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तेज इकोनॉमिक ग्रोथ का फॉर्मूला- भरत झुनझुनवाला

बाजार में मंदी का वातावरण है. महाराष्ट्र के औरंगाबाद शहर के सीमेंट विक्रेता ने बताया कि उसकी बिक्री 40 प्रतिशत कम हुई है. सूरत के टैक्सी वाले के ग्राहकों में कमी आयी है. अब उसकी टैक्सी माह में 6-7 दिन ही चलती है. बाकी खड़ी रहती है, चूंकि बाहर के व्यापारी कम ही आ रहे है.

बाजार में मांग के दो स्रोत हैं- घरेलू एवं विदेशी. लेकिन इस समय दोनों पर ग्रहण लग गया है. घरेलू मांग में कमी का कारण सरकार द्वारा खर्चों में कटौती है. विश्व बैंक तथा अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष द्वारा लगातार वकालत की जा रही है कि विकासशील देशों की सरकारों को अपने खर्चों में कटौती करनी चाहिए. इस कटौती से महंगाई नियंत्रण में आयेगी. विदेशी निवेशक भारत में भारी निवेश करेंगे. अर्थव्यवस्था चल निकलेगी. सरकार की यह रणनीति सफल होती दिख रही है. सितंबर 2013 में महंगाई दर 10.7 प्रतिशत थी, जो 2014 में 6.7 प्रतिशत और 2015 में 4.3 प्रतिशत पर आ गयी है. फिर भी विदेशी निवेश नहीं आ रहा है, ग्रोथ का यह स्रोत पस्त है और बाजार में मंदी छा रही है.

घरेलू मांग का दूसरा स्रोत देश की जनता की आय है. कर्मियों को मिलनेवाले वेतन में वृद्धि हो, तो वे बाजार से सामान खरीदते हैं. साॅफ्टवेयर जैसे क्षेत्रों में कर्मियों को ऊंचे वेतन मिल रहे हैं. बड़े और औद्योगिक शहरों में नये अपार्टमेंट-कॉम्प्लेक्स बन रहे हैं. इनके द्वारा कार, टीवी की खरीद भी बढ़ रही है. दूसरी श्रेणी ब्लू काॅलर कर्मियों की है, जैसे कंस्ट्रक्शन वर्कर, रिक्शा चालक तथा फैक्ट्रियों के अनस्किल्ड वर्कर्स. इनके रोजगार घट रहे हैं. सरकार द्वारा बड़ी आॅटोमेटिक फैक्ट्रियों को प्रोत्साहन देने से मेन्यूफैक्चरिंग में रोजगार का तेजी से हनन हो रहा है. साॅफ्टवेयर कर्मियों की बढ़ रही मांग की काट ब्लू काॅलर वर्कर की घट रही मांग के माध्यम से हो रही है. फलस्वरूप बाजार में मांग नहीं है.

मांग का तीसरा स्रोत निर्यात है. विदेशों में हमारे माल की मांग हो, तो हमारा बाजार चल निकलता है. ठीक उसी तरह, जैसे मंडी में भिंडी की मांग हो, तो किसान की इकाेनॉमी चल निकलती है. परंतु यह स्रोत भी शिथिल पड़ा हुआ है. अमेरिका में कुछ ग्रोथ हो रही है, पर यूरोप पस्त है. हमारे निर्यातों में पिछले दस माह में निरंतर गिरावट आ रही है. इस प्रकार मांग के तीनों स्रोत सूखे पड़े हुए हैं और बाजार में मायूसी है.

सरकार का मानना है कि आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने से सुधार होगा. पहला सुधार गुड्स एंड सर्विस टैक्स (जीएसटी) का है. निश्चित रूप से जीएसटी के लागू होने से राज्यों के बीच व्यापार सुगम हो जायेगा. दूसरे राज्यों से लाये गये माल के दाम में गिरावट आयेगी. सच यह है कि जीएसटी से बाजार में मांग घटेगी. वर्तमान में गरीब तथा अमीर द्वारा खपत की जानेवाली वस्तुओं पर अलग-अलग दर से सेल टैक्स लगता है. गरीब पर टैक्स कम तथा अमीर पर अधिक लगता है. जीएसटी लागू होने के बाद गरीब तथा अमीर पर एक ही दर से टैक्स लगेगा. गरीब 100 रुपये कमाता है, 90 रुपये खर्च करता है और 10 रुपये बचाता है. गरीब पर यदि 10 रुपये का अतिरिक्त टैक्स लगा दिया जाये, तो उसकी खपत में नौ रुपये की कमी आयेगी. अमीर 100 रुपये कमाता है, 10 रुपये खर्च करता है और 90 रुपये बचाता है. अमीर को 10 रुपये की टैक्स में छूट दे दी जाये, तो उसकी खपत में केवल एक रुपये की वृद्धि होगी. इस प्रकार जीएसटी से बाजार में कुल मांग में गिरावट आयेगी.

सरकार द्वारा प्रस्तावित दूसरा सुधार ब्याज दरों में कटौती का है. लेकिन इससे विशेष लाभ नहीं होगा. उद्यमियों द्वारा ऋण तब ही लिया जाता है, जब बाजार में मांग हो. मांग न होने के कारण सस्ते ब्याज के लालच में उद्यमी लोन नहीं लेंगे. तीसरा सुधार भूमि अधिग्रहण का है. यह भी जीएसटी जैसा है. भूमि के लिए अमीर को पैसे कम देने होंगे. अमीर की आय बढ़ेगी, परंतु उसकी खपत में मामूली वृद्धि होगी. भूमि के लिए गरीब को कम पैसे मिलेंगे. उसकी आय घटेगी और खपत में गिरावट आयेगी. सरकार द्वारा प्रस्तावित सुधारों से ग्रोथ बढ़ेगी नहीं, बल्कि घटेगी.

सरकार को अलग नीति अपनानी चाहिए. बड़ी आॅटोमेटिक फैक्ट्रियों पर अधिक टैक्स लगा कर छोटे उद्यमों को बढ़ावा देना चाहिए. ये अधिक मात्रा में रोजगार सृजित करते हैं. इससे बाजार में मांग बढ़ेगी. बुलेट ट्रेन और स्मार्ट सिटी के साथ छोटे शहरों की सड़क, पानी और बिजली आदि सुविधाओं में निवेश करना चाहिए. इससे छोटे शहरों में छोटे उद्योग बढ़ेंगे और बाजार में मांग बढ़ेगी. विश्व व्यापार संगठन में छोटे उद्योगों को संरक्षण देने की मांग उठानी चाहिए. छोटे उद्योगों, छोटे किसानों, छोटे व्यपारियों की तरफदारी करेंगे, तो बाजार में मांग बढ़ेगी और बड़ी फैक्ट्रियों द्वारा बनायी गयी कार तथा टीवी भी ज्यादा बिकेगी.