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झारखंड की अखंड लूट-विनोद कुमार

जनसत्ता 15 नवंबर, 2013 : तेरह साल पहले झारखंड राज्य का गठन हुआ था। झारखंड आंदोलन की काट में वनांचल आंदोलन खड़ा करने वाली भाजपा ने झारखंड राज्य का गठन क्यों किया, इसको लेकर अलग-अलग धारणाएं हैं। कुछ लोगों का मानना है कि अविभाजित बिहार की सत्ता पर काबिज होने की कोशिशों में विफल होने के बाद भाजपा ने अपने प्रभाव वाले इलाके की सत्ता पर काबिज होने की मंशा से बिहार का विभाजन किया। वहीं कुछ की समझ है कि बहुदेशीय कंपनियों के हित-साधन और खनिज संपदा की लूट का मार्ग प्रशस्त करने के लिए उन्होंने यह काम किया।

लेकिन झारखंड आंदोलन से जुड़े प्रबुद्ध नेताओं और झारखंडी जनता के दिमाग में अलग राज्य को लेकर लक्ष्य स्पष्ट था- झारखंडी अस्मिता और संस्कृति की रक्षा, जिसके लिए वह सदियों से संघर्ष करती रही है, कुरबानी देती रही है। क्या है यह झारखंडी अस्मिता और संस्कृति? सामाजिक क्षेत्र में यह आकांक्षा वर्गविहीन, जातिविहीन, छुआछूत-मुक्त, औरत-मर्द की बराबरी वाले समाज के रूप में प्रगट होती है, तो आर्थिक क्षेत्र में जीवन के संसाधनों- जल, जंगल, जमीन- के सामूहिक उपयोग के रूप में।

यह सही है कि खुटखट्टीदारी व्यवस्था अब आदिवासी समाज में भी नहीं रही, लेकिन जमीन अब भी नितांत व्यक्तिगत संपत्ति नहीं, गांव की संपत्ति ही है। उसकी खरीद-फरोख्त के पहले गांव की सहमति अनिवार्य है। राजनीतिक क्षेत्र में बहुमत और अल्पमत पर आधारित ‘लोकतंत्र’ की जगह सर्वानुमति के ‘स्वशासन’ के रूप में हम इस विशिष्ट पहचान को देख सकते हैं, तो कला और संस्कृति के क्षेत्र में आभिजात्य संस्कृति के मंच और दर्शक-दीर्घा की जगह एक खुले रंगमंच को देख सकते हैं, जहां दर्शक और कलाकार में कोई फर्क नहीं रहता। क्योंकि यहां ‘चलना ही नृत्य है और बोलना ही गीत’। और चलना और बोलना तो हर कोई जानता है।

आदिवासी और गैर-आदिवासी समाज के फर्क को जमीन के साथ मनुष्य के संबंधों के आईने में भी देख सकते हैं। गैर-आदिवासी समाज आदिम साम्यवादी व्यवस्था, सामंतवाद, राजशाही और लोकतांत्रिक व्यवस्था के दौर से गुजरा है और वहां जमीन किसान की नहीं होती। सामंतवादी व्यवस्था में जमीन सामंत की, तो राजशाही के दौर में राजा की। लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी जमीन रखने वाले हर व्यक्ति को लगान देना पड़ता है। लेकिन आदिवासी समाज में जमीन उसकी होती है, जो खेती के लिए जमीन को तैयार करता है। इसलिए आदिवासी समाज जमीन के लिए किसी तरह का टैक्स देने को तैयार नहीं। अपने इस हक के लिए उसने निरंतर संघर्ष किया है।

तिलका मांझी, सिद्धो कान्हू, और बिरसा मुंडा का संघर्ष अपने इसी नैसर्गिक अधिकार के लिए था और उन संघर्षों की ही परिणति जनजातीय क्षेत्र के लिए विशेष भू-कानूनों के रूप में हम आज देख रहे हैं। ‘पेसा’ कानून के द्वारा उनके स्वशासन के अधिकार को और मजबूत बनाने की पेशकश हुई। लेकिन आदिवासियत की मूल भावना को सैद्धांतिक रूप से स्वीकार करने के बावजूद उसे जमीन पर उतारने की कोशिश नहीं हुई, उसी तरह जिस तरह सरकार ने वन कानून बनाया तो जरूर, लेकिन उसे राज्य में लागू नहीं किया जा सका है।

