की नाकामी थी कि वह कृषि के क्षेत्र में निर्मित हो रहे हालात की परख नहीं कर पाया। अपनी विदेश यात्राओं में व्यस्त प्रधानमंत्री का ज्यादा ध्यान एनआरआई समुदाय को लुभाने पर केंद्रित रहा, जिससे यह धारणा भी बनी कि उन्हें किसानों की समस्याओं से ज्यादा सरोकार नहीं है। मेरा स्पष्ट मत है कि प्रधानमंत्री मोदी को इस धारणा को तोड़ने के लिए विशेष जतन करने चाहिए थे, जो कि उन्होंने नहीं किए। उन्हें इस मोर्चे पर ज्यादा सक्रिय, ज्यादा प्रभावी नजर आना चाहिए था और उन्हें विदर्भ, हरियाणा आदि जगहों पर व्यक्तिगत रूप से जाकर समस्याग्रस्त किसानों से भेंट करनी चाहिए थी। प्रधानमंत्री को यह याद रखना चाहिए कि उन्हें चुनाव जिताने वाले उद्योगपति और एनआरआई नहीं, ये ही किसान और गरीब लोग थे। इनकी अनदेखी करके वे लंबे समय तक राजनीति में सफल नहीं हो सकते। फिर कालेधन और भ्रष्टाचार की भी समस्याएं हैं, जिनके निपटारे के लिए प्रधानमंत्री का देश में लगातार उपस्थित रहकर काम करना बहुत जरूरी है। अलबत्ता अपने सहकारी संघवाद की 'टीम इंडिया" वाली धारणा को लेकर वे सही हैं, क्योंकि भारत जैसे देश का राजकाज कभी भी दिल्ली में बैठकर नहीं चलाया जा सकता। लेकिन इसके लिए भी उन्हें नीति-निर्माण में विकेंद्रीकरण पर जोर देना होगा और नौकरशाहों पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता से बचना भी उनके लिए बेहतर ही होगा।

(लेखक द ट्रिब्यून प्रकाशन समूह के पूर्व एडिटर-इन-चीफ हैं। ये उनके निजी विचार हैं)