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डिजिटल इंडिया: एक नजर--- रीतिका खेड़ा

जब सरकारी स्कूलों में, सरकार की ओर से इंटरनेट सुविधा उपलब्ध करवायी जायेगी, तो इसे किस उपयोग में लाया जायेगा? सरकारी स्कूलों में इंटरनेट आने से आप और हम शायद यह जवाब देंगे कि इंटरनेट सुविधा बच्चों की पढ़ाई में इस्तेमाल होगी. आजकल के संपन्न शहरी परिवारों के बच्चे, घर पर उपलब्ध स्मार्टफोन और टैब्लेट्स पर इंटरनेट से बहुत कुछ सीखते हैं. जब कंप्यूटर आये थे, तब इनका भी बच्चों की पढ़ाई में इस्तेमाल करने की उम्मीद थी, हालांकि कंप्यूटर खराब हो जाने के डर से, उन्हें लॉक रखा जाता था.

आश्चर्य की बात यह है कि आज जब झारखंड के सरकारी आवासीय स्कूलों में इंटरनेट आया है, तो इसका उपयोग बच्चों की शिक्षा के लिए नहीं किया जा रहा. इंटरनेट का बायोमेट्रिक अटेंडेंस लेकर, उसे ऑनलाइन उपलोड करने के लिए इस्तेमाल हो रहा है. कुछ समय के लिए, केवल शिक्षकों की हाजिरी दर्ज की जा रही थी. जून से, स्कूल में पढ़ रहे बच्चों की हाजिरी भी दर्ज की जा रही है, और इसे ऑनलाइन सभी देख सकते हैं. हम बायोमेट्रिक उपस्थिति आठ स्कूलों में देख सके.

ताज्जुब है कि जब हम स्कूलों में गये, तो जब बिजली और इंटरनेट थे, तब ऑनलाइन हाजिरी के अनुसार, उन स्कूलों में 100-130 बच्चे थे. खाने के समय लगभग 230 बच्चे उपस्थित थे! स्कूल शिक्षकों से पता चला कि 238 की स्वीकृत सीट और नामांकन है, लेकिन लगभग सभी स्कूलों में कुल बच्चों में से लगभग 40 बच्चों का आधार रेजिस्ट्रेशन नहीं हुआ, इसलिए वो उपस्थिति नहीं लगा सकते. बाकी 190 बच्चों में से (जिनका आधार है), एक स्कूल में मशीन 130-132 का अंगूठा पहचान रही थी.

अगले स्कूल में, 187 में से केवल 100 के आस-पास बच्चों का अंगूठा पहचाना जा रहा था. संक्षेप में: कागजी हाजिरी 230 के आसपास, वास्तव में लगभग 230 बच्चे और ऑनलाइन अटेंडेंस में केवल 100-190 बच्चे.

कुछ महीनों पहले, आपने पढ़ा होगा कि कैसे स्कूल में ‘फर्जी' बच्चों को मध्याह्न भोजन खिलाया जा रहा है; उन रिपोर्ट में बताया गया कि मास्टर लोग बढ़ा-चढ़ा कर हाजिरी बनाते हैं, और इस तरह मध्याह्न भोजन का पैसा चोरी होता है. खबर के अनुसार, नामांकन से आधार नंबर को जोड़ने से ‘फर्जी बच्चे' पकड़े गये. बाद में खबर आयी कि शायद जिन बच्चों को‘फर्जी' बताया गया, वे ऐसे बच्चे हैं, जिनका आधार नंबर नहीं है. यानी आधार नहीं, तो आप सरकार की नजर में फर्जी हैं, आप हैं ही नहीं.

आधार से बच्चे कैसे फर्जी हो जाते हैं, इसका अंदाजा ऑनलाइन आधार अटेंडेंस से आप लगा सकते हैं. ऐसे- कुछ बच्चों का आधार है नहीं, तो वो ऑनलाइन अटेंडेंस लगा ही नहीं सकते; और कुछ ऐसे हैं, जिनका आधार है, लेकिन मशीन उनकी उंगलियों के निशान नहीं पहचानती.
ऑनलाइन और पेपर उपस्थिति में जो अंतर है, वो ‘फर्जी' हुए. शिक्षक इतने बदनाम हो चुके हैं कि उनके द्वारा दी गयी हाजिरी और ऑनलाइन हाजिरी में यदि अंतर होगा, तो सब ऑनलाइन को ही मानेंगे. यानी, शिक्षक बच्चों की झूठी हाजिरी बना रहे हैं, ऐसा ही माना जायेगा.

सभी अध्यापकों को भ्रष्ट कहना-मानना भी उनके साथ नाइंसाफी है. बहुत-से शिक्षक ईमानदारी से काम कर रहे हैं. उनकी भी ऑनलाइन हाजिरी हो रही है, जो ऑनलाइन उपलब्ध है. एक स्कूल में ऑनलाइन हाजिरी के अनुसार, 14 में से 13 उपस्थित थे (एक टीचर डेप्युटेशन पर थे). जब हम दोपहर दो बजे स्कूल गये, तब वास्तव में केवल पांच टीचर थे.

शिक्षकों से पता चला कि उन्हें अपने लिए ऑनलाइन हाजिरी अच्छी लगती है, क्योंकि उनके बायोमेट्रिक्स में कोई दिक्कत नहीं. अब ऑनलाइन की वजह से वे सब 12 घंटे की शिफ्ट कर रहे हैं, ऐसा प्रतीत होता है. वास्तव में, काफी शिक्षक तो स्कूल में थे ही नहीं. रहते हुए वे कितना पढ़ा रहे हैं, यह अलग सवाल है.

किसी दिन मशीन चलती है, किसी दिन नहीं. कभी इंटरनेट-बिजली आती है, कभी नहीं. बच्चों की हाजिरी बनाने में 1-2 घंटे लग जाते हैं- कभी बिजली ना होने की वजह से मशीन डिस्चार्ज हो जाती है, कभी टॉवर नहीं होता और कुछ बच्चों का बायोमेट्रिक नहीं चढ़ता. यानी समय की हानि अलग से हो रही है.

आगे चल कर, यदि सरकार इस अविश्वशनीय ऑनलाइन उपस्थिति के अनुसार फंड देने लगेगी, तो आप समझ सकते हैं कि इसका शिक्षा पर क्या प्रभाव होगा. कुछ शिक्षक इस संभावना से चिंतित थे. बच्चों के नाम पर जा रहे पैसों की चोरी के लिए सरकार को चाहिए कि वह दोषी के खिलाफ कार्रवाई करे, न कि बच्चों पर गाज पड़े.

लेकिन, ज्यादा दुख की बात यह है कि स्कूल में इंटरनेट सुविधा होने के बावजूद इसे शिक्षा के उपयोग में नहीं लाया जा रहा, बल्कि नाकाम निगरानी की कोशिश में इस्तेमाल किया जा रहा है. देश की प्राथमिकताओं पर, न सिर्फ शिक्षा में, बल्कि और व्यापक रूप में भी, एक बड़ा सवाल खड़ा करता है.