उम्मीद थी कि अलग राज्य बनने के बाद झारखंड में आदिवासी समाज के इस वैशिष्ट्य को अक्षुण्ण रखने की कोशिश होगी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। अलग राज्य के नाम पर सत्ता का एक और केंद्र विकसित हो गया जहां राजनेताओं, अधिकारियों और ठेकेदारों के लिए लूट का तो अपार अवसर है, लेकिन झारखंडी जनता की स्थिति पहले से बदतर होती जा रही है। हाल के एक सर्वेक्षण के अनुसार प्रतिव्यक्ति आय की दृष्टि से झारखंड सबसे निचले पायदान पर है। सरकारी आंकड़ों की ही बात करें तो राज्य के पैंतालीस फीसद से अधिक लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन बसर कर रहे हैं।

एक बड़ी आबादी मलेरिया और तपेदिक जैसी बीमारियों से आक्रांत है। आदिम जनजातियों में से कई मिटने के कगार पर हैं। आजादी के आसपास राजमहल की पहाड़ियों में बसे पहाड़िया आदिवासियों की संख्या ढाई लाख के करीब थी, जो घट कर पैंसठ-सत्तर हजार के करीब पहुंच गई है।

यह सब तब हो रहा है, जब राज्य का वार्षिक बजट लगातार बढ़ते-बढ़ते अट्ठाईस हजार करोड़ को पार कर चुका है। अविभाजित बिहार में, कुल बजट में महज हजार बारह सौ करोड़ का हिस्सा दक्षिण बिहार को मिलता था। लेकिन बजट में इस विशाल बढ़ोतरी का फायदा राज्य की जनता को नहीं मिलता। इसकी एक प्रमुख वजह तो यह कि बजट की कुल राशि का पचास फीसद से भी अधिक गैर-योजना मद, यानी मंत्रियों, विधायकों, अधिकारियों और राज्य के सरकारी कर्मचारियों के वेतन-सुविधाओं पर खर्च होता है और शेष बची राशि योजना-मद यानी विकास योजनाओं पर खर्च होती है।

यह भी होता है कि गैर-योजना मद की राशि तो शत-प्रतिशत खर्च हो जाती है, लेकिन योजना-मद की राशि खर्च नहीं हो पाती और जितनी खर्च होती है उसका बड़ा हिस्सा लूट-खसोट की भेंट चढ़ जाता है। इसके लिए किसी प्रमाण की जरूरत नहीं।

पिछले दस वर्षों में राज्य के विकास के नाम पर क्या कुछ हुआ, इसकी पड़ताल हम नंगी आंखों से कर सकते हैं। जन-हित का कोई एक काम सरकार ने ऐसा किया हो, जिस पर गर्व किया जा सके, नहीं दिखता। हां, बढ़ी हुई वेतन-सुविधाओं और विकास-मद की राशि की लूट-खसोट से अर्जित संपत्ति की बदौलत गिने-चुने शहरों में

रिहायशी कॉलोनियां बन रही हैं, राज्य की खस्ताहाल सड़कों पर बेशुमार कीमती गाड़ियां दौड़ती नजर आने लगी हैं। लेकिन उनसे परे विपन्नता का वही महासागर, कुपोषित बच्चे, एनीमिया पीड़ित औरतें। आदिवासी अपने शारीरिक सौष्ठव के लिए जाने जाते थे, लेकिन अब गांवों में ऐसे औरत-मर्द नहीं दिखते।

राजनीतिकों का पेट इतने से नहीं भरा। आदिवासियों-मूलवासियों के विकास के लिए बने बजट का बड़ा हिस्सा चट कर जाने के बाद भी उनकी हवस खत्म नहीं हुई। अब वे राज्य की खनिज संपदा और जल, जंगल, जमीन बेचने में जुट गए हैं। बाबूलाल मरांडी से लेकर अब तक के तमाम मुख्यमंत्रियों में कई भिन्नताएं हैं। लेकिन विकास को लेकर उनकी दृष्टि एक जैसी है। सभी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ करार (एमओयू) कर राज्य में कल-कारखानों का जाल बिछाना चाहते हैं। अब तक घोषित रूप से सैकड़ों एमओयू हो चुके हैं। अघोषित रूप से भी चोरी-छिपे लौह अयस्क और कोयले का पट्टा बेचा जा रहा है। जनता के प्रबल विरोध की वजह से इक्का-दुक्का एमओयू को छोड़ कर कोई जमीन पर नहीं उतरा है।

हालांकि झारखंड सरकार और उसकी पुलिस कंपनियों का लठैत बन कर झारखंडी जनता का दमन करने के लिए मैदान में उतर चुकी है। तपकारा में बाबूलाल मरांडी की सरकार ने गोली चलवाई तो काठीकुंड में शिबू सोरेन की सरकार ने। लेकिन दमन के बावजूद जनता झुकने को तैयार नहीं। इसलिए अब सीएनटी एक्ट जैसे विशेष कानूनों के संशोधन को लेकर ही बहस शुरूहो गई है।

