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दर्शकों तक पहुंचने की कठिन डगर - मृणाल पांडे

किसी भी लोकतांत्रिक देश की सरकार और आम आबादी के बीच सहज-सतत संवाद हर कल्याणकारी राज्यव्यवस्था की बुनियादी जरूरत होती है। जब सरकार ने (बीसवीं सदी के अंतिम दशक में) सूचना प्रसार मंत्रालय की मातहती में चलाई जाती रही रेडियो-टीवी की प्रसारण सेवाओं को प्रसार भारती नामक स्वायत्त इकाई को सौंपा था तो शायद उसके पीछे उसके मार्फत राज्य व नागरिकों के बीच एक भरोसेमंद-मजबूत पुल बनाने का ही लक्ष्य था। तब तक सूचना प्रसार के क्षेत्र में कुशल निजी खिलाड़ियों की आमद नहीं हुई थी और मनोरंजन हो या खबरें, आमजन दूरदर्शन व आकाशवाणी पर ही निर्भर थे। आज परिदृश्य बदल चुका है और कई चैनलों, रेडियो प्रसारणों के बीच में से चुनने की सुविधा है।

निजी कंपनियों के मन में विशुद्ध व्यापारिक आग्रहों के तहत कार्यक्रम बनवाकर प्रसारण करने और देश के विशाल उपभोक्ता बाजार पर हावी हो जाने को लेकर कोई ऊहापोह नहीं होती। लिहाजा उन्होंने पहले लोकल बाजार पर शोध किया, फिर केबल तथा डिश द्वारा घर-घर बेहतरीन मनोरंजन व खबरिया पैकेज देने के सफल नुस्खे बना लिए। जब यह हो गया तो उन्न्त तकनीकी तथा बेहतर तनख्वाहें ऑफर कर उन्होंने कुशल प्रोग्राम निर्माताओं व संपादकीय टोलियों को खींच लिया। इनमें सार्वजनिक प्रसारण सेवाओं के सरकारी माहौल से नाखुश कई कुशल कर्मी भी थे, जिन्होंने निजी कंपनियों को पैर जमाने में बहुत मदद की।

आज निजी चैनल और रेडियो स्टेशन लगातार लोकलुभावन कार्यक्रमों से भरपूर दर्शक व विज्ञापन बटोरकर मुनाफा कमा रहे हैं। उधर स्वायत्तता तथा स्टाफ के अभाव और सत्तारूढ़ दलों के हितस्वार्थों के बीच पिसती हमारी सार्वजनिक प्रसारण सेवाएं दर्शकों तक पहुंचने की दौड़ में बुरी तरह पिछड़ रही हैं। अलबत्ता आज भी जनमानस में दूरदर्शन व आकाशवाणी के प्रति अपनत्वभरी आस्था है। लकदक पर बेदिमाग कार्यक्रमों के शोरगुल से परेशान कई उपभोक्ता चाहते हैं कि दूरदर्शन व आकाशवाणी पुन: अपना पुराना खोया स्तर पा लें, ताकि उनको और नई पीढ़ी को उनके कार्यक्रमों से अच्छी हिंदी, अंग्रेजी और स्तरीय खबरों के सही सटीक प्रसारण फिर से मिलें।

पर चाहने से क्या? प्रसार भारती के बुनियादी ढांचे में चटपट सामयिक सुधार करना आसान नहीं। इस काम के लिए मूल प्रसार भारती कानून में संशोधन जरूरी है, जिसके लिए संसद ही अधिकृत है। 2011 में प्रसारण तकनीकी में बहुत तरक्की देखकर भारत सरकार ने 1995 के केबल टीवी कानून में संशोधन कर यह तो तय कर दिया कि अब तक एनालॉग फॉर्मेट में बनते रहे टीवी कार्यक्रमों का स्वरूप आगे से अनिवार्यत: डिजिटल हो, पर किसी ने न सोचा कि जो कार्यक्रम केबल या डिश से ही प्रसारित हो सकते हैं, वे सरकारी (लो पावर ट्रांसमिशन) जमीनी टॉवरों को बेकार बना देंगे। साथ ही हर प्रसारणकर्ता के लिए रातोंरात नए तरह के कैमरों, नई एडिटिंग मशीनों पर डिजिटल स्वरूप में शूट किए गए कार्यक्रमों का संपादन और उनको नए (उपग्रह) प्लेटफॉर्म से जोड़ने (अपलिंकिंग) और केबल या डिश से उपभोक्ताओं तक पहुंचाने का हुनर भी अनिवार्य हो जाएगा।

