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तम‍िलनाडु: बदलते मौसम का असर, पारंपर‍िक धान की खेती से दूर जा रहे क‍िसान

इण्डियास्पेंड, 20 दिसम्बर 

तमिलनाडु के ज‍िला तंजावुर की पंचायत ओझुगासेरी में रहने वाले दिनेश पांडीदुरई और उनके जैसे कई अन्य किसानों ने गर्मी ने लगने वाली धान की क‍िस्‍म सांबा ना लगाने का फैसला किया है।

लंबे समय तक ज्‍यादा गर्मी और उसके बाद मानसून सीजन में अच्‍छी बार‍िश ना होने की वजह से इस क्षेत्र का भूजल सूख गया है। पानी की द‍िक्‍कत उन खेतों में भी है जो कोल्लीडैम नदी से सिर्फ 100 मीटर की दूरी पर हैं। पानी में बढ़े हुए खारापान की वजह से भूजल का इस्‍तेमाल नहीं हो पा रहा ज‍िससे स्‍थ‍ित‍ि और बदतर हो गई है।

दो मुद्दे रिवर्स ऑस्मोसिस की प्रक्रिया से जुड़े हुए हैं: जैसे-जैसे गर्मी और बारिश की कमी भूजल स्तर को नीचे ले जाती है, समुद्र का पानी अंतरिक्ष में प्रवेश करता है और भूजल को प्रदूषित करता है। नमक मिट्टी की ऊपरी सतह पर चढ़ जाता है और फसलों को एक पतली सफेद फिल्म से ढक देता है।

अधिकांश किसानों ने गहरे पानी तक पहुंचने के लिए सबमर्सिबल बोरवेल लगवाये हैं और एक साल तक खेती की। बावजूद इसके पौधे जमने लगे, जलने लगे। पांडीदुरई बताते हैं, ''खारा भूजल मिट्टी और जड़ों को भी प्रभावित कर रहा है।'' "यह जड़ों को सूरज की रोशनी और पोषक तत्व प्राप्त करने से रोक रहा है इसलिए फसलें जल जाती हैं।"

इस क्षेत्र में सामान्य फसल चक्र में सांबा शामिल है। इस फसल की बुवाई अगस्‍त में शुरू होती है और अगस्‍त के आसपास 145 द‍िन में पक जाती है। इसके अलावा धान की क‍िस्‍म कुरुवई की बुवाई जूल-जुलाई में हो जाती है जो 120 दिन में पककर तैयार हो जाती है। 135 द‍िन में पकने वाली थलाडी की बुवाई सितंबर-अक्टूबर में होती है। यहां के किसानों का कहना है कि वे साल में अब बस दो फसल ही लगा रहे हैं। कहीं-कहीं तो एक फसल ही लगाई जा रही।

"जलवायु पर‍िवर्तन की वजह से हो रहे ग्लोबल वार्मिंग के परिणामस्वरूप अगले 15-20 वर्षों में तापमान में 1 से 1.5 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो सकती है।" जीए धीबाकरन बताते हैं जो तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय (टीएनएयू), कोयंबटूर में कृषि-जलवायु अनुसंधान केंद्र में कृषि विज्ञान के एसोसिएट प्रोफेसर हैं। “कृषि फसल उत्पादन बढ़ते तापमान के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है। वैज्ञानिकों ने विभिन्न फसल सिमुलेशन मॉडल के माध्यम से साबित कर दिया है कि तापमान वृद्धि किसी भी अन्य मौसम मापदंडों की तुलना में अधिक हानिकारक है और तापमान में एक डिग्री की वृद्धि से भी उपज में 10-25% की कमी हो सकती है।

पूरी रपट- इण्डियास्पेंड