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देशभर में नदियों को जीवित ईकाई मान्यता देने की मांग, सभी राजनीतिक पार्टियों को भेजा गया मसौदा

डाउन टू अर्थ, 05 अप्रैल

लोकसभा 2024 को चुनावी एजेंडे में पर्यावरण के मुद्दे को प्राथिमकता में लाने के लिए जन आंदोलन के राष्ट्रीय समन्वय ने सभी राजनीतिक दलों और उनके सांसदों  को अपने-अपने चुनावी घोषणा पत्र में पीपुल्स रिवर प्रोटेक्सन बिल को शामिल करने की मांग उठाई है। 

एक ऑनलाइन प्रेस कांफ्रेंस के दौरान जन आन्दोलन के राष्ट्रीय समन्वय की नेत्री मेधा पाटकर ने कहा कि  ‘2024 के लोकसभा चुनावों के मद्देनजर हम देश की राजनीतिक पार्टियों और सांसदों के लिए भारत में नदियों और तटवर्ती अधिकारों की सुरक्षा, संरक्षण और पुनर्जीवन के उद्देश्य से एक केंद्रीय कानून का प्रस्तावित मसौदा जारी कर रहे हैं। इस मसौदे के तहत 'हम बांधों, बैराजों, तटबंधों, जलविद्युत परियोजनाओं, व्यापक वाणिज्यिक और अवैध रेत खनन, सीवेज और अपशिष्ट डंपिंग, इंटरलिंकिंग और रिवर फ्रंट परियोजनाओं के निरंतर निर्माण का विरोध करते हैं।' इनके कारण भूमि उपयोग और जल विज्ञान में परिवर्तन ने देश में सतही और अंतर-जुड़े भूजल दोनों व्यवस्थाओं पर संकट लाया है, जिससे लाखों लोग विस्थापित हुए हैं और उनकी आजीविका छिन गयी है।

उन्होंने आगे कहा कि "हमारी मांग है कि हिमालय की हिमनदियों से लेकर पेरियार तक कि नदियों को एक सजीव इकाई के तौर पर मान्यता दी जाए और साथ में किसानों और खासकर छोटे धारकों, मछुआरों, खानाबदोशों, चरवाहों और बहुत सारे आदिवासी, दलित और अन्य हाशिये के समुदायों के तटवर्ती अधिकारों की रक्षा के लिए नदीय प्रशासन को मजबूत करने के साथ-साथ उनका विकेंद्रीकरण भी किया जाए।" 

4 अप्रैल को एक वेबिनार के दौरान देश के अलग अलग भौगोलिक क्षेत्रों के विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधियों ने, जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय (एनएपीएम) के राष्ट्रीय नदी घाटी मंच द्वारा नदियों और नदी आश्रित समाज की सुरक्षा को तय करने के लिए मांग उठाई।

ऑनलाइन प्रेस वार्ता में केंद्र और राज्य सरकारों की विकास संबंधित नीतियों को नदियों के व्यापारीकरण, नीजिकरण, प्रदूषण और विनियोग के लिए जिम्मेदार ठहराया। साथ ही कहा गया कि चुनावी राजनीति में दूरगामी लक्ष्य छोड़कर  लोक-लुभावनी नीतियों का दबदबा रहता है और पर्यावरण के मुद्दे हाशिए पर रह जाते हैं।
पूरी रपट- डाउन टू अर्थ