निजी कंपनियां तो बेहतर गुणवत्ता वाले इन तरीकों-तकनीकों को अपना ही चुकी थीं, पर दूरदर्शन व आकाशवाणी के कार्यक्रम निर्माताओं और इंजीनियरों को हर नई मशीन के आयात से पहले लाल फीतों से निबटना पड़ा। पिछली सरकार द्वारा गठित पित्रोदा समिति की रपट (2014) पहले ही चेतावनी दे चुकी थी कि किस तरह सरकारी ढिलाई ने स्वायत्तता में लोचा लगा रखा है और संसाधनों की इतनी कमी हो गई है कि सार्वजनिक प्रसारण न तो सही तरह से सरकारी सूचनाएं और संदेश लोगों तक पहुंचा सकता है और न ही संस्था किसी तरह के स्तरीय कार्यक्रम बनवाने की स्थिति में है। कुल मिलाकर दूरदर्शन और आकाशवाणी के उपभोक्ता शहर ही नहीं, दूरदराज के उन गांवों में भी बहुत तेजी से घट रहे हैं, जहां केबल तथा डिश आ चुके हैं।

इस रपट का क्या हुआ, हम नहीं जानते।

अभी (वरिष्ठ पत्रकार बीजी वरगीस द्वारा स्थापित) गैरसरकारी स्वायत्त संस्था मीडिया फाउंडेशन की एक शोध रपट जारी हुई है। संस्था बाजारवाद के बीच जगह बनाकर सरकार की सही, सामयिक और जरूरी जानकारियां सस्ती, पुरअसर सार्वजनिक प्रसारण सेवाओं के मार्फत जन-जन तक पहुंचाने की पुरजोर हिमायती रही है। आंध्र, छत्तीसगढ़, गुजरात, ओडिशा और दिल्ली में गांवों और शहरों की झुग्गी बस्तियों में जाकर किए गए शोध से रपट यह साबित करती है कि गरीबों तक जानकारी पहुंचाने का सबसे उत्तम साधन प्रसार भारती ही है। पर नीति निर्माताओं को उसकी दिशा तय करने से पहले उसकी दशा समझना होगा।

रपट में इसी दिशा में कुछ अन्य महत्वपूर्ण तथ्य ये हैं कि ग्रामीण भारत में आज शहरी भारत से अधिक टीवी सेट मौजूद हैं। सिर्फ गरीबी की निचली पायदान पर खड़ी अनुसूचित जनजातियों में इनकी मिल्कियत कम है। जमीनी ट्रांसमिशन के बजाय गांव या शहरी स्लम में भी केबल या डिश प्रसारण तथा एफएम रेडियो ही जनता की पहली पसंद है। युवा लोग तथा बच्चे हर घर में रिमोट के चौकीदार हैं और वे मनोरंजन को अधिक तवज्जो देते हैं। पैसा देकर टीवी देखने वाले गरीब भी खुद पसंदीदा कार्यक्रमों का चयन करना सीख गए हैं, बस वे हिंदी या स्थानीय बोली में हों। एनिमल प्लैनेट, डिस्कवरी तथा नेशनल ज्योग्राफिक सरीखे चैनल खूब पसंद किए जा रहे हैं।

मुफ्त सरकारी डिश पर उपलब्ध कार्यक्रमों तथा निजी चैनलों को वे ही ग्रामीण गरीब लाचारीवश देखते हैं, जो खर्चा नहीं उठा सकते। हर जगह डिश लगवाना लोग बेहतर मानते हैं, क्योंकि उनके कार्यक्रमों की गुणवत्ता बेहतर होती है। दिक्कत यह है कि केबल ऑपरेटर भले ही कुछ दिन की मोहलत पैसा चुकाई में दें, डिशवाले सीधे कनेक्शन काट देते हैं। सो कई गरीब घरों में बहू के साथ दहेज में आए टीवी सेट बंद भी पाए गए। खेतीबाड़ी में व्यस्त लोगों को खेती या अन्य तरह की जरूरी जानकारी अपनी सुविधा के समय चाहिए, सुबह या दिन में नहीं, जब वे खेत पर होते हैं। डीडी पर गरीबों को स्वास्थ्य, रोजगार, हुनर वृद्धि और करियर गाइडेंस विषयक ठोस स्थानीय जानकारियों वाले वे कार्यक्रम चाहिए, जो उनको निजी चैनलों पर नहीं मिलते। पर इनमें उनको आलतू-फालतू गपशप नहीं चाहिए।

प्रसार भारती को सरकारी नीतियों और सही सूचनाओं का भरोसेमंद और लोकप्रिय वाहक बनाने के लिए संसद को प्रसार भारती कानून में जल्द से जल्द बदलाव करने होंगे। इस क्रम में सांसद जब देश की बहुत बड़ी किंतु अदृश्य गरीब आबादी की पसंद-नापसंद, उनके कामकाज के बोझ और सुविधा के क्षणों पर आमूल पुनर्विचार करने लगेंगे तो यकीन जानें, डीडी और आकाशवाणी ही नहीं, बहुत कुछ और भी बेहतर बनने लगेगा।

(लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं)