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दाल से टूटता रोटी का नाता

नई दिल्ली [रमेश दुबे]। दलहनों की पैदावार बढ़ाने के लिए लगभग दो दर्जन योजनाओं की असफलता के बाद केंद्र सरकार ने सीधे किसानों को ज्यादा कीमत देने की रणनीति अपनाई है। इसके तहत दलहनी फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में भारी बढ़ोत्तरी की गई है। जहा अरहर के समर्थन मूल्य में सात सौ रुपये की वृद्धि की गई है, वहीं मूंग में 410 रुपये तथा उड़द में 380 रुपये की वृद्धि हुई है। समर्थन मूल्य में यह बढ़ोत्तरी पिछले दो वर्षो के दौरान दालों की कीमतों में बहुत ज्यादा वृद्धि होने और घरेलू खपत के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार पर निर्भरता बढ़ने को देखते हुए की गई है।

सरकार ने भले ही समर्थन मूल्य में वृद्धि दाल की पैदावार बढ़ाने और किसानों को प्रोत्साहित करने के लिए की है, लेकिन इसका उल्टा असर खुले बाजार में दालों की कीमतों में भारी बढ़ोत्तरी के रूप में आ सकता है। उदाहरण के लिए जिस अरहर का समर्थन मूल्य अभी तक 23 रुपये था, उसकी दाल खुले बाजार में अस्सी रुपये किलो बिक रही है। 2760 रुपये क्विंटल समर्थन मूल्य वाली मूंग तो सभी रिकार्ड तोड़कर दस हजार रुपये क्विंटल से भी ऊपर निकल चुकी है। कुछ इसी तरह की कहानी उड़द के साथ भी है।

दरअसल, जब तक दलहन की खेती से जुड़े जोखिमों को कम नहीं किया जाता, तब तक आम भारतीयों की थाली से दालें कम होती जाएंगी। इसका परिणाम कुपोषण और उससे पैदा होने वाली बीमारियों के रूप में सामने आ रहा है और भविष्य में और गंभीर रूप धारण कर सकता है। इसका कारण है कि भारत में दालें खाद्य सुरक्षा के साथ-साथ पोषण सुरक्षा का भी अभिन्न अंग रही हैं।

70 के दशक में भोजन के बारे में एक महत्वपूर्ण पुस्तक छपी थी- 'डायट फॉर ए स्माल प्लैनेट'। इसकी लेखिका फ्रासिस मोर लैपे ने जीव विज्ञान की कुछ बुनियादी जानकारियों का इस्तेमाल करके समझाया था कि पोषक तत्व हमारे शरीर के लिए तभी उपयोग हो पाते हैं, जब उनका सेवन सही चीजों के मेल के साथ खाई जाएं। लैपे ने यह भी बताया था कि भोजन की सास्कृतिक परंपराओं में यह जानकारी पीढ़ी-दर-पीढ़ी दर्ज हो रही है कि किस चीज को किसके साथ खाना है, किसके साथ नहीं।

दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में दाल-रोटी और दाल-चावल के जोड़े सिर्फ मुहावरे नहीं हैं। उनके पीछे संतुलित आहार की ज्ञान-परंपरा है, जिसके निर्माता चोटी के वैज्ञानिक नहीं, आमजन हैं। पोषण के बारे में जिस ज्ञान को आजकल वैज्ञानिक माना जाता है, उसमें भी अनाजों और दालों का महत्व स्वीकारा गया है। दोनों को प्रोटीन का स्त्रोत बताया गया है, लेकिन जनसंख्या वृद्धि के अनुरूप दालों का उत्पादन न होने के कारण समाज के निर्धन वर्गो के साथ-साथ मध्यम वर्ग भी पेट भरने के लिए सिर्फ अनाज खा रहा है। इससे आबादी के एक बड़े हिस्से के सामने पोषण असुरक्षा का खतरा उत्पन्न हो गया है। उदाहरण के लिए देश का अन्न भंडार कहे जाने वाला पंजाब राच्य कुपोषण के मामलें में अफ्रीका के सबसे कुपोषित देश गैबोन से भी निचले पायदान पर है।

