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टॉपर्स का कारखाना और कामयाबी के असल मायने- अभिजीत पाठक

बीते दिनों सीबीएसई के बारहवीं के नतीजे आए. इसमें कुछ आश्चर्यजनक नहीं है कि ‘सफलता' को पूजने वाले इस समाज में हर जगह ‘टॉपर्स' का गुणगान किया जाता है. जब टेलीविजन चैनल उनका इंटरव्यू करते हैं और अखबार उनकी- ‘कड़ी मेहनत', ‘एकाग्र अध्ययन', अभिभावकों की प्रेरक भूमिका- की कहानियां सुनाते हैं, तब हम सीखने के अनुभव और प्रदर्शन को आंकड़ों में बदलकर और मिथकीय बना देते हैं, जैसे- 499/500!

हालांकि ‘असफलताओं' की भी अनगिनत कहानियां हैं- मनोवैज्ञानिक तकलीफ, गणित और अंग्रेजी में ‘खराब' नबंरों के कारण लगने वाला सदमा और इसके चलते होने वाली आत्महत्याएं- मगर हम में से कई इस गढ़ी गई त्रासदी पर ध्यान नहीं देते है: यह त्रासदी है सामाजिक-शैक्षणिक इंजीनियरिंग की निर्मम प्रणाली, जो इंसानों को अलग छांटकर अनगिनत मानवीय संभावनाओं को खत्म कर देती है.

हम उनकी आलोचना करते हैं या फिर तरस खाते हुए उन्हें ‘दिलासा' देते हैं. आखिर ‘फेलियर' की परवाह करता कौन है? कहा गया है कि ‘सफलता' के कई दोस्त होते हैं, इसलिए आने वाले दिनों में हम मिथक में बदल दिए गए इन ‘टॉपर्स' के बारे में और जानेंगे- आईआईटी में दाखिला लेने की उनकी बेताबी या भारतीय विदेश सेवा में जाने की उनकी महत्वाकांक्षा.

इसका नतीजा यह होगा कि मध्यवर्गीय अभिभावक खुद को ज्यादा से ज्यादा असुरक्षित महसूस करेंगे; अपने बच्चों के प्रदर्शन की तुलना ‘टॉपर्स' से करेंगे. ऐसे में अगर कोई बच्चा अंग्रेजी में 97/100 भी लाता है, तो उसके अपने महत्वाकांक्षी और असुरक्षित अभिभावकों की डांट खाने की संभावना बढ़ जाएगी क्योंकि उन्हें पहले ही बताया जा चुका है कि टॉपर्स कड़ी मेहनत करते हैं, समय बर्बाद नहीं करते हैं और अंग्रेजी या फिजिक्स में 100/100 लाते हैं.

जी हां, कविता की मृत्यु हो जाएगी; विज्ञान के चमत्कार गुम हो जाएंगे; और अनुशासन में बंधे समय में ‘खेलने' भी पढ़ाई-लिखाई की दुनिया में लौटने के लिए तरोताजा होने के विकल्प के बतौर देखा जाएगा और नंबरों की अंधी दौड़ के सामने किसी भी अन्य चीज का कोई मोल नहीं रहेगा.

भले ही आपको घंटों-घंटों विलियम ब्लेक या रबींद्रनाथ टैगोर की कविताएं पढ़ना अच्छा लगता हो, लेकिन अगर आपके अंग्रेजी में 100/100 नहीं आए, तो आप कुछ नहीं माने जाएंगे- सिवाय एक आदर्शवादी मूर्ख के, जो इम्तिहान के चक्रव्यूह को नहीं भेद पाया.

‘सफलता' के फलसफे के जश्न के बीच एक सवाल मुझे परेशान करता रहता है: ये ‘टॉपर्स' कहां जाते हैं? हां, मुझे पता है कि वे आईआईटी और आईआईएम में मिल सकते हैं, वे एलएसआर या स्टीफेंस जैसे अग्रणी कॉलेजों में पाए जा सकते हैं और वे अर्थशास्त्र, मनोविज्ञान और अंग्रेजी साहित्य जैसे विषय वर्ग की ‘मार्केट' वैल्यू में और इजाफा करेंगे.

द वायर हिन्दी पर प्रकाशित इस कथा को विस्तार से पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें