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धरातल पर एमएसपी की स्थिति-- अवनीन्द्र नाथ ठाकुर

पिछले दिनों केंद्र सरकार ने कई फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्यों (एमएसपी) में वृद्धि की और साथ ही किसानों की आय को दोगुनी करने की अपनी प्रतिबद्धता को सामने रखने की कोशिश भी की. इन मूल्यों में वृद्धि की घोषणा भले ही देर से आयी, लेकिन इस दिशा में यह एक सकारात्मक कदम साबित हो सकता है.

अब महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या इन मूल्यों में वृद्धि ही किसानों के दयनीय हालत में सुधार कर पाने में सक्षम होगा? क्या किसानों की आय को दोगुना करने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है? इन प्रश्नों के उत्तर जानने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्यों के विभिन्न आयामों को जानना जरूरी है.

पहली जरूरी बात एमएसपी के निर्धारण से संबंधित है. कृषि लगत एवं मूल्य आयोग नामक संस्था देश के विभिन्न फसलों के लागतों का मूल्यांकन करती है और फिर उनके न्यूनतम मूल्यों, जिसमें किसानों की न्यूनतम आय को ध्यान में रखा जाता, के निर्धारण के लिए सरकार को सुझाव देती है.

सरकार का दावा है कि यह बढ़ोतरी किसानों को कुल लागत से 50 प्रतिशत मुनाफा प्रदान करेगी. यहां पर प्रश्नचिन्ह के घेरे में मुनाफा नहीं, बल्कि लागत का मूल्यांकन आता है. जिस लागत का मूल्यांकन यहां किया गया है, वह विभिन्न फसलों में लगनेवाले इनपुट (खाद, बीज, पटवन) पर खर्च एवं खेती में लगनेवाले पारिवारिक श्रम को जोड़कर किया जाता है.

लेकिन इन लागतों में जमीन का किराया एवं विभिन्न पूंजीगत संसाधनो का किराया शामिल नहीं है. अर्थात किसानों की कुल लागत के मूल्यांकन जरूरत से कम ही आंका जाता है, इसलिए 50 प्रतिशत मुनाफा का कोई औचित्य नहीं है. साल 2006 में ही स्वामीनाथन कमीशन ने लागत का पैमाना उपयोक्त सभी खर्चों को मिलाकर करने का सुझाव दिया था. इस प्रकार एमएसपी में बढ़ोतरी उम्मीद से कम है.

इस संदर्भ में दूसरी बात यह है कि सिर्फ एमएसपी निर्धारित कर देने से ही किसानों को फसलों के उचित दाम नहीं मिल जाते हैं. जब तक सरकार इन मूल्यों पर फसलों की खरीद नहीं करती, इन मूल्यों का प्रभाव न के बराबर ही रहता है. अलग-अलग फसलों में सरकारी खरीद की मात्रा अलग-अलग है और साथ ही अलग-अलग क्षेत्रों में भी सरकारी खरीद की मात्रा में बड़े पैमाने पर विभिन्नता है.

जहां एक ओर पंजाब एवं हरियाणा में इन खरीदों की मात्रा अधिक है, वहीं पूर्वी एवं मध्य भारत में सरकारी खरीद न के बराबर है. अर्थात नये निर्धारित मूल्यों का असर अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग पड़ने की संभावना पूरी है. खासकर पिछड़े क्षेत्रों जैसे कि बिहार, झारखंड, ओडिशा इत्यादि राज्यों में इन फसलों के नये मूल्य मिलना इतना आसान न होगा, जहां सरकारी खरीद की व्यवस्था इतनी सुदृढ़ नहीं है.

अगर कुछ फसलों में इसका असर होगा, तो मुख्य रूप से वे फसलें होंगी, जिनका सरकार विभिन्न योजनाओं के तहत गरीबों में वितरण करती है, जैसे धान इत्यादि. लेकिन, यह असर भी सिमित ही होगा, क्योंकि कुल उत्पादन का हिस्सा जो सरकारी खरीद में जाता है, वह नगण्य ही है. कुछ फसलों जैसे मक्का, सरसों, दलहन, जूट इत्यादि फसलों में सरकारी खरीद नगण्य रहने के कारण एमएसपी में किसी भी तरह की बढ़ोतरी सिर्फ कागज तक ही सीमित रह जाती है.

तीसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि गावों में भी सरकारी खरीद सीमित रहने के कारण ज्यादातर बड़े किसान ही अपनी फसल को इन मूल्यों पर बेच पाते हैं. छोटे किसानों के लिए इन सार्वजनिक केंद्रों में अपनी फसलों को बेच पाना कठिन होता है.

बिहार में जमीन के रसीद के साथ अनाज की बिक्री का प्रावधान है, जिससे कि एक ही किसान ज्यादा अनाज इन केंद्रों पर नहीं बेच सके, लेकिन इस प्रावधान की एक बड़ी समस्या यह है कि ज्यादातर मजदूर जो बटेदारी या अन्य किसी अनुबंध पर दूसरे की जमीन पर खेती करते हैं, उनके लिए सरकारी केंद्रों पर अपने अनाज को बेचने में काफी कठिनाई होती है. आर्थात छोटे एवं सीमांत किसानो के लिए इन वृद्धियों के मायने कम ही हैं.

देश में अनाजों की अधिकांश खरीद-बिक्री निजी क्षेत्र में ही होती है. और एमएसपी के परिपालन हेतु किसी भी तरह की कानूनी या न्यायिक व्यवस्था नहीं है. यानी कोई भी निजी व्यक्ति या व्यापारी अगर किसानों को उनकी फसलों के एमएसपी से कम मूल्य दे, तो भी किसी तरह की कार्रवाई कानूनी रूप से उस पर नहीं हो सकती है. आर्थात ये मूल्य सिर्फ निदेशक के तौर पर ही काम करते हैं, जिनके परिपालन की कोई व्यवस्था निजी क्षेत्र के लिए नहीं है.

हलांकि यह कहना गलत होगा कि एमएसपी की वृद्धि से बाजार पर असर नहीं पड़ता है. जिन फसलों की सरकारी खरीद जितनी ज्यादा होती है, उसके मूल्य बाजार में उसी दिशा में बढ़ते हैं और कभी-कभी बाजारी मूल्य एमएसपी से अधिक भी हो जाते हैं. लेकिन, इसकी संभावना कम ही देखी गयी है.

एमएसपी में वृद्धि एक सकारात्मक कदम तो है, किंतु किसी भी परिप्रेक्ष्य में इसे पर्याप्त नहीं माना जा सकता है. जब तक सरकारी खरीद की मात्रा का समुचित विस्तार नहीं होगा एवं निजी क्षेत्र में भी इन मूल्यों को स्थापित करने की कोई व्यवस्था नहीं होगी, तब तक न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि को एक अपर्याप्त नीति के रूप में ही देखा जायेगा. और धरातल पर इसका असर भी सीमित ही रहेगा.