भारत की बड़ी आबादी शाकाहारी है, इसलिए महत्वपूर्ण प्रोटीन हासिल करने के लिए दालें सबसे आसान स्त्रोत हैं। इसके बावजूद कृषि क्षेत्र के हमारे नीति-निर्माता लगातार इस तथ्य को नजरअंदाज कर रहे हैं। बढ़ती आबादी, मध्य वर्ग के विस्तार, क्रय क्षमता में वृद्धि जैसे कारणों से दालों की माग बढ़ती जा रही है। हर साल सात से आठ लाख टन दालों की खपत बढ़ रही है, लेकिन उसी के अनुरूप उत्पादन न होने के कारण कीमतें बढ़ती जा रही हैं। दालों की उपलब्धता के लिए सरकार ने जो कदम उठाए हैं, वे तात्कालिक अधिक, दीर्घकालिक कम हैं। दालों के निर्यात को प्रतिबंधित किया गया, भंडारण क्षमता की सीमा तय करने के साथ-साथ वायदा कारोबार पर रोक लगाई गई। दालों के ड्यूटी फ्री आयात को मंजूरी दी गई। आयात में सरकारी एजेंसियों की भूमिका बढ़ाई गई और सरकार उनके घाटे की भरपाई भी कर रही है, लेकिन सरकार के पास दालों की उत्पादकता बढ़ाने की कोई ठोस नीति नहीं है।

दरअसल, भारत में दालों की कमी के लिए बहुआयामी कारकों का योगदान रहा है। इसकी शुरुआत हरित क्राति से हुई। हरित क्राति में गेहूं और धान की नई उन्नत किस्मों को लाया गया और रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों व सिंचाई के साथ उनका उत्पादन तेजी से बढ़ा, लेकिन यह क्रांति बहुत एकागी थी और धान-गेहूं या कपास-गन्ने-सोयाबीन तक सीमित रह गई। दालें जैसी फसलें उपेक्षित रह गई। इसका कारण यह भी था कि हरित क्राति की प्रेरणा, योजना, तकनीक एवं वित्तीय मदद मुख्यत: विदेशों से आई थी। वहा दालों की खेती होती ही नहीं, इसीलिए दालों का उत्पादन बढ़ाने के लिए भारत में भी शोध नहीं हुआ।

गेहूं व धान उगाने के फेर में दाल का रकबा भी घटा और प्रोत्साहन भी। दाल उत्पादन सीमात किसानों और सूखे इलाकों तक सीमित हो गया है। खतरा यह है कि आने वाले सालों में रोटी भले ही मिल जाए, पर दाल आसानी से मयस्सर नहीं होगी। पिछले चार दशक में दलहन की खेती का क्षेत्र सिर्फ 4.5 फीसदी बढ़ा है यानी वर्ष 1970 की हरित क्राति में दलहन खेती 2.25 करोड़ हेक्टेयर में होती थी, जो अब मामूली रूप से बढ़कर 2.38 करोड़ हेक्टेयर में हो रही है। यह कुल खेती वाली जमीन का सिर्फ 12 फीसदी ही है। इसमें भी 90 फीसदी खेती असिंचित क्षेत्रों में होती है। किसानों का ध्यान अब दलहन की जगह चावल व गेहूं के साथ नकदी फसलों [गन्ना, कपास व सोयाबीन] की ओर है।

