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जरूरी है छोटे किसानों के लिए वैकल्पिक खेती : डॉ हैदर

मडुवा की खेती कर खाद्य सुरक्षा के साथ पोषण सुरक्षा के लक्ष्य को भी हासिल किया जा सकता है. सीमांत किसानों के लिए यह आवश्यक है कि धान के अलावा वह वैकल्पिक खेती अवश्य करें. इसमें मडुवा, सरगुजा, कुरथी, गुंदली व दूसरे किस्म की फसल शामिल हैं, जो पानी की कम मात्र होने पर भी अच्छी उपज दे सकते हैं. वैकल्पिक खेती पर बिरसा कृषि विश्वविद्यालय के जैवप्रोद्योगिकी विभाग के डीन डॉ जेडए हैदर से शिकोह अलबदर ने बात की. प्रस्तुत है बातचीत के मुख्य अंश:

किसान वैकल्पिक खेती क्यों करें और क्या रणनीति होनी चाहिए?
झारखंड व बिहार के किसानों के संदर्भ में दो बातें सामने हैं. पहली बात यह है कि आबादी तो बढ़ रही है. जिनके पास एक जमाने में 25 एकड़ जमीन होती थी अब वह घर में बंट कर 12 एकड़ हो गयी है. फिर वह अगली पीढ़ी में बंट कर उससे कम हो गयी. यानी पीढ़ी बढ़ने के साथ लैंड होल्डिंग घट रही है. दूसरी बात जो ध्यान देने योग्य है वह है वर्षा. झारखंड में यदि पिछले 50-52 सालों का रिकार्ड देखा जाये तो हम पाते हैं कि एक-दो साल को छोड़ कर 1200 से 1300 मिली मीटर बारिश यहां हुई है. एक दो बार ही ऐसा हुआ है, जब 800 से 800 मिली मीटर बारिश हुई है. कभी-कभी बारिश 2200 से 2300 मिमी तक हुई है. 


सवाल यह है कि जिस तरह ऊंट एक बार पानी पीकर पानी को अपने शरीर में जमा कर रख सकता है या दूसरे मवेशी भोजन कर उसे अपने शरीर में रख सकता है, वैसा गुण प्रकृति ने मनुष्य और पौधों को नहीं दिया है. यानी आवश्यकता के अनुरूप पौधों को एक अंतराल पर पानी देना आवश्यक है. जब से मौसम में तब्दीली होना प्रारंभ हुआ है, तब से फसल के उत्पादन पर भी प्रभाव पड़ा है. जून में मॉनसून आया, जुलाई में बारिश हुई, अगस्त में सूखा पड़ गया और सितंबर तथा अक्तूबर के महीने में खरीफ फसल के पकने का समय आया तो फैलिन और एलिया जैसे तूफान के कारण फसल बरबाद हो गयी.

इसमें दूसरी फसल जैसे मकई भी बरबाद हो गयी. गीली मिट्टी से बादाम नहीं उपज सका. यानी 500 से 600 मिमी बारिश पहले हुई और फैलिन-एलिया के कारण 1200 से 1300 मिमी बारिश की भरपाई हो गयी लेकिन फसल बरबाद हो गयी. यहां के किसानों को सिंचाई की सुविधा नहीं है. यदि वर्षा हुई तो बीज लगाने का समय खत्म हो गया. मॉनसून पर आधारित खेती एक जुआ है. ऐसे में जब मौसम में बदलाव हो रहा हो,  तो वर्षा का पैटर्न क्या होगा, ऐसे हालात में किसानों को  क्या करना चाहिए उन्हें नहीं मालूम होता है. ऐसे में छोटे किसान सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं. उन्हें खेती की एक विशेष रणनीति अपनानी होगी. छोटे किसान जिनके पास कम भूमि है और वह खेती पर आश्रित हैं, उन्हें खेती की एक रणनीति के तहत अपनी जमीन को 10 या 20 प्रतिशत हिस्सा बांट देना चाहिए. यानी एक हिस्से में किसान धान की खेती करें और दूसरे हिस्से में दूसरी फसलों को भी लगायें. रागी या मडुवा जैसी फसल को अधिक पानी की जरूरत नहीं होती है और यह 180 से 200 मिमी तक वर्षा होने पर भी उपज देती है. ओस से भी ऐसी फसलों के लिए पानी की पूर्ति हो जाती है.

