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दोहरे प्रयासों से तेज होगा विकास - डॉ जयंतीलाल भंडारी

बीते सोमवार को जीएसटी कौंसिल की बैठक के बाद आगामी एक जुलाई से इस एकीकृत परोक्ष कर प्रणाली को लागू करने की बात कही गई है। चूंकि नोटबंदी के बाद सरकार देश की अर्थव्यवस्था को कैशलेस बनाने की ओर अग्रसर है, ऐसे में एक जुलाई से जीएसटी की शुरुआत मददगार होगी। साथ ही जीएसटी की तिथि व दरें सुनिश्चित हो जाने के कारण आगामी बजट में अप्रत्यक्ष कर का अनुमान अवधारणा के आधार पर नहीं, वरन जीएसटी की वास्तविक निर्धारित दरों के आधार पर किया जा सकेगा। इससे हमारी अर्थव्यवस्था को लाभ होगा।

 

 

देश-दुनिया के अर्थ विशेषज्ञों का मानना है कि नोटबंदी व जीएसटी के मिले-जुले प्रभाव से भारतीय अर्थव्यवस्था का विस्तार होगा। एक साथ इन दोनों कदमों से आर्थिक विकास को बल मिलेगा। आर्थिक विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि जहां एक ओर वर्ष 2017 में कोई छह महीनों के बाद नोटबंदी के लाभ दिखाई देंगे, वहीं दूसरी ओर एक जुलाई से अब तक के सबसे क्रांतिकारी अप्रत्यक्ष कर सुधार जीएसटी लागू होने से उद्योग-कारोबार से लेकर आम आदमी को भी लाभ होगा। नतीजतन आगामी वित्त वर्ष (2017-18) में विकास दर बढ़ेगी। वैसे हाल ही में अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ) ने चालू वित्त वर्ष के लिए नोटबंदी के बाद नकदी के संकट और खपत में कमी के मद्देनजर भारत की आर्थिक विकास दर का अनुमान 7.6 फीसदी से घटाकर 6.6 फीसदी कर दिया है। इससे पूर्व विश्व बैंक ने इसे 7.6 फीसदी से घटाकर 7 फीसदी अनुमानित किया था। विश्व बैंक ने यह भी कहा था कि वर्ष 2017 में विश्व मंदी के दौर से गुजरेगा, लेकिन भारत पर वैश्विक मंदी व नोटबंदी का ज्यादा असर नहीं होगा। कहा गया है कि आगामी वित्त वर्ष 2017-18 में सरकार द्वारा शुरू किए गए आर्थिक सुधारों से घरेलू आपूर्ति की अड़चनें दूर होंगी और उत्पादकता बढ़ेगी। साथ ही बुनियादी ढांचे पर खर्च बढ़ने से आर्थिक गतिशीलता बढ़ेगी।

 

निश्चित रूप से नोटबंदी के चलते नवंबर 2016 के बाद अर्थव्यवस्था के विभिन्न् क्षेत्रों की रफ्तार धीमी पड़ी है। नकदी की कमी के चलते घरेलू खपत कमजोर पड़ने से वस्तुओं के उत्पादन और कारोबार प्रभावित हुए हैं। बाजारों में ग्राहकों की कमी हो गई है। असंगठित क्षेत्र व ग्रामीण इलाके नोटबंदी से अधिक प्रभावित हैं। लोगों की क्रयशक्ति घट गई है। सामान्यत: प्रतिवर्ष अक्टूबर के बाद औद्योगिक गतिविधियों में खासी तेजी आती है, जबकि इस बार नोटबंदी के कारण आर्थिक गतिविधियां घटी हैं। नई परियोजनाओं का ऐलान भी अक्टूबर से दिसंबर के बीच पिछली तीन तिमाहियों की तुलना में सबसे सुस्त रहा है। एक ओर देश के बाजार मांग की भारी कमी का सामना कर रहे हैं, लोगों के पास चीजें व सेवाएं खरीदने के लिए पर्याप्त नकदी नहीं है तथा उनकी क्रयशक्ति घटी है। वहीं दूसरी ओर निवेश और मांग की कमी के कारण उद्योग-कारोबार की रफ्तार सुस्त होने से नौकरियां घटने की आशंकाएं मंडराने लगी हैं।

 

 