दलहन की कुल पैदावार भी उत्साहजनक नहीं है। 1970 में दलहन का कुल उत्पादन 1.2 करोड़ टन था, जो चार दशक बाद मामूली बढ़त के साथ 1.5 करोड़ टन पर पहुंचा है। दालों की प्रति हेक्टेयर उत्पादकता में भी कोई विशेष सुधार नहीं हो पाया है। पिछले चार दशक में उत्पादकता केवल 20 फीसदी तक ही बढ़ी है। 1970 में दलहन की उत्पादकता 524 किलो प्रति हेक्टेयर थी, जो अब 638 किलो पर स्थिर हो गई है। इसके विपरीत पड़ोसी देश चीन में दलहनी फसलों की उत्पादकता 3500 किलो तक पहुंच गई है और तो और बाग्लादेश व म्यामार की उत्पादकता के मुकाबले भी हम पीछे हैं।

हरित क्राति का नतीजा यह हुआ कि दलहन की खेती में शीर्ष पर रहने वाले उत्तर भारतीय राच्यों के आम लोग अब महंगाई के चलते कटोरी भर दाल के लिए तरस रहे हैं। अरहर और चना जैसी प्रमुख दालों के लिए यहा के लोगों को दक्षिण भारत के राच्यों या आयात का मुंह ताकना पड़ता है।

उद्योग मंडल ऐसोचैम की एक अध्ययन रिपोर्ट में कहा गया है कि 1960 के दशक में दाल की प्रति व्यक्ति खपत 27 किलोग्राम सालाना थी। यह जनवरी-जून 2009 की अवधि में घटकर 11 किलो से भी कम रह गई है। रिपोर्ट के अनुसार पिछले पाच दशकों में दालों की पैदावार में एक प्रतिशत से भी कम वृद्धि हुई है।

सच्चाई यह है कि देश में 1998-99 में पहली बार करीब डेढ़ करोड़ टन की रिकॉर्ड पैदावार हुई और उसके बाद 2007-08 में यह एक करोड़ 51 लाख टन तक पहुंच पाई। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस दौरान जनसंख्या वृद्धि और माग बढ़ने से दालों के आयात में भारी वृद्धि होती रही। 1998-99 में जहा देश में साढ़े चार लाख टन दालों का आयात किया गया, वहीं 2009-10 में यह बढ़कर 34 लाख टन तक पहुंच गया, जिसके चालू वित्त वर्ष में बढ़कर 40 लाख टन होने की संभावना है। दाल के संबंध में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसका अंतरराष्ट्रीय ढाचा बहुत पेचीदा है। दुनिया के कुछ ही देशों में दाल की खेती होती है, क्योंकि ठंडे देशों में प्रोटीन के और दूसरे स्त्रोत भी हैं। ऑस्ट्रेलिया व कनाडा केवल भारत के बाजार के लिए दाल उगाते हैं। कृषि मंत्रालय के अधिकारी मानते हैं कि दुनिया में दाल का कुल उत्पादन भी भारत की माग के लिए पर्याप्त नहीं है, क्योंकि दाल यहा का मुख्य भोजन है। अर्थात दुनिया भारत को दाल नहीं खिला सकती। ऐसे में दलहन फसलें यहा के खेतों में उगानी होगी या फिर दाल भोजन से बाहर हो जाएगी।

दलहनी फसलों में अनेक तरह के नए रोग लगने लगे, उन्हें रोकने के लिए न तो नए कीटनाशक बनाए गए और न ही उन रोगों के प्रतिरोधी क्षमता के दालों के बीज विकसित किए गए। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि अनेक बार दलहनों की बर्बाद होती खेती देखकर किसानों ने इनकी खेती ही बंद कर दी। नीलगायों द्वारा दलहनी फसलों को नष्ट कर देना एक बड़ी समस्या बन गई है ।

स्पष्ट है कि किसान दलहनों की खेती तभी करेंगे, जब सरकार लाभकारी समर्थन मूल्य घोषित करने के साथ-साथ दलहन की खेती से जुड़े जोखिम कम करे। यह समय की माग है कि दलहन पर जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान हो ताकि इनकी अधिक उत्पादकता व रोगरोधी बीजों का विकास हो सके। सबसे बढ़कर प्रयोगशाला से भूमि तक की कड़ी मजबूत की जाए, जिससे किसान नई किस्मों को बड़े पैमाने पर अपना सकें।