वैकल्पिक खेती के रूप में मडुवा का उत्पादन करना कितना बेहतर है? खाद्य पदार्थ की दृष्टि से भी इसका क्या महत्व है?
मेरे 28 साल के अनुसंधान का अनुभव यह बताता है कि 1300 से 1700 या 500 से 600 मिमी बारिश होने पर भी इसकी उपज में अंतर नहीं आता है. ऐसी फसल खाने को अवश्य ही देते हैं. मडुवा की खेती में एक अच्छी बात यह है कि इसका किसान भंडारण लंबे समय तक के लिए कर सकते हैं. इसके दाने में कीट नहीं लगता है. यह आठ से दस साल तक सुरक्षित रखा जा सकता है. मडुवा को समय समय पर बेच भी सकते हैं. मडुवा अकाल फसल की तरह इस्तेमाल की जा सकती है. धान या दूसरी फसलों में एक साल अथवा दो साल तक बीज छोड़ देने पर अंकुरण नहीं होने से नुकसान होता है. मडुवा में ऐसा नहीं है. इसमें अंकुरण 100 प्रतिशत होता है और कम हुआ तो 98 प्रतिशत तक अंकुरण होता ही है. किसानों को बीज के मामले में बहुत कम नुकसान होता है. यहां दो तरह की समस्या है. पहली समस्या है खाद्य सुरक्षा, दूसरी समस्या है पोषण सुरक्षा. खाद्य सुरक्षा के विषय में यदि बात की जाये तो यह बुरे मॉनसून की स्थिति में मडुवा खाया जाने वाला अनाज है. अब पोषण सुरक्षा पर नजर डाली जाये तो मडुवा में पोषक तत्व काफी मौजूद हैं. गेहूं, चावल की अपेक्षा इसमें फॉस्फोरस की मात्र अधिक होती है जो बच्चों के दिमाग के लिए बहुत अधिक फायदेमंद है. इसमें केल्शियम होता है जो हड्डी के लिए फायदेमंद है. खून में लौह तत्व की कमी को यह पूरा  करता है, क्योंकि इसमें आयरन पर्याप्त मात्र में है. औरतों और बच्चों के लिए मडुवा काफी उपयोगी है. इसके अलावा इसमें अमिनो एसिड भी है.  धान और गेहूं में जो पोषक तत्व नहीं मिलते हैं, वह मडुवा में मिलते हैं. इसके साथ ही सुगर यानी मधुमेह की बीमारी के लिए यह काफी कारगर है. रक्त में चीनी की अधिकता होने के कारण बीमारी से ग्रस्त लोगों को चावल, आलू आदि मना होता है. मडुवा सुगर वाले लोगों के लिए बेहतरीन व्यंजन है. इसके काबरेहाइड्रेट धीरे-धीरे टूटते हैं. यह शरीर में भी अच्छी तरह लगता है.