वर्ष 2017 में वैश्विक आर्थिक मंदी से भारत भी प्रभावित हो सकता है। वहीं पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन ओपेक द्वारा प्रतिदिन 12 लाख बैरल कच्चा तेल उत्पादन में कमी करने के निर्णय से अपनी जरूरत का 80 फीसदी तेल आयात करने वाले भारत में भी तेल की कीमतें बढ़ने का अंदेशा है। देश का औद्योगिक ही नहीं, निर्यात परिदृश्य भी निराशाजनक है। प्रोत्साहक प्रावधानों की कमी से औद्योगिक और निर्यात वृद्धि की संभावनाओं पर प्रश्नचिह्न लग गया है। निवेशक नए प्रोजेक्ट्स में निवेश करने से कतरा रहे हैं। सार्वजनिक व निजी निवेश में कमी देश में आर्थिक तरक्की को बाधित करने वाला प्रमुख कारण है। देश में पूंजी का निवेश जरूरत से कम होने के कारण भारतीय कारोबार उस रफ्तार से आगे नहीं बढ़ पा रहा है, जितनी इसकी क्षमता है।

 

 

ऐसे में अब नए वर्ष में सरकार को घरेलू मांग के निर्माण के लिए उद्योग-कारोबार को प्रोत्साहन देना होगा। चूंकि 12 जनवरी को सरकार के द्वारा प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार देश में खुदरा महंगाई तीन साल के सबसे निचले स्तर पर आकर 3.41 फीसदी रह गई है, अतएव उद्योग-कारोबार को प्रोत्साहन देने के लिए रिजर्व बैंक के द्वारा ब्याज दरों में कटौती अपेक्षित है। अर्थव्यवस्था की गतिशीलता के लिए सरकारी निवेश में वृद्धि भी जरूरी है। देश में लोगों को रोजगार देकर उनकी क्रयशक्ति बढ़ाने के लिए बड़े पैमाने पर सड़क, आवास, बंदरगाह, विद्युत निर्माण आदि क्षेत्रों की कार्यरत योजनाओं में तेजी लाई जाए। नोटबंदी के दर्द पर मरहम लगाने के मद्देनजर किसान, निम्न-मध्यम वर्ग और युवा वर्ग के लिए विशेष राहतकारी योजनाएं घोषित की जाएं। इसके साथ-साथ शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता और पेयजल जैसे क्षेत्रों पर भी निवेश में वृद्धि की जाए। ग्रामीण क्षेत्र की योजनाओं पर जहां अधिक आवंटन किया जाए, वहीं किसानों के लिए कर्ज पुनर्भुगतान अवधि और ब्याज दर में राहत प्रदान की जाए। प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष करों की दरें भी घटाई जाएं। खासतौर से सरकार को इन्कम टैक्स में छूट का बड़ा तोहफा देना होगा। अभी 2.5 लाख रुपए तक आय करमुक्त है। इस सीमा को बढ़ाकर 4 लाख रुपए तक किया जाना उपयुक्त होगा। अब सरकार को बेनामी संपत्ति पर जोरदार चोट करना होगी, कालेधन का बकाया इलाज पूरा करना होगा। अर्थव्यवस्था को डिजिटल करने की रफ्तार तेज करना होगी।

 

 

यदि इन बातों पर ध्यान दिया गया तो वर्ष 2017 में आर्थिक चुनौतियों के बीच भारत के लिए विकास की बेहतर संभावनाएं होंगी और जीडीपी वृद्धि की रफ्तार भी सुस्त नहीं होगी। दुनिया की एक प्रमुख रेटिंग एजेंसी स्टेंडर्ड एंड पुअर्स (एसएंडपी) ने कहा है कि नोटबंदी से उद्योग-कारोबार और जीडीपी में कमी आने से भारत की निवेश रेटिंग प्रभावित हुई है। लेकिन वर्ष 2017 में नोटबंदी का लाभ दिखाई देगा। एसएंडपी ने यह भी कहा है कि वर्ष 2017 में आर्थिक एवं संस्थागत सुधारों के साथ-साथ भारत में लोगों की क्रयशक्ति बढ़ाने और विकास के नए प्रयासों से सकारात्मक परिणाम आने की संभावनाएं हैं। इससे भारत की रेटिंग बढ़ सकेगी।

 

 

हम उम्मीद करें कि हमें आगामी वित्त वर्ष में नोटबंदी और जीएसटी के लाभ देखने को मिलेंगे। विमुद्रीकरण व जीएसटी की प्रक्रिया से आगे चलकर अर्थव्यवस्था में व्यापक सुधार होंगे। काले धन पर नियंत्रण से ब्याज दरें कम होंगी। डिजिटल भुगतान बढ़ने से फायदा होगा। भ्रष्टाचार कम होगा। सरकार की आय बढ़ेगी। जीएसटी एक सरल, प्रासंगिक व व्यवहारिक अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था है, अतएव इससे उद्योग-कारोबार और निर्यात की स्थिति पटरी पर आएगी। देशभर के बाजारों में एकरूपता आएगी। कर संग्रह बढ़ने से सरकार की आय बढ़ेगी। इन सबके कारण भारतीय अर्थव्यवस्था बेहतर होगी और भारत की विकास दर बढ़ेगी।