छलावा है दालों का समर्थन मूल्य

भले ही सरकार दलहनों का न्यूनतम समर्थन मूल्य [एमएसपी] बढ़ाकर उत्पादन में बढ़ोतरी का सपना देख रही हो, लेकिन उसके सपने मुंगेरी लाल के हसीन सपने ही रहेंगे, क्योंकि अब तक दलहनों का एमएसपी किसानों के लिए छलावा ही रहा है। इसका कारण है कि सरकार की एमएसपी नीति गेहूं, धान, गन्ना के इर्द-गिर्द घूमती रही है। दूसरी ओर दलहनी, तिलहनी फसलों और मोटे अनाजों के समर्थन मूल्य पर सरकारें प्राय: उदासीन ही रही हैं।

पिछले दो दशकों में लगभग आधा दर्जन बार ऐसा हुआ कि दलहनों के लिए एमएसपी की घोषणा ही नहीं की गई। जिन वर्षो में घोषणा की भी गई तो सरकारी खरीद के लिए केंद्र ही नहीं खोले गए। जब एमएसपी घोषित हुआ भी तो वह बाजार मूल्य की तुलना में कई गुना तक नीचे रहा। इस बार भी सरकार ने एमएसपी में भारी वृद्धि तभी की, जब दलहन उत्पादन बढ़ाने के अन्य उपाय विफल हो गए। इसके बावजूद सरकार घरेलू किसानों के बजाए विदेशी किसानों पर मेहरबान दिखती है। उदाहरण के लिए अब तक घरेलू उत्पादकों के लिए अरहर का सरकारी खरीद मूल्य 23 रुपये किलो रहा है और सरकार अरहर की दाल 56 रुपये किलो की दर से आयात कर रही है, वहीं खुले बाजार में तो यह 80 रुपये किलो बिक रही है। ऐसे में एमएसपी में बढ़ोत्तरी के बावजूद शायद ही कोई किसान सरकारी एजेंसियों को अरहर बेचे, क्योंकि खुले बाजार में उसे पचास रुपये किलो की कीमत तो मिल ही जाएगी।

दरअसल, सरकार की समर्थन मूल्य घोषित करने की नीति भेदभाव भरी रही है। यद्यपि सरकार चौबीस फसलों के लिए समर्थन मूल्य तय करती है, लेकिन चुनिंदा फसलों को छोड़कर बाकी फसलों की खरीद की सरकारी व्यवस्था नहीं की जाती। यह विषय केंद्र व राच्यों और उनकी एजेंसियों के बीच फुटबाल बनकर रह जाता है। खरीद की जिम्मेदारी एक-दूसरे के ऊपर टालने का खेल चलता रहता है और पूरा खरीद सीजन निकल जाता है। मक्का, च्वार, बाजरा के साथ तो यह घटना हर साल घटित होती है। उदाहरण के लिए पिछले साल सरकार ने बाजरे की एमएसपी 840 रुपये प्रति क्विंटल तय की थी, लेकिन सरकारी एजेंसियों ने किसानों से इस कीमत पर बाजरा खरीदने में दिलचस्पी नहीं दिखाई। ऐसे में राजस्थान में किसानों के पास बाजरे का स्टॉक जमा हो गया। मजबूर होकर उन्हें खुले बाजार में एमएसपी से दो सौ रुपये कम कीमत पर बाजरा बेचना बड़ा। ऐसे में विकल्प मिले तो किसान बाजरा उगाने से पीछे हटने में संकोच नहीं करेंगे। कुछ यही कहानी सत्तर और अस्सी के दशक में दलहनी फसलों के साथ घटित हुई थी, जिसका परिणाम अब दालों के उत्पादन में कमी के रूप में सामने आ रहा है।