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दालों के बढ़ते दाम के बीच पढ़‍िए भारत में दलहन फसलों की उपेक्षा की पूरी कहानी

किसान तक , 17 अगस्त

इसमें कोई शक नहीं क‍ि भारत दुनिया का सबसे बड़ा दलहन उत्पादक है. लेक‍िन, इसमें भी कोई शक नहीं है क‍ि हम बड़े दाल आयातक भी हैं. सवाल यह है क‍ि ऐसा विरोधाभास क्यों? जवाब यह है क‍ि बढ़ती जनसंख्या की जरूरतों को पूरा करने के ल‍िए दलहन फसलों की ज‍ितनी खेती होनी चाह‍िए थी, उस गत‍ि से रफ्तार नहीं बढ़ी. आजादी के बाद से ही हमारी पॉल‍िसी ऐसी रही है ज‍िसमें गेहूं-धान की फसलों पर ज्यादा जोर द‍िया गया और दलहन फसलें पीछे छूट गईं. केंद्रीय कृष‍ि मंत्रालय के पुराने पन्नों को पलटने पर इसे लेकर द‍िलचस्प जानकारी सामने आती है. ज‍िसमें साफ पता चलता है क‍ि क्यों हम दालें इंपोर्ट करने पर मजबूर हैं. दरअसल, दालों के मामले में आत्मन‍िर्भरता की तरफ जो रास्ता जाता है उस पर हमने बहुत देर से चलना शुरू क‍िया. अब हम ज‍ितना एर‍िया और उत्पादन बढ़ाते हैं उससे ज्यादा तेजी से खपत बढ़ जाती है. 

अरहर (तूर) दाल भारत में सबसे ज्यादा खाई जाने वाली दालों में से एक है. इसका दाम 170 से 200 रुपये क‍िलो तक पहुंच गया है. अगर हम सरकारी आंकड़ों की बात करें तो प‍िछले एक साल में ही अरहर दाल का दाम प्रत‍ि क‍िलो 39 रुपये बढ़ गया है. दूसरी दालों का भाव भी लगातार र‍िकॉर्ड बना रहा है. अब यहां समझने वाली बात यह है क‍ि आख‍िर इसकी महंगाई की असली वजह क्या है? इसका सही जवाब जानने के ल‍िए हमें यह देखना और समझना पड़ेगा क‍ि क्या वाकई दलहन फसलों की खेती कम हो गई है या फ‍िर जनसंख्या वृद्ध‍ि के साथ उसका दायरा ज‍ितना बढ़ना चाह‍िए था वह नहीं बढ़ा?
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