किसानों को प्रत्येक साल एक बड़ी राशि बीजों तथा खाद की खरीद पर व्यय करनी पड़ती है. यहां पर आप क्या सलाह देना चाहेंगे?
दूसरी फसलों की खेती के लिए हाइब्रिड बीज खरीदना पड़ता है. लेकिन मडुवा के बीज में मिलावट नहीं हो सकती है, क्योंकि इसके फूल प्राकृतिक तौर पर ऐसे हैं कि इसमें मिलावट नहीं की जा सकती है. ऐसी संभावना नहीं के बराबर है. इसके बीज अपने पास आप रख सकते हैं. बीज खरीदने की जरूरत भी नहीं पड़ती. यदि हम सारी आबादी को दो हिस्सों में बांट दें तो एक हिस्सा ग्रामीण आबादी है और दूसरा हिस्सा शहरी आबादी है. मडुवा साधारणत: भूरे रंग का होता है. उसकी रोटी कालापन लिए होती है. लेकिन शहरी आबादी को देखते हुए सफेद मडुवा की किस्म तैयार की गयी है. झारखंड व्हाइट मडुवा -1 को विकसित किया गया है और इसका रोटी सफेद होती है. इसके बेकरी उत्पाद भी सफेद होते हैं. शहर के लोगों के लिए ही यह निकाला गया है. लोग इसे पसंद करते हैं. दूसरी वेराइटी बीबीएम-10 ( बिरसा ब्राउन मडुवा-10) को अगले साल रिलीज किया जायेगा. इससे पहले ए 404 तथा बीएम-2 आयी थी. यह अच्छी किस्म थी और इसके मुकाबले पहले कोई बढ़िया किस्म नहीं आया था. बीबीएम-10 को राष्ट्रीय स्तर पर दूसरा स्थान प्राप्त हुआ था. इसका चिंयाकी, दाड़ीसाई और दुमका जोन में परीक्षण किया गया था. इसका प्रदर्शन काफी अच्छा था. सभी किस्मों को अलग-अलग प्लाट में लगाया गया था और यह देखने की कोशिश की गयी थी

कि कौन-सी किस्म किसको टक्कर दे रहा है. बीबीएम 10 ने सबसे अच्छा प्रदर्शन किया था. इस किस्म का उपज सबसे अधिक रहा. मडुवा के लिए कोई दवा देने की जरूरत नहीं है. रोग हो सकता है लेकिन मात्र दो प्रतिशत तक ही. दवा का छिड़काव बिल्कुल न करें. हां खरपतवार नियंत्रण अवश्य करें.

मडुवा की खेती में किसानों को किस प्रकार की चुनौती का सामना करना पड़ता है?
मडुवा की खेती में किसी प्रकार की चुनौती नहीं है. लोगों के फूड हैबिट बदले हैं. पहले सभी मडुवा खाते थे, लेकिन अच्छे अनाज के उत्पादन से मुंह का टेस्ट बदला है. मौसम में हो रहे बदलाव के कारण भी अब मडुवा उत्पादन मजबूरी हो रही है. ऐसी फसलों को लाना जरूरी है. खेती में चुनौती नहीं है और खाद्य तथा पोषण सुरक्षा के लिए भी यह जरूरी है. हां किसानों के लिए जरूरी है कि वो पानी का संचय अपने खेतों में एक गड्डा बना कर जरूर करें. यह जीवन रक्षक के रूप में काम करेगा. खेत के दूसरे हिस्से में लगी फसलों को किसान बचा सकते हैं. दूसरी ओर यह ध्यान रखें कि यहां का मौसम अनुमान इतना शक्तिशाली नहीं है कि जो कहा गया हो वही हो. इसके लिए यदि किसान के पास कम भूमि है वो वैकल्पिक खेती जरूर करें. अपने खेतों में गुंदली लगायें. 55 दिन में फसल काट लें. इसके तुरंत बाद कुरथी लगा दें. सरगुजा लगायें. गुंदली के बाद कुरथी लगाने से अधिक फायदा है. मेरा यह अनुभव बताता है.

कम पानी वाली फसल के क्षेत्र में नये शोध क्या हो रहे हैं?
नये शोध किये जा रहे हैं. हम धान की ऐसी किस्म विकसित करने की दिशा में काम कर रहे हैं जो तीन सप्ताह तक पानी नहीं मिलने पर भी जिंदा रहें. साथ ही एक दूसरा काम करना चाह रहे हैं कि मडुवा कम पानी में होता है. इसमें कोई ऐसी शक्ति है, जिसके कारण ऐसा होता है. उस शक्ति को यानी जीन को निकाल कर हम धान में स्थापित करने की दिशा में शोध करने का प्रयास कर रहे हैं. अगर ऐसा हो सकेगा तो धान की पैदावार कम पानी व विपरीत परिस्थितियों में भी बेहतर हो सकेगी.

 

डॉ जेडए हैदर

डीन, जैव प्रोद्योगिकी विभाग, बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, रांची