बाबूलाल मरांडी ने अपने मुख्यमंत्रित्व-काल में छोटा नागपुर संथाल परगना किराएदारी अधिनियम में संशोधन की बात की थी। उनका कहना था कि आदिवासी जनता को यह अधिकार होना चाहिए कि वह अपनी जमीन बेच सके। उस पैसे से धंधा करके बेहतर जीवन जी सके। शिबू सोरेन और फिर हेमंत सोरेन के मुख्यमंत्री बनने के बाद भी इस तरह की बातें हो रही हैं। बात सुनने में अच्छी लगती है। खेती को अलाभकारी बताया जा रहा है। वैसे में आदिवासी अपनी भूमि बेच सके तो वह भी पैसा बना सकता है और उस पैसे से बेहतर जीवन बसर कर सकता है। मगर हम यह भूल जाते हैं कि जमीन की बेहतर कीमत शहर के आसपास होती है।

सुदूर ग्रामीण इलाकों में जमीन की वह कीमत नहीं मिलने वाली। और एक बार आदिवासी जमीन खरीद-फरोख्त के लिए उपलब्ध हो गई, तो सबसे पहले गांवों में बैठे महाजनों के हत्थे चढ़ेगी। ऐसा इतिहास में कई बार हो चुका है।

सिद्धो कान्हू का ‘हूल’ महाजनों के कब्जे से अपनी जमीन की मुक्ति का ही संघर्ष था, बिरसा का ‘उलगुलान’ उसी की अगली कड़ी। सत्तर के दशक में खुद शिबू सोरेन महाजनों से आदिवासियों की जमीन की मुक्ति का आंदोलन चला चुके हैं। आदिवासी नैसर्गिक रूप से अपनी जमीन से बंधा हुआ है। जंगल उससे छिन चुका। उसके क्षेत्र से गुजरने वाली नदियां उद्योगीकरण से होने वाले प्रदूषण और बड़ी-बड़ी सिंचाई-विद्युत परियोजनाओं की भेंट चढ़ चुकी हैं। एक बार जमीन उसके हाथ से निकली नहीं कि वह दर-दर का भिखारी हो जाएगा, उसका अस्तित्व ही संकट में पड़ जाएगा। कोई शक हो तो हमें एचइसी, बोकारो स्टील जैसे कारखानों से होने वाले विस्थापितों की स्थिति पर गौर करना चाहिए।

जरूरत इस बात की थी कि सरकार खेती को उन्नत करने के उपाय करती। सिंचित क्षेत्र का विस्तार करती। जंगल को कटने से बचाती और नदियों को प्रदूषण से मुक्त करती। भूमिगत जल-स्तर निरंतर गिरता जा रहा है, उसे रोकने की योजनाएं बनाती। झारखंड की धरती वैध-अवैध खुले खनन से विरूपित होती जा रही है। परती जमीन का निरंतर विस्तार हो रहा है। इन सबका मारक प्रभाव जल, जंगल, जमीन पर निर्भर आदिवासी समाज पर पड़ रहा है।

झारखंड के नेताओं को इन सबकी चिंता नहीं। झारखंड बनने के बाद से ही वे इसे लूटखंड बनाने की कोशिशों में लग गए थे और आज झारखंड की पहचान देश के भ्रष्टतम राज्य के रूप में है। इन्हीं सब का परिणाम यह भी है कि राज्य में उग्रवाद अपने पैर पसारता जा रहा है। झारखंड बनने के पहले उग्रवादियों की सक्रियता इसके कुछ ही जिलों तक सीमित थीं,आज लगभग सभी जिले उग्रवाद से आक्रांत हैं। हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि उग्रवाद से निपटने के लिए झारखंड को एक तरह से सुरक्षा बलों के हवाले कर दिया गया है।

क्या ग्रीन हंट अभियान वास्तव में उग्रवादियों से निपटने के लिए है? क्या माओवादी उनकी गिरफ्त में आने के लिए यहां के जंगलों में बैठे रहेंगे? नेपाल की तराई से बिहार, झारखंड, ओड़िशा होते हुए आंध्र प्रदेश तक की हरी पट्टी उनकी शरणस्थली है। यहां अभियान तेज हुआ तो वे वहां चले जाते हैं। मारी जाती है झारखंडी जनता। मारे जाते हैं शांतिपूर्ण तरीके से अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले लोग। कुछ लोगों का मानना है कि यह अभियान बहुदेशीय कंपनियों की मदद के लिए चलाया जा रहा है, ताकि जमीन अधिग्रहण के विरोध में चलने वाले शांतिपूर्ण आंदोलनों को भी उग्रवाद से निबटने के नाम पर कुचला जा सके। लेकिन जब तक जनता में असंतोष है, उग्रवाद को खाद मिलती रहेगी।